कभी -कभी जिंदगी में ऐसा समय भी आ जाता है ,जब आदमी अपने को अनेक परशानियों से घिरा पाता है। बाहर निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता ,लगता है, सारा जीवन व्यर्थ गया ,अब कुछ नहीं रखा इस जीवन में। सोचा था क्या ,क्या हो गया ?तब परेशानियों में घिरे एक ही रास्ता नजर आता है कि कहीं छुप जायें ,चले जायें या मर जायें। कुछ सूझता नहीं ,न ही समझ आता है कि क्या किया जाये ?कहाँ जायें ?कोई मददगार नजर नहीं आता ,कोई साथ खड़ा भी नहीं दिखाई देता। इन क्षणों में लगता है कि जीवन व्यर्थ है। हम क्यों , किस लिए ,किसके लिए जी रहे हैं ?न जाने कितने प्रश्न घेर लेते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं मिलता। नकारात्मकता पूरी तरह से जकड़ लेती है ,इन्ही क्षणों में मनुष्य इतना कमजोर पड़ जाता है ,यदि उन कमजोर क्षणों में कोई तिनका भर सहारा दे दे या उम्मीदों की राह दिखा दे ,नकारात्मकता को बदल दे तो ठीक वरना उस जिंदगी से छुटकारा चाहता है। इन पलों में किसी का सहारा, सहयोग जीवन में आशा की उमंग भर सकता है। जीने की उम्मीद जगा सकता है किन्तु ऐसे में वो व्यक्ति एकांत ढूढ़ता है। एकांत में वो और अधिक तनाव में चला जाता है। ऐसे में यदि वो अपना ध्यान उस चीज से हटाकर किसीअन्य चीज पर केंद्रित करे अथवा कुछ दिनों के लिए स्थान बदल दे या अपने घरवालों से इस विषय पर चर्चा करे तो अनहोनी को किसी हद तक टाला जा सकता है।
परेशानियाँ ज्यादातर पारिवारिक ,आर्थिक हो सकती हैं ,तनाव का कारण कुछ भी हो सकता है लेकिन मानव अब इतना कमजोर हो गया है ,जीवन में संघर्ष करने से बेहतर उनसे बचने में या पीछा छुड़ाने में यकीन रखता है।' संघर्षों का ही दूसरा नाम ही जीवन है।'संघर्षों का सामना करते हुए ही जीवन जीना है ये बात वो समझ नहीं पाता लेक़िन मानव को सभी सुख सुविधाएं चाहिए, वो भी आसानी से मिल जाये तो ज्यादा बेहतर है। इन सुविधाओं का इतना दास हो जाता है कि अपने को इन सुविधाओं के लिए कर्ज़ में डूबा लेता है ,जब इसे चुकाने का नंबर आता है तो परेशानी में दूसरा रास्ता अपनाता है। यहाँ से तो जान छुड़ाकर चला जाता है लेकिन दुनिया को दे जाता है अपनी कायरता का परिचय। रिश्ते भी आजकल इतने मजबूत नहीं रहे कि आदमी इन रिश्तों के लिए जीने की भी कोशिश कर सके। पहले सयुंक्त परिवार होते थे ,यदि परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी परेशानी में होता था तो सब मिलकर संभाल लेते थे।
अब एकल परिवारों का बोलबाला है या नौकरी के सिलसिले में बाहर रहता है। साथ में कोई नहीं। न ही किसी का साथ चाहते हैं क्योंकि उनकी आजादी में जो ख़लल पड़ता है। पता नहीं कब ,कैसे परिस्थितियों से अकेला जूझता रहता है। किसी लड़की या लड़के दोस्त ने धोखा दे दिया तो किसी से कुछ कहेगा नहीं और साल -दो साल के उस रिश्ते के लिए जान दाव पर लगा बैठता है। सच्चा प्यार मरने पर मजबूर कर देता है। एकल परिवार में पति -पत्नी मजे से रहते हैं ,ख़र्चे भी इच्छानुसार करते हैं। जब कभी झगड़ा हुआ तो उनके खोखले रिश्तों का परिणाम सामने आता है। पता चलता है ,कि वे अपनी इच्छाओं के
दास थे ,रिश्तों से सही मायने में जुड़े ही नहीं ,जुड़ते तो विपरीत परिस्थितियों में एक -दूसरे के साथ खड़े होते। न कि एक -दूसरे की जान लेने के लिए मजबूर होते। संयुक्त परिवार में यदि पति -पत्नी में अनबन होती तो घर के बड़े सुलझा भी देते ,उन मोतियों को सख्ताई से या जैसे भी हो ,बिखरने नही देते थे।
आज हालात ऐसे हैं कि दोनों नौकरी करते हैं ,किसी की सुनते नहीं ,झुकना नहीं जानते परिणाम स्वरूप तलाक ,झगड़े ,मारपीट होने के साथ -साथ एक -दूसरे के प्रति सम्मान नहीं। देखने पर लगता है ,औपचारिकता निभा हैं ,दिल से जुड़े रिश्ते नजर नहीं आते। एक बार मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियाँ रहीं ,लगा कि , जान दे दूँ ,इन सब झंझटों से छुटकारा मिले। मैंने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी माँ से भी कही ,तो वो बोलीं -'मरना और परिस्थितियों से भागना तो कायरता है। उन परिस्थितियों से भागो नहीं डटकर सामना करो,तब देखो परिस्थितियाँ कैसे तुम्हारे अनुकूल होती हैं ?ये जीवन ही इसीलिए है ,जो इन परिस्थितियों से जीत गया ,समझो जी गया। एक न एक दिन जाना सभी को है तो क्यों न जीतकर जायें ?पता नहीं, फिर ये जीवन कब मिले ? 'उनकी इन बातों से मन में संघर्षों से लड़ने की हिम्मत जागी ,फिर भी कभी मन में बात आई तो माँ के कहे शब्द याद आते 'मरना तो कायरता है ,जीना है और जीतना है। '
आजकल ये रास्ता ज्यादातर लोगों को आसान लगता है ,किसी भी परिस्थिती से भागने के लिए। छोटे बच्चे भी कक्षा में पास हुए नहीं कि ये रास्ता अपना लिया। पहले बच्चे माता -पिता से पिटते भी थे और पढ़ते भी थे। अब पिटते भी नहीं और फेल होने पर जान से जाते हैं। इसका कारण है ,अधिक तनाव ,आगे बढ़ने की होड़ ,एकल परिवार ,ज्यादा सुख -सुविधाओं में रहना ,अपने जीवन से ज्यादा अपेक्षाएं रखना ,सहन शक्ति का क्षीण होना। सबकी परिस्थितियां भिन्न -भिन्न होती हैं किन्तु उन परिस्थितियों से जीतना ही जीवन है।उन परिस्थितियों को अपने पर हावी नहीं होने देना है, ये ही आत्महत्या का तोड़ है।