बहुत दिन हुए एक कहानी की तलाश थी ,मैं कहानी की तलाश में इधर -उधर घूम रहा था, समझ नहीं आ रहा था कि कहानी किस पर लिखुँ ?तभी किसी ने बताया -एक बुजुर्ग़ दम्पत्ति आये हैं ,पहले यहाँ नहीं रहते थे ,उनसे मिल लो ,शायद कोई कहानी मिल जाये। मैं उन दम्पत्ति के पास गया ,उनका घर बहुत ही बड़ा था। मैंने आवाज़ लगाई कोई है ?एक बुजुर्ग़ ने दरवाज़ा खोला ,उनके घर में एक तरफ पत्थर लगे थे जैसे शहर में कोठी होती है ,दूसरी तरफ एक कच्चा कमरा, उसमें दो चारपाई रखी थीं एक कोने में जमीन में हल्का गड्ढा करके पानी का घड़ा रखा था। उन्होंने मुझे एक तरफ बैठने का इशारा किया ,मैं एक चारपाई पर बैठ गया। दोनों पति -पत्नी पेड़ -पौधों में पानी दे रहे थे ,मुझे देखकर ठहर गए बोले -बेटा तुम कौन ?हम तुम्हें पहचाने नहीं। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और आने का कारण भी बताया। वे बोले -हमारी क्या कहानी हो सकती है ?जैसे और लोग रहते हैं और जीते हैं ,हम भी जी रहें हैं। मैंने कहा -ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं ,जो प्रश्न पूछूँ ,जवाब दीजियेगा। वो इस बात से सहमत हो गए।
मैंने कहा -आपके कितने बच्चे हैं ?उन्होंने बताया दो बेटी ,दो बेटे। मैंने पूछा -आप लोग तो शहर में रहते थे ,बच्चे कहाँ हैं ?उन्होंने बताया -बेटे -बेटियों की शादी हो गयी। जैसे मैं उन्हें उनके अतीत में ले गया हूँ ,उन्होंने स्वयं ही बताना शुरू कर दिया -'हमने अपना गृहस्थ जीवन बड़ी उमंगों से सादगी से शुरू किया। हम ज्यादा पैसे वाले तो थे नहीं किन्तु हमारे पास जो भी था उसी में हम खुश थे। ऐसा ही हमने अपने बच्चों को भी बनाने का प्रयत्न किया ,उन्हें पढ़ाया -लिखाया ,अच्छे संस्कार देने की पूरी कोशिश रही। हमारे बच्चे संस्कारी बने उनमें इंसानियत और शिष्टता हो,यही हमारा प्रयत्न रहा। मनुष्य पूरी जिंदगी कुछ न कुछ नया सीखता है ,हम भी सीख रहे थे -बच्चे पालना,उन्हें अच्छे संस्कार देना ,अपनी परम्पराओं से अवगत कराना। हमने भी बेटियों को अच्छे संस्कार दिए ,बेटियों का विवाह किया लेकिन जो संस्कार हम अपनी बेटियों में भर रहे थे तो जरूरी नहीं कि जो लोग उनसे जुड़ें या मिलें उनमें भी वही संस्कार या इंसानियत हो। हमें अपनी गलतियों का एहसास तब हुआ जब हमने बेटियों का विवाह किया। हमने उन्हें सामाजिक व्यवहार और दुनिया की अन्य प्रजातियों से अवगत नहीं कराया। अच्छे लोग हैं तो बुरे भी। उनका सामना कैसे करना है ?ये नहीं सिखाया। परिणामस्वरूप बेटियाँ ससुराल में परेशान रहीं लेकिन हमने उन्हें परिस्थितियों से जूझने की हिम्मत दी। उनका सामना करने के लिए प्रेरित किया।
