Karva chaoth

 सुंदर ,परेशान सा बगीचे में घूमने चला आया ,अभी -अभी उसकी पत्नी ने जो खर्चा बताया , सुनकर उसका दिमाग़ घूम गया। सालभर में जो भी ये त्यौहार आता है ,बेफिज़ूल के खर्चों के सिवा और कुछ नहीं है।  उसकी परेशानी देखकर बगीचे में टहलने आए एक अंकल ने खन्ना जी ने पूछा - क्या बात है ?कुछ परेशान लग रहे हो।

सर ! तीज -त्यौहार तो इनके आते हैं, और परेशानी हमें होती है। ये दिलवा दो ,वो दिलवा दो !


तब इसमें परेशानी की क्या बात है ? जो कह रही हैं, दिलवा दीजिए ! मुस्कुराते हुए खन्ना जी ने कहा। 

आपको तो, ऐसा ही लगता है, यह त्यौहार क्या आता है ?हमारी जेब खाली कर देता है। 

थोड़ी जेब हल्की होनी भी चाहिए ,काम किस लिए कर रहे हैं ? वर्ष में एक बार ही तो यह त्यौहार आता है। 

ऐसा नहीं है ,नाम हमारा और जरूरतें इनकी पूरी करनी पड़ती हैं। साड़ी चाहिए ,जेवर चाहिए। 

ऐसा नहीं है , इस त्यौहार का हव्वा बना रखा है। वो क्या तुम्हारे बज़ट से महंगी साड़ी खरीद लेंगी ? नाम भले ही हमारा हो ,उस  दिन उन्हें ,अपने लिए जीने का मौका मिलता है।  इसमें ऐसी क्या बात है ? यदि यह त्यौहार न भी आता तो क्या तुम अपनी पत्नी को कुछ दिलवाते नहीं ,त्यौहार तो सिर्फ़ बहाना है। वर्ष भर की नियमित दिनचर्या से हटकर कुछ नया हो जाता है। ये पत्नियां हमारे साथ रहती हैं।  कम से कम 1 दिन तो उनका अपना होना चाहिए ,इसमें भी हमारा ही नाम आता है।  हो सकता है यह त्यौहार इसलिए बनाया गया हो। आपकी लंबी उम्र के लिए तो व्रत रख ही रहीं  हैं। उनका अपना दिन भी बन जाता है। 

मुझे लगता है, आंटी ने, कभी आपसे कोई ऐसी मांग नहीं की है इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। जब आंटीजी आपको तंग करतीं तो तब आपको पता चलता। 

जेब ढीली करने के लिए हमें ,उनके कहने का इंतज़ार करना नहीं पड़ता , हम स्वयं ही उनसे पूछ लेते हैं अपने लिए कुछ लेना है ,तो बता दो ! अच्छा बताओ !तुमने इस साल अपनी पत्नी को कब -कब उपहार दिया ?

सुंदर सोचने लगा ,उसने तो एक बार भी, अपनी पत्नी को कोई उपहार नहीं दिया। उसके जन्मदिन पर भी उसके याद दिलाने पर बग़ीचे से एक फूल तोड़कर दे दिया। भाई ! हम काम किस लिए रहे हैं ,इस कमाई पर उनका भी तो अधिकार है। वो सुंदर लगेगी, अच्छी लगेगी। हमें भी तो अच्छा लगेगा। दरअसल देखा जाये तो हम स्वार्थी जीव हैं। वो हमारे लिए करती रहे ,हमारे बच्चे पाले ,हमारा घर संभाले ,माता -पिता की सेवा करे किन्तु जब वो अपने लिए कहती या सोचती है तो हमें अच्छा नहीं लगता। 

ऐसी बात नहीं है ,ये त्यौहार बस एक ही दिन का तो है, बाकी दिन तो ऐसे ही देखना होता है। 

वही तो मैं कह रहा हूं, उनके लिए बाकी सब दिन तो एक जैसे  ही हैं , कम से कम एक दिन तो अपने लिए जी लेने दीजिए।वो एक दिन की ख़ुशी भी तुम जैसे लोगों से बर्दाश्त नहीं होती।  

अपने लिए कहां कहती हैं ,उस दिन को भी ,वो हमारे लिए कह देती है।  वैसे आपकी तो उम्र हो गई है ,क्या आंटीजी ! इस तरह से जिद करती हैं। व्रत रखती हैं। 

पहले तुम ये बताओ !तुमने ये कैसे कहा ?आपकी उम्र हो गयी है ,से क्या मतलब है ?क्या मैं बुड्ढा नजर आ रहा हूँ ? उनके लिए तो उनका ये पति तुम जैसों से लाख गुणा अच्छा है।वैसे वो अब व्रत नहीं रख पातीं हैं। 

क्या आंटीजी ! आपके लिए व्रत नहीं रखती है ,आश्चर्य से उसने पूछा। 

एक बार, उनकी बहुत ज्यादा तबियत बिगड़ गई थी, इन्हीं दिनों की बात है और उन्होंने व्रत रखा हुआ था। उन्हें चक्कर आ रहे थे। तब मैंने ही उनसे व्रत रखने के लिए मना कर दिया था। मैंने कहा था- मैं तुम्हारा पति हूं और मैं ही तुम्हें यह व्रत रखने के लिए मना कर रहा हूं। पति की आज्ञा तो मानोगी। 

 भगवान ने मेरी जितनी उम्र लिखी है, उतनी ही होगी ,तुम्हारा व्रत रखने से मैं ज्यादा उम्र का नहीं हो जाऊंगा। किंतु यदि तुम नहीं रही, तो मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा। मेरे लिए व्रत रखने से ज्यादा जरूरी तुम्हारा जिंदा रहना है। जीवन भर उन्होंने, सुख -दुख में मेरा साथ दिया। मेरे बच्चों की मां है, मेरा घर परिवार संभाला। क्या एक व्रत के लिए, मैं उन्हें यूं ही जाने देता ? तब से मैं उन्हें  व्रत नहीं रखने देता किंतु  आज भी सजती -संवरती उसी तरह हैं ।

 उनके कहने से पहले ही, शाम को बाजार ले जाकर उन्हें  सामान दिलवा लाया था। कहतीं हैं ,भले ही मैं व्रत नहीं रख पाती किन्तु अपने पति के लिए सजने का मुझे अधिकार है। 

हम दोनों प्रेम से रहते हैं, एक दिन व्रत रखें, और सारी साल लड़ते -झगड़ते रहें।  एक दूसरे का सम्मान न करें ! उससे क्या लाभ है ?ये जो  सालभर का त्यौहार आता है ,उन रिश्तों को जिन्दा कर जाता है ,जो अपनी ज़िम्मेदारियों तले बुझने से लगते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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