अभी मोहिनी और भानु को ,कक्ष में जो संदूक मिला था ,उसके सामान की जाँच कर रहे थे। तभी विक्रम हवेली में आ जाता है और उन्हें फोन पर एक तस्वीर दिखाता है। तब मोहिनी ने तस्वीर को बड़ा किया, व्यक्ति के हाथ में एक छोटी धातु की सीटी थी ,यह देखकर उसका दिल जोरों से धड़कने लगा।यह सीटी…” उसने फुसफुसाकर कहा- “मैंने इसे पहले भी कहीं देखा है।”
विक्रम ने तुरंत पूछा - “कहाँ?”
“मुझे पूरी तरह याद नहीं ,लेकिन बचपन में उस बच्ची के पास ऐसी ही सीटी थी। वह उसे अपने गले में बाँधकर रखती थी।”
यह सुनकर भानु ने, फोन अपने हाथ में लिया और तस्वीर की बारीकियाँ देखने लगा और बोला - यह तस्वीर पुरानी हो सकती है, लेकिन संदेश अभी भेजा गया है। इसका मतलब है कि कोई तो है जिसे हमारे हर पल की ख़बर है।
“या कोई हमें उस व्यक्ति तक पहुँचाना चाहता है,” विक्रम ने कहा।
मोहिनी ने, विक्रम की बात पर गौर किया ,ओर उसकी तरफ देखते हुए पूछा -क्या आपको इस तस्वीर के बारे में कुछ पता है?”
विक्रम ने तुरंत उत्तर नहीं दिया, उसकी चुप्पी ने मोहिनी को और बेचैन कर दिया।“विक्रम जी ! आप पहले भी बहुत कुछ जानते हुए चुप रहे। अब कृपया ऐसा मत कीजिए ! अगर आप कुछ भी जानते हैं -कि यह व्यक्ति कौन है, तो हमें बताइए !”
विक्रम ने एक लंबी गहरी साँस ली,तब उसने कहना आरम्भ किया -“मैं इस व्यक्ति को पहचानने का दावा तो नहीं कर सकता, लेकिन रेलवे प्लेटफॉर्म देखकर मुझे एक घटना याद आई है। 2001 में, अस्पताल के रिकॉर्ड बदलने के कुछ ही दिनों बाद, एक बच्ची को शहर से बाहर भेजा गया था। उसके साथ कौन गया, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, केवल एक टिकट की प्रति मिली थी।”
“वो प्रति किस नाम से थी ? मोहिनी ने प्रश्न किया ।
“नाम काट दिया गया था, लेकिन टिकट के पीछे दो अक्षर लिखे थे—M.V.”
मोहिनी और भानु ने एक साथ एक-दूसरे की ओर देखा और उनके मुख से निकला -M.V. वही अक्षर अस्पताल की फाइल में भी थे।
“क्या वह' माधव वर्मा' हो सकता है? मोहिनी ने प्रश्न किया।
विक्रम ने सिर हिलाया ,हो सकता है लेकिन अभी हमारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है ,ताकि हम कह सकें कि' माधव वर्मा 'ही उस बच्ची को लेकर गया था।
भानु ने ,फोन वापस विक्रम को दिया और बोला - हमें उस टिकट की प्रति चाहिए और हमें यह भी पता करना होगा, कि यह तस्वीर किस स्टेशन की है ?”
