nok-jhonk

 ये कैसी जिंदगी है ,क्या रखा है ?इस  जिंदगी में। क्यूँ  हम  विवशता भरी ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर हैं ?पत्नी बुदबुदाई किन्त्तु पति महाशय ने  बातें सुन लीं ,उन्हें सुनकर बुरा लगा। बोले -
पति -कैसी विवशता ?कैसी मजबूरी ?
 पत्नी - ये विवशता ही  तो हैं , जब मैं ब्याहकर आई , छोटा मकान उसमें  रहने के लिए विवश। तुम्हारी आमदनी इतनी भी नहीं कि ठीक सी जगह पर ,खुले में रह सकें।  थोड़े- थोड़े पैसे जोड़ कर , जमीन बेच कर बड़ी जगह ली , बड़े कमरे भी बनवाए, तो क्या? घर के सदस्य भी तो बढ़े।  जहाँ चार लोग रहते थे , दस हो गये।  जगह फिर छोटी , एक- एक कमरे में चार- चार लोग। 
 
पति - और भी तो कमरे बनवाये , इस चक्कर में ही  तो दो मंजिला मकान बनवा दिया। 
पत्नी - जब तुम दोनों भाइयों में बँटवारा हुआ तो फिर वही  दो कमरे। गर्मी में कितनी बुरी हालत हो जाती थी ?सारा दिन कूलर में पानी  भरते रहो ,वो भी गर्म हवा देने लगा। पैसों का इंतजाम करके वातानुकूलित का प्रबंध किया तो एक कमरे में पांच -छः लोग ,ये विवशता नहीं तो और क्या है ?वरना हम भी सुविधानुसार बच्चों के कमरे में एक और अलग से  लगवा देते। 
पति -तुम ऐसे लोग क्यों नहीं देखतीं? जिनके सिर पर छत भी नहीं ,पंखे ,कूलर और ए सी की तो बात ही छोडो।
पत्नी -ये उनकी विवशता है ,ख़ुशी नहीं। भला कौन नहीं चाहेगा ?सुख -सुविधा में रहना।  
पति -इच्छाएं इतनी नहीं बढ़ानी चाहिए ,जितना हमारे पास है ,उसी में ख़ुश रहना चाहिए। इच्छाएं तो अनंत हैं ,वे कभी पूरी नहीं होतीं। 
पत्नी -परेशानियों के कारण ही इच्छाएं बढ़ती हैं यदि परेशानी न हो तो इच्छाएं भी न बढ़े और यदि इच्छाएं न हो तो उन्हें पूरा करने के लिए आदमी काम भी न करे। 
तभी वर्माजी वहाँ आ गए ,उन्होंने अंदाजा लगाया और बोले - दोनों पति -पत्नी में क्या नोक -झोंक चल रही है ? 
पति -कुछ नहीं ,मैं श्रीमति जी को समझा रहा था 'मनुष्य इच्छाओं का दास हेे ,इच्छाएँ जितनी बढ़ाओगे ,उतनी बढ़ेंगी। इच्छाएं कभी पूर्ण नहीं होतीं। जितना है उसी में ख़ुश रहना सीखिए ,जब हमारा मकान छोटा था तो बड़ा हुआ ,उसके बाद दोमंजिला बना ,अब भी जगह की कमी और बड़ा बन जायेगा तो वो भी कम पड़ जायेगा। ये ही बात मैं इन्हें समझा रहा था कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं। 
वर्माजी -ये बात तो आप ठीक कह रहें  हैं ,आदमी की इच्छा कभी ख़त्म नहीं होतीं ,बढ़ती ही जाती हैं। हमारी श्रीमति जी भी कुछ न कुछ नई माँग कर बैठती हैं ,संतुष्टि नहीं। पड़ोसन के एल इ डी टेलीविजन है तो उन्हें भी चाहिए। मैंने कहा- 'पुराने में भी तो दिख था है ,नए में भी वो  ही चीजें दिखेंगी। क्यों मेरे चालीस -पचास हज़ार टिपवाना [बर्बाद ] चाहती हो? 
