नंदिनी बेमन से ,उसको देखने आये, लड़के के घरवालों के सामने आ जाती है, किन्तु यह जानकर हैरत में पड़ जाती है कि उसको देखने कोई और नहीं दीपक और उसका परिवार ही आया है। उसे दीपक पर क्रोध था ,तब अपनी मम्मी से जानना चाहती है,' कि वो उसके परिवार के विषय में कितना जानती हैं ? तब वो सब सच्चाई बतातीं हैं और तब मां बोली -यहां खड़ी होकर क्या सोच रही है ? जा उन लोगों के साथ बैठ....वो क्या सोचेंगे ? लड़की उठकर चली गई।
यह सब मुझे दीपक पहले भी तो बता सकता था, उसने आज तक मुझे यह सब क्यों नहीं बताया और उस दिन बताया भी और आधी -अधूरी बात करके चला गया। उसने ऐसी कोई योजना मुझे नहीं बताई, मां के कहेनुसार वह वहां पर चली तो गई ,किंतु अंदर ही अंदर उसे गुस्सा आ रहा था।
उसे आया देख कर, लड़के की मां ने कहा -नंदिनी आ गई , क्या कोई परेशानी है ?वो जानना चाहती थी ,कि लड़की को हमारे आने से कोई परेशानी तो नहीं ,तब उन्होंने पूछा - बेटा ! तुमने हमारा बेटा तो देखा है ,तुम्हें पसंद है। नंदिनी ने अपनी गर्दन झुका ली ,कोई और समय होता तो वो बहुत खुश होती और दोनों बाहें फैलाकर कहती -पसंद नहीं ,बहुत पसंद आया किन्तु आज वो क्या कहे ?जब जीवन से हताश हो चली थी ,तब ये ख़ुशी अनचाही सी लग रही थी। अभी भी वो दीपक से बहुत कुछ कहना और पूछना चाहती है।
तब नंदिनी की मम्मी बोली -इतने लोगों के सामने कैसे कहेगी ?हो सकता है ,ये लड़के से कुछ कहना चाहती हो।
हांजी ,अब हम कौन होते हैं ? चलो !अब तुम दोनों ही कुछ देर बैठ कर आपस में बात कर लो ! एक दूसरे को समझ लो ! किसी से कुछ कहना सुनना है, या तुम दोनों ने क्या निर्णय लिया हमें बता देना ! उन दोनों को एक अलग स्थान दिया जहां पर बैठकर वह दोनों आपस में बातें कर सकें। एकांत मिलते ही नंदिनी ने सीधे -सीधे दीपक से पूछा - यह सब क्या है ?
तुम तो बीमार हो गई थी, इसलिए तुम्हें देखने चला आया ,कहकर मुस्कुराया।
दीपक, मुझे मजाक बिल्कुल भी पसंद नहीं है ,इस समय मैं बहुत गंभीर हूँ। एक तरफ तुम बताते हो तुम्हारी पत्नी तुमसे मिलने आई, दूसरी तरफ तुम मेरे घर रिश्ता लेकर पहुंच गए।
तुम बीमार थीं ,न... ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
मैं कोई बीमार नहीं हूँ ,तुम्हारी बातों को सुनकर ही ,मैं बीमार हो गयी थी ,मेरी बीमारी का कारण भी तुम्ही रहे हो।
मैं ये भी जानता हूँ। मैं ,तुमसे बताना चाहता था किन्तु तुम तो यहाँ चली आईं।
क्या बताना चाहते थे ? इतने दिनों से हम मिल रहे हैं ,उस दिन ही, क्या ऐसी विशेष बात हो जाती ?
हाँ ,विशेष ही तो थी ,जिस दिन तुमने, मुझे मेरी पत्नी के साथ देखा ,उस दिन हमारा आख़िरी दिन था। कुछ देर के लिए वहां गये थे। तलाक़ हो जाने पर ही, मैं तुम्हें सब बताना चाहता था।
तुम ये भी तो बता सकते थे ,कि मेरा विवाह हो चुका है और अब तलाक का केस चल रहा है।
हाँ ,बता सकता था किन्तु मैं नहीं चाहता था ,मेरी ज़िंदगी का जो हिस्सा मुझे दर्द दे रहा है ,उसे तुम भी महसूस करो या परेशान हो। तुम जरा ठंडे दिमाग़ से, शांत मन से सोचो ! मैं ये सब होने से पहले किसी भी तरह का कोई वायदा नहीं करना चाहता था। अब मैं निश्चिन्त हूँ ,इसीलिए यहां आ गया।
इतने झूठ के पश्चात ,तुमने अब ये कैसे समझ लिया ? मैं तुम्हें हाँ कर दूंगी।
तुम्हारी इच्छा है ,मुझे लगा था ,तुम ,मुझसे प्रेम करने लगी हो।
वैसे तुम्हें मेरे घर का पता किसने दिया ?