विक्रम ने तस्वीर को फिर से देखा, यह तो कोई पुराना दिल्ली का रेलवे स्टेशन लगता है, लेकिन तस्वीर में प्लेटफॉर्म का नंबर स्पष्ट नहीं है।”
मोहिनी के मन में एक निर्णय आकार लेने लगा और बोली -“हम वहाँ जाएँगे।”
भानु ने ,तुरंत कहा, “अभी नहीं ,अब बहुत रात हो चुकी है, और हमें यह भी नहीं पता,' कि संदेश भेजने वाला कौन है ?हो सकता है ,ये हमें फंसाने के लिए किसी की चाल हो, अगर वह हमें फँसाना चाहता है, तो हम सीधे उसके जाल में नहीं जाएँगे।”
तो क्या हम फिर इंतज़ार करेंगे?”मोहिनी की आवाज़ में पहली बार तीखापन था,“सालों से सबने मेरे लिए फैसले लिए हैं, किसी ने मुझे बचाने के नाम पर सच छिपाया है , किसी ने मेरे नाम और पहचान को बदल दिया। मैं अब केवल इसलिए नहीं रुकूँगी कि कोई अनजान व्यक्ति हमें डराना चाहता है।”
भानु उसकी बात सुनता रहा ,फिर उसने कहा - “मैं तुम्हें रोक नहीं रहा हूँ। मैं चाहता हूँ, कि हम वहाँ पूरी तैयारी के साथ जाएँ। कल सुबह हम स्टेशन के पुराने रिकॉर्ड और उस टिकट के बारे में पता करेंगे। विक्रम हमारे साथ होगा और इस बार हम किसी को अकेले फैसला नहीं करने देंगे।”
मोहिनी ने अपनी सहमति देते हुए सिर हिलाया ,ठीक है ,जैसा तुम उचित समझो ! लेकिन मैं अब पीछे नहीं हटूँगी।”
रात गहरी हो चुकी थी। मोहिनी अपने कमरे में थी। बक्से से मिली तस्वीर और लाल फीते का टुकड़ा उसने अपने पास रख लिया था। भानु नीचे विक्रम के साथ पुराने रिकॉर्ड की सूची तैयार कर रहा था। घड़ी में एक बजकर पचपन मिनट हुए थे। मोहिनी ने बत्ती बुझाई और अपने बिस्तर पर लेट गई। उसकी आँखों में नींद नहीं थी। बार-बार उसे वही तीन पलंग, मिटाया हुआ चेहरा और लाल फीता याद आ रहा था ,वही विचार उसके ज़हन में घूम रहे थे। तभी घड़ी की सुइयाँ दो पर पहुँचीं।
ठक… ठक… ठक… दरवाज़े पर तीन धीमी दस्तकें हुईं ,मोहिनी उठकर बैठ गई ,“कौन है? उसने पूछा।
जब बाहर से ,कोई उत्तर नहीं आया ,तब उसने दरवाज़ा खोला, गलियारा खाली था ,लेकिन फर्श पर एक छोटा-सा कागज़ पड़ा था।मोहिनी ने उसे उठाया, उस पर केवल एक वाक्य लिखा था—“तीसरे पलंग के नीचे देखो ! लेकिन भानु को मत बताना। मोहिनी का चेहरा सख्त हो गया ,इसका अर्थ है ,किसी को पता था कि वे कमरे में क्या खोजकर आए हैं ? किसी को यह भी पता था कि बक्से में क्या मिला ?वह धीरे-धीरे उस बंद कमरे की ओर बढ़ी।
गलियारे के मोड़ पर पहुँचते ही उसे पीछे से किसी की आवाज़ सुनाई दी -मोहिनी !वह पलटी।वहां भानु खड़ा था ,उसकी नज़र सीधे मोहिनी के हाथ में पकड़े कागज़ पर गई ,तुम इस समय अकेली कहाँ जा रही हो?”
मोहिनी कुछ पल चुप रही, फिर उसने कागज़ उसकी ओर बढ़ा दिया।
भानु ने भी उस कागज़ को पढ़ा, उसके चेहरे पर नाराज़गी नहीं, बल्कि गहरी चिंता उभरी। तब वो बोला - तुमने, मुझसे इस विषय में छिपाने के बारे में ,सोचा भी कैसे?
मोहिनी ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने अभी तक कुछ तय नहीं किया था।”
“मोहिनी !मैं तुम्हारे हर कदम पर पहरा नहीं देना चाहता, लेकिन जो व्यक्ति तुम्हें आधी रात को संदेश भेज रहा है, वह हमारे बारे में बहुत कुछ जानता है। अगर वह तुम्हें अकेले बुला रहा है, तो हमें और सावधान होना चाहिए।”
मोहिनी ने उसकी आँखों में देखा और पूछा - क्या तुम मेरे साथ चलोगे?”
भानु ने बिना एक क्षण गँवाए उत्तर दिया -“हाँ।”
दोनों उस कमरे में पहुँचे, दरवाज़ा खोलकर वे तीसरे पलंग के पास गए। भानु ने पलंग को थोड़ा खिसकाया। नीचे लकड़ी की एक पतली पट्टी दिखाई दी, जो बाकी फर्श से अलग थी।उसने वो पट्टी उठाई ,अंदर एक छोटा-सा कपड़े का थैला था। थैले में एक पुरानी पीतल की सीटी, आधी जली तस्वीर और एक कागज़ रखा था।तस्वीर में वही तीन बच्चे थे ,लेकिन इस बार तीसरे बच्चे का चेहरा मिटाया नहीं गया था।
मोहिनी ने वो तस्वीर हाथ में ली, उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं ,चेहरा धुँधला था, फिर भी वह एक बात पहचान सकती थी—बच्चे की कलाई पर लाल फीता था। कागज़ पर लिखे शब्द पढ़ते ही भानु के चेहरे का रंग बदल गया।
