केतकी के पिता ने, उसे अहाते में जाते देख लिया। उनके मन में विचार भी आया ,ये तो अपनी सहेली के यहाँ जाना चाहती थी ,अहाते में क्यों जा रही है ? तब उन्होंने सोचा ,हो सकता है ,मवेशियों को पानी पिलाने जा रही होगी। उसकी सहायता के लिए वे भी आना चाहते हैं। तभी उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ ,जैसे किसी ने उसका हाथ पकड़कर अंदर खींचा हो। उन्हें, अपने आप पर भ्रम हुआ ,मैंने जो कुछ भी देखा , क्या वो सही था ,क्या पहले से वहाँ कोई है ? हो सकता है ,वहां कोई हो ,उसकी सहेली यहीं आ गयी हो।
यही तो होता है ,हमें अपने रिश्तों पर इतना विश्वास होता है। इतना सोच ही नहीं पाते , कि कोई कुछ गलत भी कर सकता है। सभी रिश्ते हमें प्यारे होते हैं ,विशेषकर माता -पिता का बच्चों से रिश्ता !उन्हें लगता ही नहीं ,हमारा बच्चा कुछ गलत सोच या कर भी सकता है। वो अपने अभिभावक की दृष्टि में अभी भी मासूम और छोटा बच्चा ही रहता है। तभी तो केशवदास जी ने जब अपनी पत्नी को आगाह किया ''कि बच्ची अब बड़ी हो रही है ,इसका ख़्याल रखना। ''तब उसने केशवदास जी को आगे सोचने का मौका न देते हुए बोली - हमारी बच्ची ऐसी नहीं है।
अब केशवदास जी ने देखा ,उनकी बेटी का किसी ने हाथ पकड़कर अंदर खींचा है ,तब भी उन्हें अपनी दृष्टि के भर्मित होने का अहसास हो रहा है और सोचते हैं ,उसकी सहेली यहीं आ गयी होगी ,उसने अपने घर नहीं बुलाया। उसके व्यवहार से उन्हें लगा, अवश्य ही कोई बात तो है। जैसे ही उन्होंने अहाते में कदम रखा , उन्हें किसी से बात करने की फुसफुसाहट उन्हें सुनाई दी।
किन्तु वो आवाज की लड़की की नहीं, लड़के की थी ,वो चुपचाप जिज्ञासावश आगे बढ़े, जिधर से आवाज आ रही थी ,उधर की तरफ बढ़ रहे थे। तभी उन्होंने आवाज लगाई -प्रेम ! तू कहां है ? उनके इतना कहते ही वहां पर सन्नाटा छा गया।
वो उसे खोजते हुए ,उस तरफ बढ़े जिधर से आवाज आ रही थी ,वे मवेशियों की तरफ गए ,केतकी वहां भी नहीं थी। जिधर मवेशियों का भूसा रखा हुआ था, उधर की तरफ बढ़ गए ,अब उन्हें पक्का विश्वास हो गया ,अवश्य ही कोई बात तो है ,कोई लड़का भी यहां है। अभी तक तो उन्हें कोई शक नहीं था किंतु अब इस तरह सन्नाटा छाने पर, केतकी के जवाब न देने पर उन्हें शक हो गया।
अवश्य ही बात तो कुछ और है ,वो यहां इन मवेशियों के लिए नहीं आई है। इस तरह जबाब न देने का क्या मतलब है ?उनकी अनुभवी आँखें बहुत कुछ देख रहीं थीं। अंदर ही अंदर उनके खून में उबाल आने लगा। उसके साथ कौन हो सकता है ? यह भी जानने की जिज्ञासा तीव्र हो गई। वो सभी जगह घूमते हुए, आगे बढ़ रहे थे। तभी उन्हें एक हाथ दिखाई दिया ,कौन है ? कौन है ,वहां से बाहर निकल आओ ! वहां सामान ही इतना पड़ा था , उससे टकराने की आवाज आते ही ,वो तेज क़दमों से आगे बढ़े और उन्होंने केतकी को देख लिया ,जो दीवार की आड़ में छुपने का प्रयास कर रही थी। उसे देखकर उन्होंने पूछा -प्रेम ! तू यहां क्या कर रही है ?
घबराते हुए केतकी धीरे से बाहर आई ,उसे लगा ,पापा ने अभी दीपक को नहीं देखा है। तब बाहर आकर बोली -पापा ! वो मैं यहां इन मवेशियों के लिए.......वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई ,तभी उनकी आवाज गूँजी -कौन है ? बे!!!बाहर निकल ! फिर केतकी से पूछा -तेरे साथ कौन है ?
