चिंतामणि जब अपनी बहु से काम के लिए कहती है ,तब विभा काम न करने के बहाने करती है और अपनी सास से कहती है -मेरा यहाँ मन नहीं लग रहा है।
क्यों, बहु ! तुम ऐसा क्यों कह रही हो ? ये तुम्हारा ससुराल है ,अब ये ही तुम्हारा अपना घर है। तभी तो कहती हूँ ,''सारा दिन कमरे में पड़ी रहती हो ,बाहर आओ ! थोड़ा काम में हाथ बटाओ ! हमारा भी सहयोग हो जायेगा और तुम्हारा मन भी लगेगा ,''मुस्कुराते हुए चिंतामणि बोली।
नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है ,तब बात को बदलते हुए वो बोली -माँजी ! दीदी की यह बात अच्छी नहीं है।
क्यों ,क्या हुआ ? क्या प्रेम ने तुमसे कुछ कहा ?
वो मुझसे क्या कहेंगी ? किन्तु मेरी पीठ पीछे आपके'' कान भर रहीं थीं।''ये क्या उचित है ?
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है ,वो मेरे' कान नहीं भर रही थी।' उसे इस परिवार की और परिवार के हर सदस्य की चिंता रहती है। तुमने देखा नहीं ,वो तो स्वयं भी सारा दिन किसी न किसी काम में लगी रहती है। अब थोड़ा अपना भी ध्यान रखने लगी है वरना सारा दिन काम में ही बेसुध रहती है। तुमने देखा नहीं ,तुम्हारे लिए भी ,बिजली का इंतजाम करके ही घर में घुसी। अब उसे लगा ,अब भाभी आ गयी है ,तो मम्मी को भी थोड़ा सहारा हो जायेगा। तुम्हें पता नहीं ,उसने अपने पिता का कितना काम संभाला हुआ है ?उसी के कारण, वो बेफ़िक्र कहीं भी चले जाते हैं।
केतकी की इतनी प्रशंसा ,विभा को अच्छी नहीं लगी किन्तु वो तो इनकी बेटी है। ये उसे क्यों कुछ कहेंगी,सोचकर उस समय तो विभा चुप हो गयी। तब एक दिन वह बोली -आपके बेटे कहकर गए थे ,'कि कुछ दिनों के लिए अपने मायके भी चली जाना। अब मुझे ,मेरे मायके भेज दीजिये !
चिंतामणि बोली - मायके भी चली जाना किंतु अभी एक-दो महीना तो यहां रह लो ,अभी तो तुम्हें ,यहां आए हुए दस दिन भी नहीं हुए हैं।
नहीं, मुझे वही भेज दीजिए ,क्योंकि ज्यादा समय हो जाएगा तो पेट भी दिखने लगेगा ,बढे पेट के साथ ,मुझे मायके में रहते शर्म आएगी।
वो समझ गयीं ,ये यहाँ काम नहीं करना चाहती है। यदि ये यहाँ रहेगी ,तो ''काम से जी चुराएगी ''कम से कम अपने घर में बाहर घूम -फिर तो लिया करेगी। जब सिर पर ज़िम्मेदारी पड़ेगी ,अपने आप काम करने लगेगी। मेरा क्या है ,अब भी काम कर रही हूँ ,बाद में भी कर ही लूँगी। तब वो बोलीं - ठीक है, मैं तेरे' पापा जी 'से बात करती हूं।
उनकी बात सुनकर विभा खुश हो गयी,तब बोली -दस -पंद्रह दिन रहकर आ जाउंगी।
जैसी तेरी इच्छा ! ऐसे समय में खुश रहना चाहिए ,बच्चे पर भी अच्छा असर पड़ता है। तूने अभिमन्यु की कहानी तो सुनी होगी। बच्चा गर्भ में भी, देख -सुन सकता है। तभी से उसमें अच्छे संस्कार डालने चाहिए। उनकी बात सुनकर विभा मुस्कुराई और सोचने लगी ,बेफिज़ूल की बातें अपने पास ही रखें। अपनी बेटी को इन्होने कौन से अच्छे संस्कार दिए हैं ?
