Dhokha [part 43]

 नंदिनी अपने ख्यालों में खोई हुई आईने के सामने बैठी ,अपने जीवन के विषय में सोच रही थी। तभी उसे बाहर शोर सुनाई दिया -मेहमान, आ गए ,बहन का स्वर सुनाई दिया। 

नंदिनी, को बुलाओ ! उससे माँ कह रही थी, लेकिन नंदिनी के मन में तो जैसे उन मेहमानों से मिलने की कोई जिज्ञासा ही नहीं रह गई थी।

 अभी इतनी जल्दबाजी क्या है ?अभी तो वो लोग आए हैं ,चाय -पानी पियेंगे ! दादी की आवाज सुनाई दी। नंदिनी को थोड़ी देर में बुलवाना। 


बाहर से माँ की आवाज आ रही थी, जो शायद मेहमानों का स्वागत कर रही थीं ,उनकी आवाज में आज खनक थी ,चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी। नंदिनी अंदर बैठे हुए ही,उन आवाजों को महसूस कर रही थी। अच्छा लग रहा है, कम से कम इस बहाने माँ के चेहरे पर मुस्कुराहट तो आई। वे भी क्या कर सकती हैं ?अपने बच्चे की चिंता तो रहती ही है। अब चाहे ,कुछ भी हो जाये ,अब माँ की इस ख़ुशी को उनके चेहरे से दूर नहीं होने दूंगी। जैसा भी लड़का होगा ,विवाह से इंकार नहीं करूंगी। नंदिनी की हार, उसे ऐसा सोचने पर मजबूर कर रही थी। अब वो हताश हो चुकी थी ,इसीलिए उसने अपनी ज़िंदगी को वक़्त के हवाले करना ही बेहतर समझा। 

 बाहर से कभी आवाज सुनाई देती, पानी लाओ ! और कभी चाय बनवाओ ! नाश्ता ले आओ ! इस तरह की आवाजें आ रही थी किन्तु नंदिनी को इन सबमें कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। मन में विचार आया ,मेरी ज़िंदगी से प्रतीक भी गया और उसका बेटा भी दूर हो गया। दीपक को मेरे सभी हालात मालूम थे ,इसीलिए उससे उम्मीद लगा बैठी थी ,वो मुझे समझेगा और मेरे बेटे से भी मुझे मिलवाएगा। वो भी 'धोखा 'दे गया। सोचकर उसकी पलकों पर कुछ मोती चमकने लगे ,जिन्हें नंदिनी ने गिरने नहीं दिया। एक गहरी स्वांस लेते हुए सोच रही थी - किन्तु मेरे मन को ये तो सुकून है ,उनका बेटा मेरे कारण इस दुनिया से गया। उसके बदले, मैंने अपना बेटा देकर, उनका ऋण चुकाया।  

कुछ देर की औपचारिकता के पश्चात, नंदिनी की छोटी बहन उसे बुलाने के लिए कमरे में प्रवेश करती है। कमरे में प्रवेश करते ही प्रसन्नता से बोली -दीदी ! जीजाजी तो बहुत 'स्मार्ट 'हैं। 

तू पागल है, क्या ? वो तेरा जीजा कब से हो गया ? वो लोग, मुझे देखने आये हैं ,अभी विवाह नहीं हुआ है।

 लड़का तो बहुत अच्छा लग रहा है, जीजा भी बन ही जायेगा। आओ ,चलो !आपको भी बुलाया है। 

उसके परिवार में से कौन-कौन आया है ? नंदिनी ने उससे पूछा। 

लड़का है, लड़के की मां है और उसकी बहन है। 

यह सुनकर नंदिनी को झुंझलाहट हुई और सोचने लगी -क्या पूरे परिवार को ही उठा कर लाया है ? प्रत्यक्ष बोली - क्या मेरी नुमाइश लग रही है ? उसे बड़ा अजीब लग रहा था। 

यह आप क्या कह रही हैं ? भाई की शादी है, भाभी को देखने बहन तो आएगी ही,इसमें नुमाइश की क्या बात है ? आप भी तो उन लोगों को देखेंगीं ,हम सबने भी देखा है। ऐसे में लड़का कहने लगे ,'मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो ?क्या मेरी नुमाइश लगी है ?

तू ,कुछ ज्यादा नहीं बोल रही है ,नंदिनी उसे घूरते हुए बोली। 

 वो तो स्वयं आपके घर चल कर आए हैं। 

हां हां मुझे समझाने की  आवश्यकता नहीं ,अब जब तक मैं वहां नहीं चली जाती, तू कुछ नहीं बोलेगी ,समझी !

