अगले दिन जब नंदिनी तैयार होकर ,अपनी ट्रेनिंग के लिए जा रही थी, तब उसने देखा, दीपक मोटरसाइकिल लेकर बाहर निकल रहा है। उसने दीपक को नजर अंदाज कर आगे बढ़ना चाहा, तभी दीपक ने उसे आवाज लगाई - नंदिनी ! कहां जा रही हो ?
नंदिनी ,जानबूझकर उसकी आवाज को अनसुना करके आगे बढ़ती रही। तब दीपक ने उसे दुबारा आवाज लगाई। नंदिनी के न देखने पर दीपक ,मोटरसाइकिल चलाकर उसके क़रीब आया और मोटरसाइकिल ठीक,उसके बराबर में रोक दी,और पूछा - इतनी तेजी से कहाँ जा रही हो ?
अरे ,आप ! आप आ गए, अनजान बनते हुए नंदिनी ने पूछा, कल तक तो आप यहां नहीं थे।
हां कल रात्रि के लगभग 11:00 बजे आया था, ऑफिस भी तो जाना था।
अच्छा ,हाँ ये बात तो मैंने सोची ही नहीं,बंदा ! जब यहां नौकरी करता है तो वापस भी यहीं आएगा ,कहाँ जायेगा ?
तुम इस तरह बातें क्यों कर रही हो ? अब यूँ चलती रहोगी ,या फिर बैठोगी भी....
नहीं ,मैंने सोचा ,क्यों अब गलत आदत डालनी ? जब आदत बन जाती है, तो फिर पैदल चलते हुए ,मोटरसाइकिल की याद आती है।
अच्छा जी ,मेरी याद नहीं आई ,इसकी याद आई ,कहकर दीपक मुस्कुराकर बोला -मुझे ऐसा क्यों लग रहा है ? कोई मुझसे नाराज़ है ?
जब सवारी इस पर करती हूँ ,तो इसी की याद तो आएगी। रही बात नाराज़गी की ,किसी पर नाराज़ होने का मुझे क्या हक़ बनता है ?कोई कहीं भी जाये।
नाराज़गी का अधिकार तो पूरा -पूरा है ,क्यों ? इस ''वाहन चालक ''की याद भी तो आई होगी ,जो इसे चलाता है और अभी भी तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है।
नहीं ,कहकर नंदिनी आगे बढ़ी।
क्यों ,परेशान कर रही हो ? तुम्हें भी देरी हो जाएगी और मुझे भी...
क्या, दो दिनों से नहीं जा रही हूँ ? अब आप अपने रास्ते जाइये, कहकर नंदिनी की आँखें नम हो आईं किन्तु उसने अपने को नियंत्रित रखा, वो एक भी आंसू की बूँद उसे दिखलाना नहीं चाहती थी ,इसीलिए नज़रें झुका लीं।
तब दीपक ने उसका हाथ पकड़ा और उसे ज़बरन बैठाने लगा। नंदिनी ने अपने आस -पास देखा और बोली -छोडो !मेरा हाथ ! कोई देखेगा तो क्या सोचेगा ?
तब वो बोला -जल्दी बैठो ! वरना लोगों को लगेगा ,मैं तुम्हें छेड़ रहा हूँ। कुछ भी गलत अर्थ लगा लेंगे।
नंदिनी उसकी मोटरसाइकिल पर चुपचाप बैठ तो गयी ,किन्तु सोच रही थी- इसने छेड़ तो दिए हैं , मेरे मन के तार... मैं जीवनभर प्रतीक की याद में अपने बच्चे के साथ, अपना जीवन बिता देना चाहती थी किन्तु तुमने मेरे जीवन में आकर मेरे जीवन में हलचल मचा दी।
क्या सोच रही हो ?
कुछ नहीं ,
कुछ पूछोगी, भी नहीं ?