तब चिंतामणि बोली - अब जब जाओगी ,चली जाना। जब तक यहां रह रही हो,छुटपुट के काम तो कर ही सकती हो। ये लो ,यहां बैठकर सब्जी तो काट लो ! कहते हुए उसके सामने सब्जी रखकर पूछा -बता,तुझे कुछ खाने की इच्छा है, तो बना दूंगी।
मुँह बनाते हुए ,विभा सब्जी काटने बैठी और सोचने लगी -ये मेरे लिए क्या बनाएंगी ?काम करवाने के लिए खाने का लालच दे रही हैं। बहु से पूछकर चिंतामणि जी तो अपने काम में व्यस्त हो गयीं , किन्तु विभा अचानक ही रोने लगी, चिंतामणि जी घबरा गई ,उन्हें लगा कहीं इसने चाकू से अपना हाथ तो नहीं काट लिया ?वो दौड़कर उसके क़रीब आईं और पूछा -क्या हुआ ?
उसे रोते देखकर उसके देवर ने भी पूछा -भाभी ! क्या हुआ ?
न जाने ,इसे क्या हुआ है ?घबराकर चिंतामणि अपने बेटे से बोली। तब उन्होंने, विभा से पूछा - क्या कोई दिक्कत या परेशानी है ?
नहीं ,मम्मी जी ! मुझे थोड़ी घबराहट सी हो रही है और मुझे मेरी मां की बहुत याद आ रही है। उसकी बात सुनकर तब वो समझीं ,ये सब इसकी बहानेबाज़ी है।
तब उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आया ,तब वो बोलीं - तुमसे कहा तो है, कि चली जाना फिर इस तरह परेशान होने से क्या लाभ है ?
विभा को ऐसे करते हुए देखकर केतकी अपनी मां से बोली - देखा ! मैं न कहती थी, कि इनके रोज के यही बहाने हैं, अब आपने काम बताया है ,तो इन्हें मायका याद आ रहा है ,इन्हें घबराहट हो रही है। इतने दिनों से कमरे में आराम फ़रमा रही थीं ,तब इन्हें कुछ नहीं हुआ ,जबसे इन्हें काम बताना शुरू किया। इन्हें चक्कर आने लगे। केतकी ने अपने भाई और माँ से कहा।
केतकी की बातें सुनकर विभा, अंदर ही अंदर सुलग उठी। जब इंसान के मन में चोर होता है ,तो ज़्यादा चौकन्ना होता है ,हालाँकि चक्कर बताकर विभा अपने कमरे में चली गयी थी किन्तु उसके कान उनकी बातों की टोह ले रहे थे ,उसे कुछ सुनाई दे रहा था ,कुछ नहीं। उसे केतकी पर क्रोध तो बहुत आया किन्तु मन में घुटकर रह गयी।
प्रतिदिन की तरह , मन में विचार आने की देर है, उसे क्रियान्वित करने में ज्यादा समय नहीं लगता। आज जब केतकी श्याम से मिलने गई थी। अब थोड़ा उससे खुलकर बात कर रही थी। 'तुम कहां नौकरी करोगे, तुम्हारी नौकरी अभी लगी या नहीं ,किस शहर में जाओगे ? क्योंकि अब वो श्याम के साथ शहर में जीवनयापन के स्वप्न सजाने लगी थी।
आज तुम कैसी बातें कर रही हो ? आज तक तो ऐसी बातें कभी नहीं की।
अब तक नहीं की ,किन्तु अब तो कर रही हूँ। तुम, मुझसे प्यार करते हो तो तुमने आगे क्या सोचा है ? मेरे घरवालों से बात कब करोगे ?
पहले तो श्याम थोड़ा घबराया फिर बोला -अभी तो तुम्हारी भाभी ,माँ बनने वाली है ,अभी मेरी नौकरी भी नहीं लगी। क्या तुम्हारे घरवाले तुम्हारे विवाह के लिए सोच रहे हैं ?
हाँ ,मम्मी कहती तो रहतीं हैं ,अब तुम शीघ्र ही नौकरी लगवा लो !और मेरे घरवालों से बात करो !
ठीक है ,तैयारी कर तो रहा हूँ ,नौकरी लगते ही, मैं उनसे बात करूंगा।
तब केतकी ने पूछा - मैं तो कम पढ़ी -लिखी हूं ,क्या मेरे लिए भी शहर में कुछ काम होगा।
तुम्हें काम की क्या जरूरत है ?मैं हूँ न... कमाने के लिए ,मैं कमाऊंगा और तुम खाना।
नहीं ,मैं किसी पर बोझ बनना नहीं चाहती ,जैसे मेरी भाभी है ,उसका तो घर में भी काम करने का मन नहीं करता। पता नहीं ,भाई के साथ रहकर वहां भी उन्हें समय से रोटी देती होगी या नहीं।
तुम क्या बुदबुदा रही हो ?