बेटों का विवाह किया बेटों की नौकरी लगी ,बहुएं भी नौकरी वाली आईं। हमने सोचा 'अब ये ही हमारी बेटियाँ हैं ,अपनी बेटियों का जीवन तो हम बदल नहीं सकते लेकिन दूसरे की बेटियों का मन न दुखे ऐसा तो हम स्वयं कर सकते हैं। एक बहु और बेटा अपनी नौकरी पर चले गए कभी उसने फ़ोन करके या व्यवहार द्वारा ऐसे नहीं दर्शाया कि उसने हमें अपने माता - पिता के रूप में स्वीकार किया हो। दूसरे बहु - बेटा हमारे साथ ही रहते है। हमने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की कि उसे माँ - बाप का सुख दे सके। जब वो अपने काम से आती तो हम चाय बनाकर देते कि थकी होगी। उसके लिए फल काट देते,सब्जी बनाकर तैयार रखते ताकि उसे ज्यादा परेशानी न हो। उसके काम पर जाने के बाद कपड़े सुखाते ,तह करके रखते जब तक हमारे लिए संभव होता हम उसकी मदद के लिए तत्पर रहते। जब उनके बच्चे हुए तो उनको संभालना ,समय पर दूध देना,नहलाना ,खाना खिलाना आदि कार्य हम करते। कभी -कभी शरीर थक जाता ,उम्र भी तो है हमारी। तब हमें लगता कि वो पूछेगी-मम्मी -पापा कैसे हैं ?लेकिन ये सब सोचना हमारे लिए सपना बन गया। बहु आती कमरे में चली जाती ,हम अपने ही घर में परायों की तरह रहते।
जिस दिन छुट्टी होती ,हमारी इच्छा होती बहु अपने हाथों से चाय बनाकर दे या पूछे -'मम्मी -पापा चाय पियेंगे। हम बैठे रहते वो स्वयं चाय बनाकर पी भी लेती,हमें लगा इतनी इंसानियत निभाने के बाद भी हम वो स्थान प्राप्त नहीं कर पाए ,या हमारी परवरिश में ही कोई कमी रह गयी या हम समाज के लोगों के व्यवहार को समझ नहीं पाये। जो हम न ही बेटियों को सुख या न्याय नहीं दिलवा पाए ,न ही बहुओं से माता -पिता का दर्ज़ा प्राप्त कर सके। हमें लगा शायद हम ही इन रिश्तों से ज्यादा उम्मीद लगा बैठे। अंत में हमने सोचा 'एक न एक दिन तो सब छोड़कर जाना ही है ,क्यों परिवार का मोह करें ,क्यों न जीते जी ही इसे त्याग दिया जाये?उन्होंने अपनी बात रखी -सबको अधिकार है ,स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी जीने का , हम उन्हें क्यों विवश करें ?कि हमसे मजबूरीवश किसी रिश्ते में बंधे रहें। '
मैंने पूछा -आप लोग यहाँ रह हैं [उनके कमरे की तरफ इशारा करते हुए ]कहा ,फिर ये मकान ऐसा क्यों बनवाया,पत्थर लगवाया। तब वो बुजुर्ग़ बोले -ये माँ है न ,अभी इसकी इच्छाएं समाप्त नहीं हुईं ,इसने घर तो छोड़ दिया लेकिन मन से अब भी उनसे जुडी हुई है। सोचती है ,कभी बच्चों का मन किया मिलने के लिए। यहाँ आये तो कहाँ रहेंगे ?उनके लिए ही ये सुविधाएं हैं। पगली है। तभी कुछ महिलायें आईं मैंने पूछा -इतनी महिलायें एक साथ तो वो बोलीं -हम सब मिलकर योग करते हैं ,शाम को कुछ बच्चियों को जो कुछ भी हमे आता है सिलाई -कढ़ाई ,बुनाई ,ढोलक जैसी घरेलू चीजें सिखाते हैं ,इससे समय भी कट जाता है।
' जिंदगी भर जिन अपनों के लिए किया ,वो कब अपने रहे?
गैरों से कुछ गिला नहीं ,वक़्त की गुज़ारिश है कि वक़्त कट जाये। '
उनकी बातें सुनकर लगा ,जिस कहानी की मुझे तलाश थी वो मिल गयीं।

👌👌👌
ReplyDeletethanks
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