ये कोई बड़ी बात है ,उस दिन मैं नानी से तुम्हारे लिए पूछने गया था ,तब नानी को मैंने समझाया सारी बातें बताई थीं और वो समझ भी गयीं।
क्या ?? नानी सब जानती हैं, उन्होंने मुझसे एक बार भी कुछ नहीं कहा।
ह्म्म्मम्म मुस्कुराते हुए दीपक ने कहा।
मैं अंदर ही अंदर कितनी घुटती और परेशान होती रही और किसी ने भी ,मुझसे कुछ नहीं बताया।
इससे, तुम्हें अपनी मुहब्बत का एहसास तो हुआ कि तुम, मुझसे कितना प्यार करने लगी हो ?
नहीं ,ऐसा कुछ नहीं है ,बस तुम पर गुस्सा था ,मुँह फुलाते हुए नंदिनी बोली।
अब दिल ही दिल में ख़ुशी भी तो उतनी ही हो रही है ,कहकर दीपक हंस दिया।
वहां क्या हो रहा है ? मुझे तो लगता है ,आज ही ये दोनों सारी बातें कर लेंगे ,दीपक की मम्मी ने कहा।
सभी मुस्कुरा दिए और नंदिनी की मम्मी ने उसे आवाज लगाई - नंदिनी ! बेटा आ जाओ !
माँ की आवाज सुनकर नंदिनी बाहर आ गई और दीपक भी अपने परिवार के साथ जा बैठा। दीपक की मां ने उससे प्रश्न किया - बात हो गई, दीपक ने धीरे से हाँ में गर्दन हिलाई। तब उसकी मम्मी ने, नंदिनी की मम्मी से कहा - हमारे बेटे की तो हां है, आप अपनी बेटी से भी पूछ लीजिए !
इसमें पूछना ही क्या है ? दोनों इतनी देर से बातें कर रहे थे, हमें समझ जाना चाहिए।हाँ, ही होगी।
नहीं, ऐसा नहीं है. बेटी का जवाब भी तो हमें मिलना चाहिए, उसे हमारा बेटा पसंद आया या नहीं।
वो तो पहले से ही जानती थीं ,' दीपक और नंदिनी एक दूसरे से मिलते थे, किंतु यह नहीं जानती थीं कि दीपक ने भी अपनी मम्मी को बताया हुआ है या नहीं कि वह पहले से ही एक दूसरे को जानते हैं। इसीलिए चुपचाप उठकर अंदर आ गईं और नंदिनी के पास जाकर बोली - लड़के की मां पूछ रही है -' कि लड़की का क्या जवाब है ?
नंदिनी मां के बात सुनकर चुप हो गई, और बोली -मुझे ,अभी दीपक से कुछ बातें करनी हैं ।
यह सुनकर उसकी मम्मी को गुस्सा आया और बोली -इतनी देर से वहां क्या कर रही थी ?तब नहीं पूछा। क्या बात करनी है ? उसके जीवन में जो कुछ घटा था ,उसने सब कुछ स्पष्ट बता तो दिया है। इस बात को रबर की तरह लंबा क्यों खींचना है ? अब उस लड़की से, उसका कोई संबंध भी नहीं रहा तो फिर और क्या पूछना चाहती है ? उन्हें इस बात का डर था ,'कि हाथ आया रिश्ता ,कहीं फिर से, वापस ना जाये।'' बेटी को समझाना भी जरूरी था। तब बोलीं - अब उससे जो कुछ भी पूछना है, बाद में पूछ लेना ! वहीं चली जाना और पूछ लेना।
बाद में कब पूछूंगी ? जब शादी हो जाएगी, तब....ज़िद करते हुए नंदिनी ने पूछा।
तो तू क्या चाहती है ? इन लोगों से मना कर दें ! हो सकता है, यह बात उन्हें बुरी लग जाए और बाद के लिए भी मना ही कर दें।
इतना घबराने की आवश्यकता नहीं है, नंदिनी को विश्वास था ,'कि दीपक उससे विवाह के लिए इंकार ही नहीं करेगा। किंतु माँ को डर था,' यदि इसके परिवार वाले बुरा मान गए , तो शायद रिश्ता ही न तोड़ दें।''
तब उसकी मम्मी अपनी सास से बोली -इसकी हरकतें देख रही हैं , घर में वो लोग, इसके जवाब की प्रतीक्षा में बैठे हैं और यह 'हां' नहीं बोल रही है।
तू क्या चाहती है ? दादी ने सीधे नंदिनी से पूछा -क्या बाप की बेइज्जती होने में, थोड़ी कमी रह गई है ? रिश्ता आ रहा है ,तो उसे मना क्यों कर रही है ?
दादी ! मैंने मना नहीं किया है।
हां भी तो नहीं बोल रही है, मम्मी ने दबी आवाज में कहा।
अच्छा ! आपके जो मन में आये ,उनसे कह दो ! हाथ जोड़कर उनसे पीछा छुड़ाने के लिए नंदिनी ने कह दिया।
