Unka prem

हमारी जिंदगी में कभी-कभी ऐसे जीवंत उदाहरण मिल जाते हैं, कि हमारा ध्यान उनकी ओर जाता ही नहीं। हम कहानी-किस्सों में सुनते रहते हैं, किंतु कई उदाहरण हमारे आसपास ही होते हैं ,जिनसे कुछ सीखने को मिल जाता है। उन दिनों मेरी नई-नई  नौकरी लगी थी। नौकरी के लिए किराए का मकान तो लेना ही था। एक अनजान शहर, अनजान लोग, वहां पर मुझे काम करना था, रोजी-रोटी के लिए वहां गया था। तब मुझे किसी ने एक बुजुर्ग़ दम्पत्ति के घर का पता दिया ,जो परिवार के नाम पर दोनों ही साथ रहते थे। 

 मुझे अच्छे लोग मिल गए ,उनका दोमंजिला मकान था। जिस पर उन्होंने एक कमरा मुझे दे दिया। कहने लगे- ' कि वैसे तो हम किराए पर कमरा नहीं चढ़ाना चाहते हैं ,लेकिन सोचा है - इस उम्र में न जाने क्या परेशानी या दिक्कत आ जाए। अपने बच्चों का साथ तो नहीं है किंतु तुम साथ रहोगे, तो हमें, अपने बच्चों की कमी महसूस नहीं होगी।


 उनकी यह बातें सुनकर मुझे अच्छा लगा, और मैंने उनसे कहा -अंकल ,आंटी !आप किसी प्रकार की चिंता मत कीजिए ,जब आप मुझे अपने बच्चे की तरह देख रहे हैं ,तो मैं भी आपको कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा। 

हमें भी यही लगा था ,तुम आजकल के बच्चों की तरह नहीं हो ,आजकल के बच्चे ,बड़ों कुछ समझते ही नहीं।  बेटा !बहुत से लड़के या लड़की यह सोच जाते हैं कि बड़े बुजुर्ग हैं, ये तो कुछ समझते ही नहीं होंगे लेकिन वो लोग ये नहीं जानते कि हमने भी दुनिया देखी है। जीवन का लंबा पड़ाव पार किया है ,क्या हम इतना भी नहीं समझेंगे ? कि उनका चाल -चलन कैसा है ? ऐसी सोच रखने वाले बच्चों को हमने, फिर कभी भी किराए पर मकान न देने का निर्णय किया था, किंतु तुम्हारी बातचीत से हमें लगा -''तुम अच्छे लड़के हो इसलिए हमारा भरोसा बनाए रखना। ''

उनसे बातचीत करके मैंने, अपना सामान कमरे में जमाया।  कमरे तो उनके और भी थे लेकिन मुझे लगा ,अंकल -आंटी ने और  कमरे  किसी और को इसीलिए नहीं दिये  होंगे , शायद उनका पहले किराएदार से अच्छा अनुभव नहीं रहा होगा। ,लेकिन मुझे इस बात से संतुष्टि थी कि चलो ! बड़े -बुजुर्गों का साया साथ में रहेगा और मुझे यहां  रहना भी कितना है ? रात को आकर सोना ही तो है ,दिन में नौकरी करनी है, कहने को तो एक कमरा ही मैंने लिया था, लेकिन मैं कहीं भी उठ बैठ सकता था क्योंकि वहां कोई और रहता ही नहीं था। 

मुझे वहां रहते हुए ,लगभग 2 महीने बीत गए। तब मैंने यह जाना, कि उन अंकल -आंटी में कभी भी झगड़ा नहीं हुआ, उन्हीं दिनों नवरात्रि के व्रत चल रहे थे। उन दिनों अंकल और आंटी सात्विक भोजन करते थे।  मैंने सोचा उम्र के हिसाब से अपना हल्का भोजन लेते हैं, लेकिन यही उनका व्रत का भी भोजन था। मेरी उनसे जानने की इच्छा हुई ''कि क्या आप व्रत नहीं रखते हैं ?''

