Shaitani sa.....24

 'विभा' कहने को तो केतकी की बड़ी भाभी है ,किन्तु जबसे उसे पता चला है ,कि केतकी सिर्फ़ आठवीं तक ही पढ़ी है और खेती के कार्यों में अपने पिता की सहायता करवाती है। यह बात भी, केतकी ने ही, अपनी बड़ी भाभी समझकर उसे बेझिझक बताई थी। उसे इस बात के लिए कोई अफ़सोस भी नहीं था,कि परिवार में उसके भाई इतना पढ़ रहे हैं ,उसे भी पढ़ना चाहिए था। भले ही केतकी को क़िताबी ज्ञान नहीं है ,किन्तु व्यवहारिक ज्ञान शायद विभा से भी बेहतर है। 


रिश्तों को अपनाना और समझना भी बखूबी जानती है किन्तु उसकी ,भाभी विभा ने तो, उसको अपमानित करने वाले शब्द बोले,तब भी केतकी ,अपनी भाभी समझकर उसकी बातों को नजरअंदाज कर गयी किन्तु भाभी के सामने तो वो शांत रहकर चली गयी। किन्तु उसके पश्चात, केतकी के मन में एक विचार अवश्य उत्प्नन हुआ। 

मन ही मन उसने सोचा -'' अब तो श्याम भी कह रहा है ,''कि वह बाहर नौकरी करेगा, मैं भी उसके साथ नौकरी पर ही चली जाऊंगी ,तब देखती हूं, शहरों में लोग कैसे भूखे मरते हैं या क्या काम करते हैं ? भाभी को तो... काम न करने का बहाना चाहिए। अब तक यह बात उसके दिमाग में नहीं आई थी, किंतु अब आ गई। किसी की भी शांत ज़िंदगी में, कभी भी, कहीं भी, कोई इंसान ऐसा मिल ही जाता है ,जो उसके मन की शांत झील में शब्दों रूपी ढेला फेंककर अशांत कर जाता है। ऐसा कार्य भी कभी -कभी अपने ही कर देते हैं। अब तक केतकी के मन रूपी शांत झील में ,भाभी के और नए मेहमान के आने की ख़ुशी में लहरें उठ रहीं थीं, किन्तु अब वे विपरीत दिशा में बहने लगीं हैं। 

विभा को आये हुए, एक सप्ताह हो गया किन्तु सारा दिन अपने कमरे में पड़ी रहती। नहाकर अपने कमरे में चली जाती। केतकी उसे भोजन लेकर जाती ,विभा भोजन करके आराम करती, जबकि उसकी नजरों में उनके लिए वो सम्मान भी नहीं था। हाँ इतना अवश्य था ,सुबह को उठकर सास से आशीर्वाद अवश्य ले लेती थी। किन्तु वो इतना भी नहीं समझी, जिसके बच्चे की वो माँ बनने जा रही है ,वो इसी घर का बेटा है। अभी तक दोनों माँ -बेटी इसी बात से प्रसन्न थीं,' कि बहु घर में रह रही है और माँ बनने वाली है। ''किन्तु उसको माँ बनने में अभी काफी समय है, तब तक क्या ये इसी तरह कमरे में ही बंद रहेगी ? 

चिंतामणि सोच रहीं थीं ,धीरे -धीरे बहु अपने आप ही घर के कार्यों में ,उनकी सहायता करवाएगी ,किन्तु ऐसा नहीं हुआ। 

तब एक दिन केतकी अपनी मम्मी से बोली -मम्मी !भाभी को आये हुए एक सप्ताह हो गया ,इतने दिनों से घर में आई हुई हैं ,एक बार भी यह नहीं कहा ,''कि  मांजी ! लाइए ! मैं ,काम में आपकी सहायता कर दूं। वो तो महारानी सी नहा -धोकर अंदर आराम फरमाती हैं और हम दोनों उनके 'दास' कहते हुए ,केतकी हंसने लगी। अभी तो बच्चे को आने में बहुत समय है ,तब तक क्या वो ऐसे ही पड़ी रहेंगी, या हमारे कहने की प्रतीक्षा में हैं ?