उन दोनों की बातें  सुनकर चित्रा बोली -इच्छा -इच्छा में फ़र्क होता है हमारी तो आवश्यक ,आवश्यकता है। भाईसाहब !आप ही बताइये, जब परेशानी होगी तो इनसे ही कहेंगे न। हमारी इच्छा तो परेशानियों से जाग्रत होती है ,हम  एक ही कमरे में कई -कई लोग पड़े रहते हैं ,मकान बड़ा हुआ तो लोग  बढ़ गए ,हमारी इच्छाएं तो परेशानियों से उत्प्नन हुई हैं। ख़ैर छोड़िये ,इन बातों को। आप ये बताइये ,आदमी कमाता किसलिए है ?अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। यदि आवश्यकताएं या इच्छाएं न हों जो उसके पास है ,उसी में संतुष्ट रहे तो फिर वो मेहनत ही क्यों करेगा ?कमाने का प्रयत्न ही नहीं करेगा , तरक्क़ी की नहीं सोचेगा। मान लो, पुराने टी वी के बदले नया  बड़ा टीवी आता है तो लगेगा हम समय के साथ चल रहे हैं। माना कि पुराने टेलीविजन में भी हमें वही दिखेगा किन्तु नए में तो नए फीचर होंगे ,नई तकनीक होगी। इससे हमें पता चलता है हम तरक्क़ी कर  रहे हैं।वरना  ये अविष्कार क्यों होंगे?'' आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है।' 'ये तो आपने सुना ही होगा ,यदि आवश्यकताएं या इच्छाएं ही मर जायें तो मनुष्य आगे बढ़ने की क्यों सोचेगा ?ये जो नए -नए अविष्कार हो रहे  हैं ,उन्हें क्यों करेगा ?जिंदगी तो वहीं थमकर रह जाएगी। हम जैसे पुराने समय में थे ,ऐसे ही रहते। इतनी उन्नति थोड़े ही कर  पाते। रॉकेट ,हवाई -जहाज, मेट्रो -ट्रेन ,मोबाईल ,ए सी इत्यादि इसी बात का सबूत हैं कि पहले समस्या उत्प्नन हुईं इस कारण इच्छा जाग्रत हुई जिसके परिणाम स्वरूप अविष्कार हुए। 
पति -मैडम !आविष्कार के दुरूपयोग भी हैं ,इसका उदाहरण हैं -पर्यावरण का दूषित होना ,हमारे मोबाइलों से जो रेडिएशन निकलता है वो हमारे लिए नुकसानदेह है। सारा -सारा दिन छोटे -छोटे बच्चे मोबाइलों  पर लगे रहते हैं ,इससे आँखें खराब ,इस कारण खेलते -दौड़ते ,भागते नहीं ,सेहत ख़राब, सुना है ,ये कोरोना भी आविष्कार का ही परिणाम है ,ज्यादा टॉवर  लगने से उनकी तरंगों के कारण हमारे पक्षी भी लुप्त होते जा रहे हैं। इतनी मिसाइल वगैरहा की क्या आवश्यकता थी ?
पत्नी -वो तो अपने देश की स्थिति  मजबूत करने के लिए [चाय पकड़ाते हुए कहा ]
पति -युद्ध की आवश्यकता ही क्या है ?इससे इंसानों को नुकसान ही है ,यहाँ के हों या वहाँ के। ऐसा आविष्कार न हो तो युद्ध भी न हो। जिस देश में ये हैं ,उसे लगता है कि मैं ताक़तवर हूँ ,दूसरा उससे ज्यादा ताक़तवर बनने के लिए कुछ नया  आविष्कार करेगा ,जिससे जान -माल दोनों का ही नुकसान है। 
पत्नी -मैं मानती हूँ कि आविष्कार के कुछ लाभ हैं तो हानि भी। यदि हम इसका सही तरीके से इस्तेमाल करें तो फायदे हैं ,यदि दुरूपयोग करें तो नुकसान ही नुकसान है। 
वर्माजी बोले -लो भई !कुछ बात तो भाभी जी ने तुम्हारी मानी वरना हमारी श्रीमतिजी तो हमारी चलने ही नहीं देती ,न ही सुनती हैं सुनकर तीनों हँस पड़ते हैं। 

          



















laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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