Kiski dulhan [part 2]

आज ,'मोहिनी' और 'रूद्र प्रताप सिंह 'का विवाह है ,मोहिनी अपने सपनों के राजकुमार, अपने प्रेमी की प्रतीक्षा में है। कब उसके सपनों का राजकुमार आएगा और उसे ब्याह ले जायेगा ? किन्तु दूसरी तरफ रूद्र के मन में अज़ीब सी बेचैनी और घबराहट है। वो स्वयं ही नहीं जानता ,उसे ऐसा क्यों महसूस हो रहा है ? शायद नियति उसे कोई संदेशा देना चाहती है किन्तु अभी तक रूद्र को कुछ समझ नहीं आया। तब उसके मित्र के पूछने पर कि क्या वो विवाह करने से डर रहा है ? वो कहता है -

 नहीं..."अपनी सूनी नजरों से उसने हवेली की तरफ़ देखा और बोला -"ऐसा लग रहा है... जैसे कि कुछ होने वाला है।"


उसी समय हवेली के पिछले दरवाज़े से एक काली एसयूवी अंदर दाखिल हुई ,उसमें से एक लंबा, गठीला युवक उतरा ,काला सूट , हल्की दाढ़ी,तेज़ नज़रें ,चेहरे पर कोई भाव नहीं, किन्तु उसके आते ही नौकरों के चेहरे का रंग अवश्य बदल गया।

किसी ने धीरे से कहा -"छोटे साहब आ गए..."

छोटे साहब ! यानि भानू प्रताप सिंह ''अमर प्रताप सिंह'' का छोटा बेटा। जिसके विषय  में शहर में तरह-तरह की बातें कही जाती रहीं हैं ।

कोई कहता है -' वह बेहद हिंसक है।'

कोई कहता है - उसने विदेश में किसी को मार दिया था।'

कोई कहता था- वह सिर्फ़ अपने पिता की वजह से जेल जाने से बचा।'लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।

भानू ,बिना किसी से मिले सीधे हवेली के अंदर चला गया।

उसी समय मोहिनी भी, अपने कमरे की खिड़की से नीचे देख रही थी। तभी उसकी दृष्टि पहली बार' भानु' पर पड़ी ।उसकी नज़रें कुछ क्षण के लिए भानु पर टिक गईं। उस आदमी के चेहरे पर एक अजीब-सी कठोरता  नजर  आई । उसकी आँखों में क्रोध और बेचैनी नजर आ रही थी ,जैसे वह दुनिया से नहीं...खुद से लड़ रहा हो।

अगले ही पल भानु  ने भी ऊपर देखा, बस चंद पलों के लिए मोहिनी से, उसकी नज़रें टकराईं किन्तु भानु के भाव स्थिर थे और वो अंदर चला गया। 

मोहिनी ने, अनजाने में गहरी और लंबी साँस ली -सोचने लगी ,"कितना अजीब इंसान है..."विवाह के मौक़े पर भी उसके चेहरे के भाव बदले नहीं हैं। न जाने कौन है ?

शाम सात बजे के क़रीब बारात द्वार पर आ चुकी थी। मेहमानों से पूरा प्रांगण भर गया था। ढोल की आवाज़, आतिशबाज़ी और शहनाई के मध्य रूद्र मंडप में बैठा था।

कुछ ही देर बाद मोहिनी भी वहाँ पहुँच गयी ।दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा वो हल्के से मुस्कुराई , उनकी आँखों में एक शांत विश्वास था। जैसे दोनों को यकीन हो कि अब कोई उन्हें अलग नहीं कर सकता।पंडित जी ने मंत्रोच्चारण करना आरम्भ किया। कुछ देर तक वहां ख़ामोशी रही ,बस पंडित जी का स्वर ही गूंज रहा था। 

लेकिन उसी समय...मुख्य द्वार पर किसी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई -"यह शादी नहीं हो सकती!"

पूरे मंडप में एकदम से सन्नाटा छा गया। सबकी नज़रें दरवाज़े की ओर मुड़ गईं।करीब सत्तर साल का एक बुज़ुर्ग, हाथ में एक पुरानी फ़ाइल लिए खड़ा था। उसके साथ दो वकील और एक पुलिस अधिकारी भी थे। 'अमर प्रताप सिंह' के परिवार के मुखिया 'विक्रम सिंह' का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।

उन्होंने धीमे स्वर में  कहा,"...यह यहाँ कैसे पहुँच गया?" तब उसने, खड़े होकर उस व्यक्ति से पूछा -आप यहां कैसे ?

उस अनजान बुज़ुर्ग ने सबके सामने फ़ाइल खोली और बोला "आज से ठीक पच्चीस साल पहले, जो सच छिपाया गया था... आज वही सच इस शादी को रोकने आया है।"

मंडप में बैठे लोग, एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। मोहिनी  कुछ समझ नहीं पा रही थी।रूद्र भी अपने स्थान से  उठ खड़ा हुआ और पूछा -"आप कहना क्या चाहते हैं?"