 जैसे ही नंदिनी बाहर जाने के लिए खड़ी हुई, तब उसकी छोटी बहन ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा और बोली -नन्ही सी बिंदी और लगा लेतीं  तो और ज्यादा अच्छी लगती। 

नहीं ,बिंदी की कोई जरूरत नहीं है, ऐसे ही ठीक है। क्या बिना बिंदी के वो लोग मुझे पसंद नहीं करेंगे, चिढ़ते हुए नंदिनी ने कहा। 

अपनी बहन को साथ लेकर ऋचा  कमरे से बाहर आई ,लो ! हमारी दीदी भी आ गईं  ,कहते हुए उसने नंदि नी को बैठने के लिए कुर्सी की तरफ इशारा किया।

 उन दोनों महिलाओं ने उसे देखा, और नंदिनी ने उन्हें देखकर अंदाजा लगाया -कि जो थोड़ी बुजुर्ग लग रही है,वो इसकी मम्मी होगी और दूसरी उनकी बेटी, अभी तक उस लड़के की पीठ नंदिनी की तरफ थी, तब उस महिला ने नंदिनी को सामने बैठने का इशारा किया। आओ, यहां बैठो ! उसने बड़े प्यार से नंदिनी को अपने समीप की कुर्सी पर उसे बिठलाना चाहा ,फिर नंदिनी की तरफ देखा, उसके पश्चात अपनी बेटी की तरफ देखा और बोली - तुम्हारी बिटिया तो सुंदर है, हमें पसंद आ गई।

 दीपक ! तू भी इधर आजा ! तू भी देख ले ! जैसे ही उन्होंने, लड़के का नाम लिया, नंदिनी चौंक गई और उसके ह्रदय की धड़कने तीव्र हो उठीं। उस महिला ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा - जी, पसंद तो इन दोनों की ही है, पूरा जीवन तो इन्हें ही साथ में व्यतीत करना है। हम तो सिर्फ इन्हें मिलाने के माध्यम हैं। नंदिनी के मन में उत्सुकता जागी, और दीपक नाम सुनकर उसके मन में दीपक की छवि उतर आई।

 तब उसने घूम कर देखा, और वह यह देखकर सन्न रह गई यह दीपक और कोई नहीं, नानी का पड़ोसी 'दीपक' ही था। ऐसा कैसे हो सकता है ? क्या मेरी नज़रें 'धोखा 'खा रही है ? इसे मेरे घर परिवार के विषय में कैसे पता चला ? उसे देखकर दीपक मुस्कुराया। 

किंतु नंदिनी का क्रोध बढ़ गया। यह सब क्या है ? क्या दीपक मुझसे झूठ बोल रहा था ? कि वह उसकी पत्नी थी। जब यह शादीशुदा है तो क्या यहां मेरे साथ मजाक करने आया है या मेरे घर वालों को मूर्ख बनाने आया है ? नंदिनी उलझन में उलझ कर रह गई। तब वह एकदम से उठी, और' माफ कीजिएगा ' कहकर अंदर की तरफ गई। अंदर पहुंचकर उसने अपनी मम्मी को पुकारा -मम्मी ! इधर आओ ! 

तू इस तरह यहां कैसे उठकर आ गई ? उन लोगों के पास वहीं पर बैठ और उनसे बातचीत कर.... 

मैं आपसे यह पूछना चाहती हूं, क्या यही रिश्ता मेरे लिए आया था ?

हां, मैं इसी रिश्ते की बात कर रही थी।

 आपको यह रिश्ता किसने बताया था ? 

हमें यह रिश्ता किसी ने नहीं बताया था, बल्कि ये लोग खुद चलकर तेरे लिए रिश्ता लेकर आए थे। 

क्या आप लोग, इन लोगों के विषय में जानती हैं, कौन है ,कहां से हैं, इनके विषय में सम्पूर्ण  जानकारी  निकाल ली थी , आपने !

 इन लोगों ने हमें सब सच बतला दिया है,माँ ने मुस्कुराते हुए कहा। 

 क्या सच बताया है ? यह जो लड़का है, इसका एक बार विवाह हो चुका है और 3 साल से इसकी पत्नी के साथ और इसके बीच झगड़ा चल रहा था और अभी कुछ दिनों पहले उसका तलाक हुआ है। 

यह सब आप जानती हैं,

 इन लोगों ने ही बताया था। तू यह सब क्यों पूछ रही है ?यह बात तो हम बाद में भी कर सकते थे। 

आपने मुझे पहले बताया ही नहीं, यही तो नानी का पड़ोसी' दीपक' है। 

हां जानती हूं, मां मुस्कुराई। नंदिनी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मेरे साथ यह कौन सा खेल खेला जा रहा है ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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