आज चिंतामणि के लिए एक पत्र आया ,चिंतामणि अपनी ही परेशानियों में उलझी थी ,अपने नाम का पत्र देखकर सोचने लगी - मुझे किसने पत्र लिखा होगा ? वह सोच रही थी, सोचते हुए उन्होंने, लिफाफा अपने हाथ में लिया और अंदर जाकर लिफाफा खोला।
आदरणीय मौसी जी नमस्ते !
मुझे उम्मीद है, आप सभी स्वस्थ और सकुशल होंगे। बहुत दिनों से आपकी याद सता रही थी। सोचा, आज मौसी जी को चिट्ठी ही लिख लेती हूं। कई दिनों से मेरी जेठानी भी, कह रही थी -'तेरी मौसी के यहां तो उन की बेटी है, अब तो विवाह लायक हो गई होगी।' मौसी जी, आप तो जानती ही हैं , हमारी सास तो है, नहीं। अब अपने देवर के विवाह की ज़िम्मेदारी ,हम दोनों देवरानी- जेठानी को ही उठानी है। आप तो हमारे परिवार को जानती ही हैं ,सभी भले लोग हैं। हमारे देवर का भी विवाह हो जाए इसीलिए उनके लिए लड़की ढूंढ रहे हैं, वह अब फौज में भर्ती हो गए हैं, सूबेदार बने हैं। यदि आप बुरा ना माने, तो अपनी 'प्रेम' उनके लिए कैसी रहेगी ? आप उसके लिए भी तो लड़का ढूंढ़ रही होंगी।
आपने मेरा देवर तो देखा ही होगा बिल्कुल सीधे -सच्चे इंसान हैं।मैंने सोचा ,क्यों न अपनी रिश्तेदारी में से ही लड़की ले आएं। तब मुझे 'प्रेम 'का ख़्याल आ गया। बहुत दिन हो गए, मैंने प्रेम को भी नहीं देखा ,पर मैं सोचती हूं, आपको यदि उचित लगे तो अपनी 'प्रेम' उनके लिए कैसी रहेगी ? सोच -विचारकर जबाब दीजियेगा।
अच्छा ,अब पत्र बंद करती हूं ,अपना ख्याल रखिएगा। मौसा जी को और आपको प्रणाम ! मेरे अन्य भाई बहन- भाइयों को इस बहन की तरफ से ढेर सारा प्यार ! कोई भी बात हो तो आप मुझे पत्र द्वारा अवश्य सूचित करिएगा। आपके पत्र की प्रतीक्षा में, रेवती !
पत्र को पढ़कर चिंतामणि इतनी खुश हुई, उसे लगा ' जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो ''। केत की के लिए लड़का ढूंढते- ढूंढते लगभग उन्हें एक महीना हो गया था। केतकी अब बहुत ज्यादा ही जिद्दी हो गई थी।
पिता के गुस्से और केतकी की ज़िद के आगे चिंतामणि के घर में सारा दिन कलह का वातावरण बना रहता। पिता ने कह दिया था -कि इस घर से कहीं बाहर नहीं जाना है और वह बाहर जाने के बहाने ढूंढती रहती थी। उन्होंने सोचा ही नहीं था ,इस उम्र में आकर उनकी बेटी इतनी ज़िद्दी हो जाएगी।
यह बात उसके दोनों भाइयों को भी नहीं पता चल पाई ,कि घर में क्या चल रहा है ?क्योंकि सब बातें माता-पिता और केतकी के मध्य ही थीं । बहु को दो दिन पश्चात ही उसके मायके भेज दिया गया था। उसकी तरफ से वो निश्चिंत हो चुके थे कि अब यह खबर हम तीनों के सिवा किसी को मालूम नहीं होगी, किंतु बच्चे महसूस कर रहे थे कि घर में कुछ तो ऐसा अवश्य चल रहा है ,जो हमें बताया नहीं जा रहा है। हंसी-खुशी का वातावरण एकदम शांत और रहस्यमई सा लगता। ऐसा लगता है ,कोई किसी से कुछ कहना चाहकर भी कह नहीं पा रहा है और कहना बहुत कुछ है।
यह बात दोनों भाइयों ने भी महसूस की, अब केतकी भी , पहले की तरह खुश नहीं रहती है गुमसुम सी अपने कमरे में पड़ी रहती है।
एक बार दिनेश ने उससे पूछा भी था, क्या बात है ? अब खेती-बाड़ी के लिए नहीं जाती,आजकल घर में ही पड़ी रहती है।
क्यों, मैंने क्या खेती-बाड़ी का ठेका लिया हुआ है? तुम्हें कमा- कमाकर खिलाती रहूं , और तुम मुस्टंडे यहां पड़े -पड़े ,मौज मस्ती करो !आज तक केतकी ने अपने भाइयों से इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं किया था। उसको इस तरह बोलते देखकर दिनेश ने माँ की तरफ देखा।
चिंतामणि ने बात को संभालते हुए कहा, अभी यह किसी बात से नाराज है, इसलिए ऐसा कह रही है। अब इसके पापा ने ही इसे बाहर जाने से मना किया है ,इसीलिए उनसे नाराज चल रही है।
क्यों ?पापा ने ऐसा क्यों कहा ?