केतकी की बातें चिंतामणि को भी उचित लगीं ,तब वो बोलीं  - कामचोर महिलाओं की यही तो पहचान है, काम के लिए ,कभी आगे बढ़कर कर नहीं कहेंगीं। 

 मम्मी ! कमी तो थोड़ी हमारी भी है ,आप भी,उनसे कभी यह नहीं कहेंगी, कि कुछ काम करवा दे ! भाई के पास वहां कौन सा इतना काम होता था ? वहां तो बड़ा आराम किया है।  कम से कम यहां तो इन्हें कुछ काम करवाना चाहिए। इस उम्र में आप ही अकेली लगी रहती हो। मैं तो अब तक कह देती किन्तु रिश्ते में वो मुझसे बड़ीं हैं ,आपका कहना ही उचित है। 

 अभी तो बच्चा होने में भी ,बहुत समय है। क्या पांच -छह  महीने तक ऐसे ही घर में खाली बैठी रहेंगी और आप काम करती रहेंगी। केतकी अपनी मां से प्रश्न किये जा रही थी, क्या ऐसी हालत में महिलाएं काम नहीं करती हैं ? मैंने तो ऐसी कई महिलाओं को काम करते हुए देखा है ,जो इस हालत में भी बहुत काम करती हैं। 

तब केतकी से मां बोली - काम करवा देगी, वह कहीं भागी थोड़े ही जा रही है ,पहली बार यहाँ रह रही है थोड़ा आराम तो करने दो !थोड़ा वो हमें समझे और थोड़ा हम उसे समझे !

 आपको भाभी पर बड़ा लाड आ रहा है, किंतु उन्होंने तो एक बार भी तुम्हारे लिए नहीं सोचा। क्या वो बचपन से ही शहर में रहीं  हैं। वो भी तो गांव से ही आई हैं , क्या उनके घर में काम नहीं होते थे ,क्या उनकी भाभियां काम नहीं करती हैं ? मैं मानती हूँ ,वो इस घर का वारिस ला रहीं हैं किन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं वे इसका अनुचित लाभ उठायें। 

बेटी के मुख से ऐसे वचन सुनकर चिंतामणि ,उसका चेहरा देख रहीं थीं ,अब बेटी बड़ी और समझदार हो गयी है। ये इतना सब सोचती है ,मैंने तो सोचा भी नहीं था।अभी तक इसे बालक ही समझे हुए थी।  तब सोचा ,इसके मन में या इसकी भाभी के मन में, ऐसी बातों के कारण कड़वाहट न आ जाये। 

तब वो बोलीं - ऐसा कुछ नहीं है ,काम से कोई नहीं मरता ,काम तो इंसान को करते रहना चाहिए ,माँ ने बेटी को समझाया ,किन्तु बहु भी इसी तरह बैठी रही ,तो उसको भी तो परेशानी होगी। आज उससे कहूंगी ,माँ ने केतकी को समझा कर संतुष्ट कर दिया। घर की एक जिम्मेदार महिला का, घर संभालने के साथ -साथ रिश्तों को सहजता के साथ ,बिना किसी मन -मुटाव के कैसे आगे बढ़ाना है ? चिंतामणि के लिए ये परीक्षा की घड़ी है।

केतकी की  बातों को विभा ने भी सुन लिया था। विभा को केतकी पर बड़ा क्रोध आया। यह गंवार कितना बोलती है ? जैसा मैंने समझा था ,वैसी नहीं है। यह मेरे विरुद्ध अपनी माँ को भड़का रही है। विभा काम करना ही नहीं चाहती थी। मन ही मन सोच रही थी,'' इतनी गर्मी में घूंघट निकाल कर कौन काम करेगा ?किंतु केतकी के व्यवहार से उसे लग रहा था। जैसे यह अब मेरे पीछे ही पड़ गई है। वैसे मुझे यहां रहते हुए अब एक सप्ताह हो गया है ,अभी वो ये सभी बातें सोच ही रही थी। 

तभी चिंतामणि वहां पर आ गई और बड़े स्नेह से वो विभा से बोलीं - बेटा ! तुम सारा दिन इसी कमरे में पड़ी रहती हो। इस तरह तो तुम बीमार पड़ जाओगी। चलोगी -फिरोगी नहीं तो तुम्हें आगे भी परेशानी आएगी। बच्चा होने में दिक्क्त होगी।  अब आंगन में आकर थोड़ा सा काम भी करवाया करो और थोड़ा टहल भी लिया करो ! घूमने -फिरने से ऐसे समय में सेहत भी अच्छी रहती है और आगे परेशानी भी नहीं आएगी। 

यह बात विभा भी जानती है कि ये जो कुछ भी कह रही हैं, सही कह रही हैं। किंतु उसे तो काम न करने की जैसे आदत सी ही हो गई है और बहाने ढूंढती है। तब बोली -मम्मी जी ! ऐसा नहीं है ,मैं काम करना नहीं चाहती। किन्तु मैं भी क्या करूं ? कभी सिर में दर्द होता है तो कभी पांवों में दर्द होता है। वैसे भी अब यहाँ मेरा मन नहीं लग रहा है। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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