उसके इतना कहते ही ,नंदिनी को स्मरण हुआ ,उस दिन भी तो मैंने , इससे पूछा ही था -'कि क्या तुम कुछ कहना चाहते हो ? 'तब बोली -उस दिन पूछा ही तो था , तब दो दिनों में आज दिखलाई दिए हो ,अब पूछ लिया तो....सोचकर मुस्कुराई।
नहीं ,ऐसा कुछ नहीं है ,उस समय मैं बहुत परेशान रहा ,इसीलिए तुम्हें लेने नहीं आ सका।
जब इतना आवश्यक कार्य आ गया था ,तो कम से कम एक बार फोन करके तो बता ही सकते थे। यहाँ मैं परेशान थी , न जाने मैंने ऐसा क्या कह दिया ?जो दो दिनों से फोन भी नहीं ,न ही कोई जानकारी ,दूसरे इंसान को तो फ़िक्र होती है। आज नंदिनी को लग रहा था ,जैसे आज वो उससे बात करना चाहता है।कम से कम बताकर तो जाना चाहिए था ,उस दिन मैं प्रतीक्षा करती रही, देरी भी हो गई।
अच्छा ,बाबा मुझसे गलती हो गई ,अचानक ही मुझे जाना पड़ा।
मन ही मन नंदिनी सोच रही थी -''नानी ने ठीक ही कहा था। किसी के साथ भी ,कभी भी अप्रत्याशित घटना हो सकती है। तब नंदिनी को उस पर विश्वास होने लगा और अपने मन को समझाने लगी ,मैं इसके विषय में गलत ही सोच रही थी। मुझे किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले थोड़ा ठंडे दिमाग़ से सोचना चाहिए। वो तो अच्छा हुआ नानी का ,जो उन्होंने मुझे समझाया। तब नंदिनी ,दीपक से बोली -एक बात पूछूं , बुरा तो नहीं मानोगे !
हाँ ,हाँ जल्दी पूछो ! तुम्हारा 'सेंटर 'भी आने वाला है।
हाँ, पूछ तो रही हूँ ,उस दिन तुम बग़ीचे में किसके साथ थे ?
कुछ देर दीपक चुप रहा ,नंदिनी सोच रही थी ,कहीं ये फिर से बुरा न मान जाये ,किन्तु मैंने तो इससे पहले ही पूछ लिया है। दीपक को शांत देखकर वो सोच रही थी ,मेरे प्रश्न का जबाब मिलेगा भी या नहीं। यही सोचकर बोली -यदि तुम जबाब न देना चाहो तो....वो उस दिन ,जब तुम मुझे लेने नहीं आये तो मैं पैदल ही जा रही थी। तब मैंने तुम्हें किसी के साथ देखा ,तो...इसीलिए पूछ ....
दीपक ने एकाएक मोटरसाइकिल रोकी ,नंदिनी घबरा गयी ,कहीं ....इससे पहले कि वो कुछ और ज्यादा सोचती, दीपक बोला - लो !तुम्हारा 'इंस्टीट्यूट 'आ गया। नंदिनी उसकी मोटरसाइकिल से उतरी। तब दीपक बोला -उस दिन मेरी पत्नी मेरे साथ थी.... कहकर आगे बढ़ गया किन्तु नंदिनी पर तो जैसे बिजली गिरा गया। नंदिनी को अपने कानों पर जैसे विश्वास ही नहीं हुआ ,वो समझ नहीं पा रही थी ,या फिर समझना ही नहीं चाहती थी कि दीपक ने ,उससे सच्चाई बयान की है। वो दूर तक जाते दीपक को देखती रही।
क्या हुआ ?अब यहीं खड़ी रहोगी ,अंदर नहीं चलना है। उसके साथ की लड़की ने उससे पूछा ,उसकी आवाज सुनकर जैसे वो किसी बुरे सपने से जागी हो। बोली -हाँ चलते हैं।
क्या हुआ ?कुछ परेशान लग रह हो ,सब ठीक है।
हाँ ,सब ठीक है ,उसने बाहरी तौर पर कह तो दिया ,किन्तु अंदर से कहीं वो बिखर रही थी ,बाहर अपने को समेटे खड़ी थी। ये क्या हस्ती है ?कभी अपना सा दिखता है तो कभी बेग़ाना लगता है। अभी कितनी ख़ुशामद कर बैठाकर लाया और अब अचानक ही बिजली गिराकर चला गया। मेरा जीवन तो पहले से ही बिखरा था ,उसे समेटने का प्रयास कर ही रही थी ,दीपक धीरे -धीरे मेरे जीवन में न जाने कब प्रवेश कर गया ? सोचते हुए उसकी आँखों की नमी ,उसके सामने रखे कम्प्यूटर की स्क्रीन को धुंधला कर गयी। उसने अपनी आँखों को मूंदकर अपने पल्लू से उन्हें पोँछ लिया।
उसने कभी ये क्यों नहीं बताया ? कि वो विवाहित पुरुष है। जब भी पूछा ,उसने यही कहा -मेरे माता -पिता और बहनें हैं ,कभी पत्नी का ज़िक्र तक नहीं किया। उस दिन भी मैंने उसे देख लिया और आज भी पूछा ,तो तब बताया वरन.... उसकी रुलाई फूट पड़ी। वो तेजी से उठकर बाथरूम में चली गयी। एक प्रश्न उसके मन में गूंजा -क्या जीवन में धोखा ''खाना ही लिखा है ? जब वापस आई तो तबियत ठीक न होने के कारण छुट्टी लेकर चली गयी।