केतकी ने, अपने पापा की तरफ देखा,उनकी गुस्से से आँखें लाल थीं। केतकी अपने पापा का गुस्सा जानती थी। यह देखकर उसका तन काँप गया - ''कोई नहीं ''टूटे शब्दों में बोली।
कुछ देर तक जब कोई बाहर नहीं आया ,तब वो बोले -जो भी वहां पर है ,वह बाहर निकल आए कहते हुए वे पास पड़ा हुआ, लठ्ठ उठाकर बोले - मैंने तुझे देख लिया है ,तू बाहर आता है या मैं भीतर आऊँ। श्याम वहां से भाग जाना चाहता था, लेकिन वहां पर कोई दूसरा रास्ता भी नजर नहीं आ रहा था। जब उसे लगा कि वह फंस गया है और अब निकल पाना सम्भव नहीं है ,तब सोचा - बाहर जाना ही उचित रहेगा।
भूसे की ढ़ेरी के पीछे छुपा दीपक बाहर आ गया। यह देखकर केतकी वहां से जाने लगी ,केशवदास जी कठोरता से बोले -चुपचाप यहाँ खड़ी रह......
दीपक को देखकर उन्हें, समझते देर नहीं लगी कि यहां क्या हो रहा है ? उन्होंने केतकी को घूरा और उससे ही पूछा - यह कौन है ? और यहां क्या कर रहा है ? यहां किस लिए आया है ?किन्तु केतकी की तो जैसे जबान ही सूख गयी थी ,बोल ही नहीं निकल रहे थे। बोलती, क्यों नहीं ?
पापा ! मैं, इसे नहीं जानती।
तो फिर यह यहां क्या कर रहा है ? तब दीपक की तरफ देखते हुए बोले - तू ,कौन है ?किन्तु दीपक की तो जैसे साँस ही अटक गयी।
अरे...बोलता क्यों नहीं ?''क्या तेरे मुंह में दही जमा है ?''
जी, मैं इधर से गुजर रहा था।
मैंने पूछा -तू ,यहाँ क्या कर रहा है ? इस गांव का तो नहीं लगता ,किस गांव से आया है ?
चंद्रोली गांव से हूँ ,सिर झुकाये हुए वो बोला।
हम्म्म्म यहाँ क्या करने आया है ? क्या नाम बताया ?
जी, मेरा नाम श्याम है ,मैं वो.... उसके आगे बोलते उसके शब्द हलक में ही अटक गए ,जब उसने उनके हाथ का वो मोटा लट्ठ देखा।
बोल जल्दी !वो जोर से चिल्लाये।
उनकी आवाज से और ड़र से श्याम काँप उठा और बोला -मैं ,केतकी से ही मिलने आया था।
यह तो मना कर रही है ,तुझे जानती भी नहीं।
इसी ने, मुझे बुलाया है।
इसने, तुझे यहां क्यों बुलाया है ?ये ,तुझे कैसे जानती है ?
दोनों चुपचाप खड़े हो गए , तब उन्होंने केतकी से पूछा -तू ,इसे कब से जानती है ? यह तुझे कहां मिला ?
केतकी ड़र के मारे चुपचाप खड़ी रही, एकदम से वो चिल्लाए -बताती क्यों नहीं ?
डरते हुए, बोली - पापा !ये भाई के विवाह में आया था, मैंने इसे तभी से देखा था।
फिर यह यहां क्या कर रहा है ?
केतकी फिर चुप हो गई ,शांत खड़ी रही हालांकि केशव जी समझ गए थे किंतु उन्होंने जानना चाहा, कि ये एक दूसरे को कितना जानते हैं ? केतकी देख रही थी ,'जो श्याम बढ़-चढ़कर मेरे सामने कितनी डींगें मारता था।'' आज उसके पिता के सामने ''भीगी बिल्ली बना हुआ'' खड़ा था। उसने श्याम की तरफ देखा, और इशारा किया, कि बताते क्यों नहीं हो ? किंतु वह कुछ भी नहीं बोला।
तब केशव जी ने उससे पूछा - तू, यहां कैसे आया ? क्या तेरा यहां कोई रिश्तेदार रहता है ? तुझे किसने बुलाया है, किस परिवार से है ?
जी, इसी गांव की पिछली पट्टी में मेरा दोस्त रहता है। पिछली पट्टी का नाम सुनकर, उनका पारा और तेजी चढ़ गया और बोले - तो तू पिछली पट्टी से आया है, कौन बिरादरी है ? रे !!!! अपना नाम बता।