अब इस वर्ष, इसके विवाह के विषय में सोच रहे हैं ,वहां जाकर रसोई संभालेगी या खेती !अब ये तो इसे और हमें दोनों को ही समझना होगा। जाओ ! तुम अपनी पढ़ाई करो ! ये हम संभाल लेंगे और हाँ ,पढ़ाई से थोड़ा समय निकालकर अपने पिता के साथ भी काम करवाया करो ! अब ये बड़ी हो गयी है ,इसे अगले घर जाना है। तुम्हें ये सब संभालना होगा।
जब वह लड़का पढ़ा -लिखा है, मेहनती है ,नौकरी लगने वाला है। उसने मुझे इसीलिए बुलाया था ,वह बताना चाहता था कि उसकी नौकरी लग गई और वह मेरे पापा से, हमारे विवाह की बात करेगा। तब उससे बात करने में क्या बुराई है ?
चिंतामणि देख रही थी ,उसकी ये नादाँ सी लड़की आज उसके प्यार में ,न ही झुक रही है ,न ही किसी भी तरह से इसे लज्जा का अनुभव हो रहा है। आज जब लड़कियां अपने विवाह की बात सुनकर ही लजा जाती हैं और ये उससे विवाह जी ज़िद किये बैठी है। बल्कि इसके तेवर देखकर उन्हें फ़िक्र हो रही थी। कहीं लड़के वाले इसे देखने आये और ये कोई तमाशा न खड़ा कर दे।
तब उन्होंने उससे पूछा - क्या तू उसके बारे में कुछ जानती भी है ,कौन है ,किस परिवार से है ?वैसे ही किसी राह चलते से ऐसे मिलने लगते हैं ,क्या तुझे इतनी भी अक़्ल नहीं ? क्या उसकी इतनी औकात है ,जो तुम्हारे पिता के सामने खड़ा हो सके और उनकी बेटी का हाथ मांगे !
क्यों, उसकी औकात को क्या हुआ है ? अकड़कर आँखें निकालते हुए केतकी बोली।
तुझे तनिक भी शर्म नहीं आती, तू क्यों अपने बाप की इज्जत को बर्बाद करने पर तुली है। क्या तुझे कुछ भी नजर नहीं आता ,उसने तो तेरे सामने ही ,तेरे पिता से झूठ बोला -कि तूने ही उसे बुलाया है। ''
एक ही बात है, उसने मुझे बुलाया हो या मैंने उसे बुलाया हो, क्या फर्क पड़ता है ? बेटी की ढिटाई देखकर, चिंतामणि को गुस्सा आ गया। वो सोच रही थी, कि वे सच ही कह रहे थे ,हमने ही, इसे कुछ ज्यादा ही छूट दे दी, ये कुछ ज्यादा ही बोलने लगी है। यह सोचकर उन्हें गुस्सा आया और उसके मुंह पर एक तमाचा मारा। चुपकर ! तेरी बहुत जबान चलने लगी है। शर्म नहीं आती, देख तेरी दोनों बहनों ने किस तरह अपने पिता के मान -सम्मान को बनाए रखा और अपने घर सम्मान के साथ गई हैं।
और एक तू है ,जो उसी मान -सम्मान को,बर्बाद करने पर तुली है। समाज में जो इज्जत कमाई है , उसे बर्बाद करने चली है। तू क्या चाहती है , क्या तेरा बाप ? उन लोगों से तुम्हारे, विवाह की बात करने जाये। हमारा उनसे दूर-दूर तक भी कोई रिश्ता नहीं हो सकता, न जाने वो ,कैसे तेरे सामने आ गया ?तूने एक बार भी मुझे नहीं बताया।
बताती, तो क्या हो जाता ? ऐसे ही ड्रामे होते। अब तक घर में ,मैं ही सब संभाल रही थी ,तब मान -सम्मान नहीं घटा ,कहने वाले लोग तो तब भी कहते थे -कैसा इंसान है ? बेटी से काम करवा रहा है ,उसे पढ़ाया नहीं ,बेटों को पढ़ा रहा है।