उस बुज़ुर्ग ने उसकी ओर देखा ,उसकी आँखों में रूद्र के लिए हमदर्दी  थी ।तब वो बोला -"बेटा...!.तुम इस परिवार के बड़े बेटे नहीं हो।"

पूरा मंडप जैसे स्थिर हो गया। जहाँ अभी कुछ देर पहले इतनी चहल -पहल ,रौनक थी ,वहीं अचानक से इतनी शांति नजर आई ,वहां बैठे लोगों की सांसे तक सुनी जा सकती थीं। या फिर बेचैनी से पहलू बदलती मोहिनी की पायल और कंकण का स्वर ! 

मोहिनी की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। रूद्र ने अविश्वास से अपने पिता की तरफ देखा और पूछा -"पिताजी ... ये क्या कह रहे हैं?"

लेकिन विक्रम सिंह ने नज़रें झुका लीं, उन्होंने कुछ नहीं कहा , उनकी यही चुप्पी...पहली बार इस बात का संकेत थी कि शायद ,यह आरोप झूठ नहीं था।

मोहिनी की धड़कनें जैसे थम गई थीं।

मंडप में बैठे, सैकड़ों मेहमानों के मध्य ऐसी खामोशी फैल गई थी कि शहनाई बजाने वाले कलाकारों ने भी, अपने हाथ रोक लिए। हवा में घुली खुशियों की महक अचानक किसी अनजाने भय में बदल चुकी थी। सबकी निगाहें उस बुज़ुर्ग पर टिकी हुईं थीं, जिसने एक वाक्य बोलकर पूरी शादी रोक दी थी।

तब वो पुनः बोला - "तुम इस परिवार के बड़े बेटे नहीं हो।"जैसे वो रूद्र को विश्वास दिला रहा हो। 

रूद्र  कुछ क्षण तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा। उसे लगा, जैसे उसने ठीक से सुना ही नहीं। "क्या कहा आपने?" उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें कंपन स्पष्ट नजर आ रहा  था।

बुज़ुर्ग ने फ़ाइल से एक पुराना कागज़ निकाला और उस कागज़ को दिखाते हुए बोला -"मैं वही कह रहा हूँ जो पच्चीस साल पहले अस्पताल के रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था।"

मोहिनी की नज़र तुरंत विक्रम सिंह पर गई।वह चाहती थी कि वे गुस्से में उस आदमी को झूठा साबित कर दें।

लेकिन...उन्होंने सिर झुका लिया। उनकी यही चुप्पी ,उनका सबसे बड़ा उत्तर थी।

"बस बहुत हुआ!"पीछे से निकलकर भानु आगे आया। यह आवाज़ पहली बार भानु की थी।

उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखलाई दे रहा था।"मेरे पिता की इज़्ज़त के साथ कोई खेल नहीं करेगा।"

किन्तु वो बुज़ुर्ग न ही मुस्कुराया और न हीं डरा !"अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो पुलिस को अस्पताल के रिकॉर्ड देखने दीजिए।"

उसके कहते ही एक पुलिस अधिकारी आगे बढ़ा और बोला -"विक्रम सिंह जी... हमारे पास अदालत का आदेश है। अगर आप चाहें तो यह जाँच यहीं रुक सकती है, लेकिन तब आपको अदालत में जवाब देना होगा।"

मेहमानों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई। "क्या सचमुच...रूद्र इस परिवार का बेटा नहीं है ?"इतनी बड़ी हवेली का इतना बड़ा राज़?"अगर बड़ा बेटा असली नहीं है तो..."फिर कौन है ?

मंडप में बैठी मोहिनी का,  घबराहट के कारण दिल बैठा जा रहा था। उसने रूद्र की तरफ देखा ,जो स्वयं हैरान परेशान उनकी बातें सुन रहा था ,उसकी हालत  देखकर  मोहिनी को उस पर तरस आ रहा था। वह समझ रही थी,जब किसी को अचानक ही यह पता चले,' जहाँ तुम पले- बढ़े , बड़े हुए ,वहां अचानक ही कोई आकर कह दे !'तुम इस परिवार के वारिस नहीं हो ,वो भी ऐसे समय में जब उसका विवाह हो रहा है। जिस आदमी ने कभी किसी का बुरा नहीं किया...आज पूरी दुनिया के सामने उसकी पहचान पर सवाल उठ गया था।वह धीरे से उसके पास आई और बोली -"रूद्र ..."

रूद्र  ने उसकी ओर देखा ,उसकी आँखों में पहली बार मोहिनी ने असुरक्षा देखी।"अगर यह सच हुआ तो...?"मोहिनी  ने बिना सोचे उसका हाथ पकड़ लिया। जैसे वो उसे विश्वास दिला देना चाहती थी "सच कुछ भी हो...""मेरे लिए तुम वही हो।"यह सुनकर' रूद्र' की आँखें भर आईं।

लेकिन दूर खड़ा भानु यह दृश्य देख रहा था। उसकी मुट्ठियाँ अपने-आप भींच गईं।उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे गुस्सा किस पर आ रहा है ?



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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