 तब अंकल मुस्कुरा कर बोले -व्रत देवी के लिए ही तो किया जाता है। हमारे घर में तो साक्षात देवी विराजमान हैं।  मैंने इनके सभी रूप देखे हैं। दुर्गा ,काली जब बच्चों को पढ़ाती थीं - सरस्वती! भोजन बनाती थीं , अन्नपूर्णा ! जब मेरी कमाई अपने बजट से चलाती और बचत भी करतीं तब लक्ष्मी रूप इस तरह देवी के सभी रूप मैंने इनके माध्यम से देखे हैं, मैं इनका सम्मान करता हूं। 

क्या अंकल -आंटी आपमें कभी झगड़ा नहीं हुआ ? 

अंकल मुस्कुराए, झगड़ा क्या होना है ? जब इन्होंने गलती की, मैं चुप हो गया और जब मैंने गलती की तो ये  चुप हो गईं और तब हम दोनों को ही ,अपनी-अपनी गलतियों का एहसास होता था , तब  हमने अपनी गलती भी स्वीकार की और उसको सुधारने का प्रयास भी किया।

 इतने दिनों वहां रहते हुए ,मैंने यह जाना आंटी को कभी भी, अंकल में कोई कमी नजर नहीं आई। वो जो भी करते, उसको देखकर मुस्कुरा देती थीं। यदि उनसे अंकल की गलती बताई भी जाए तो कह देती थीं - ''इंसान ही तो हैं , गलती हो जाती है।''

 तब अंकल ने एक दिन मुझे बताया था कि तुम्हारी आंटी हमेशा मेरे सुख - दुख में मेरे साथ खड़ी रहीं।  यह क्या कम बड़ी बात है ,जबकि आजकल के बच्चे थोड़ा सा दुख नहीं हुआ आपस में झगड़ने लगते हैं और तलाक की बात तक पहुंच जाते हैं। किंतु मैंने यह देखा, कि जीवन में मुझ पर दुख भी आए ,आर्थिक परेशानी भी आईं , तो ये कंधे से कंधा मिलाकर मेरे साथ डटीं रहीं। मुझसे पहले ही उसका हल खोज लेती थीं ।

अक़्सर पति -पत्नी में झगड़े का कारण ही यही होता है। जब पत्नी हर दुख में, सुख में तुम्हारे साथ खड़ी रहती है तो कम से कम तुम्हें एहसास तो होना चाहिए कि वह हर परिस्थिति में तुम्हारे साथ थी ,किंतु ऐसा नहीं होता। ''दुख में जो साथ होते हैं, तो अपने दुख को रोते रहते हैं और सुख में 'उस साथ' को भूल जाते हैं। यहीं पर प्रेम और विश्वास की परीक्षा होती है ,जिसमें अक्सर पति-पत्नी फेल हो जाते हैं।'' 

मेरे जीवन में ये मेरी संगिनी बनकर आई थीं , मेरे दुखों में साथ देने के लिए बात भी नहीं थी, किंतु मेरे दुख में भी ये हमेशा मेरे साथ खड़ी रहीं, इसीलिए आज भी हम एक -दूसरे के लिए जीते हैं। उस बात का एहसास मुझे भी हुआ था। 

जब मैंने आंटी से यही बातें पूछीं - तो वो बोलीं  -तुम्हारे अंकल बहुत ही परिश्रमी और ईमानदारी व्यक्ति हैं हम दोनों ने ही मिलकर इस गृहस्थी की गाड़ी को चलाया है।  उन्हें कभी भी अंकल के ,किसी भी कार्य में कोई कमी नजर नहीं आई या तो वह नजर अंदाज कर जाती थीं  या हंसकर टाल जाती थीं।  तब मुझे, उनके प्रेम का वह रहस्य समझ में आया।  उनका प्रेम एक -दूसरे के लिए कितना घनिष्ठ था जो आजकल कहीं भी  बहुत ही कम देखने को मिलता है। उनका जो भी कार्य या बात होती ''हम ''से शुरू होकर 'हम ''पर ही समाप्त होती ,कभी ''मैं ''नहीं आया।  

ऐसे उदाहरण लेकर अभी मेरी शादी भी नहीं हुई थी लेकिन मैं भी अपनी '' जीवन संगिनी ''को सोचकर सपने सजा रहा था। एक -दूसरे से प्रेम करने वाले ,एक -दूसरे का सम्मान करने वाले, उस साथ का जो उन्होंने साथ बिताये ,उसका एहसास उनके प्रेम को जीवंत कर रहा था। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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