Talab mein mili lash

न जाने , ये किसकी होगी ? नाक पर रुमाल रखकर यही सोच कर कुछ लोग आगे आते और नाक -मुंह सिकोड़कर उसे देखते और पीछे हट जाते। वो लाश ,तालाब के पानी  से फूल चुकी थी। इस तालाब में यहाँ कैसे आई ? पता ही नहीं चल पा रहा, यह लड़की की है या किसी महिला की है। यह तो फोरेंसिक रिपोर्ट से ही पता चलेगा। कोई तो है, जिसका मूल्यवान जीवन इतना ही था या फिर किसी ने इसे मरने पर विवश किया होगा। 

न जाने, इसने कैसा जीवन जिया होगा ? सुखमय था या दुखमय ! अपने प्राण खुद ही ले लिए होंगे, हो सकता है। 

हाँ ,हो सकता है, आत्महत्या हो ! किसी ने मुँह सिकोड़कर कहा। 


या फिर इसे किसी ने मारा हो,किसी दूसरे ने अंदाजा लगाया।  न जाने, बेचारी ने कितने कष्ट सहे होंगे ? कुछ लोग, उस तालाब के क़रीब ही खड़े थे। जब तक तालाब में से उस लाश को निकाला नहीं गया था। जिज्ञासावश उसे देखना चाहते थे। तब तक दूर से ही, देख रहे थे। लाश को देखते ही पता चल रहा था यह किसी महिला की लाश है।

 पर इसके तन पर कपड़े नहीं, न जाने इसके साथ क्या हुआ होगा ? कहीं इसके साथ किसी ने अनाचार तो नहीं किया या फिर इसके वस्त्र झाड़ियों में उलझ गए होंगे। 

क्या बात करते हैं ?आपको यहाँ ऐसी झाड़ियां नज़र आ रहीं हैं। काफी समय से इसी तालाब में रही होगी।  उसकी फूली हुई देह को देखकर किसी ने कहा। अपने यहाँ कि तो नहीं लगती ,शनैः -शनैः यह सूचना आस -पास तक पहुंच गयी।

 तभी एक अधेड़ उम्र महिला आई और उसके तन पर एक कपड़ा ओढ़ा दिया। मन ही मन सोच रही थी,यहाँ तमाशा देखने तो आ गए , किसी को इतना नहीं हुआ कि उस पर एक कपड़ा ही डाल दें। 

हो सकता है,इसके कपड़े गल गए हों ,उनकी चर्चा जारी थी।  पहचान में तो नहीं आ रही, न जाने कितने दिनों से यहाँ पड़ी थी ?अब फूलकर ऊपर आ गयी।

न जाने ,इसका परिवार कहाँ होगा ?किसकी बेटी है ,बहन है, पत्नी भी हो सकती है। हो सकता है, इसके बच्चे भी हों। सभी इस तरह की अटकलें लगा रहे थे। चेहरा पहचाना नहीं जा रहा था,अपने यहाँ की तो नहीं लग रही है। 

कुछ दिन पहले ये एक जीवित प्राणी थी। इसके अंदर भी मोह ,लोभ ,अहम ,क्रोध ,ईर्ष्या रही होगी। आज वह लाश के रूप में, निर्जीव, निश्चल पड़ी हुई है।

 इस देह को न जाने, कितना सजाया होगा ? इस देह पर इत्र लगाया होगा, अपने रूप यौवन पर कितना अहंम रहा होगा ? माता-पिता ने कितने लाड -प्यार से इसे पाला होगा ?इसके लिए न जाने, कितने सपने देखे होंगे और इसने अपने भावी  जीवन के लिए न जाने ,कितने सपनों को सजाया होगा ? कहीं ये किसी के प्यार में तो नहीं पड़ गई होगी , उसने इसे धोखा दे दिया हो और इसने मृत्यु को वरन कर लिया हो। 

क्या बात करते हैं ,अभी तो यह भी सिद्ध नहीं हुआ ,यह हिंदू है कि मुसलमान है। 

अब तो इसका कोई न हीं धर्म है ,न ही कोई जाति है। इसकी पहचान एक 'लाश 'मृत देह के रूप में है। जो  अब न बोल सकती है ,न अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है। एक बेजुबान पुतला, जो जीवित रहते हुए न जाने, किन परिस्थितियों से जूझ रहा था। इसे इस जीवन से ही नहीं ,इसे उन दर्दों से ,उन परेशानियों से भी मुक्ति मिल गई। चाय की दुकान पर बैठे ,आस -पास खड़े लोग, अपने विचार प्रस्तुत कर रहे थे। 

न जाने, किसने पुलिस को फोन कर दिया था, कुछ ही देर में पुलिस पहुंच गई। उन अटकलों के मध्य  सभी को पीछे हटाते हुए, पुलिस उसके करीब गई। उसका मुआयना करने लगी, उसकी जांच करके बताया गया यह कोई पच्चीस -छब्बीस बरस की महिला है। शायद इसके साथ कुछ ग़लत हुआ है ,पुलिस ने अंदाजा लगाकर बताया। 

 इसके साथ क्या हुआ होगा ? सभी के चेहरों पर यही प्रश्न दिखाई दे रहा था। 

यह तो फोरेंसिक रिपोर्ट से ही पता चलेगा। 

अब पता करके भी क्या हो जाएगा ? क्या इसके गुनहगारों को सजा मिल जाएगी ? या यह फिर जीवित हो उठेगी ?

 उस लाश के साथ जो अत्याचार हुआ ? क्या लोगों को, उससे सीख मिलेगी ? ये वही तन है, जिसकी मौत पर लोग नाक -मुँह  सिकोड़ रहे हैं। रूमाल से उसकी दुर्गंध से बचने का प्रयास करते हैं, किंतु जब यह देह  जीवित थी। तब इसको नोचने के बहाने ढूंढते थे। उनकी वहशी नजरें उसकी देह को वस्त्रों में भी टटोलती होंगी। उनकी नजरों से पीछा छुड़ाना, इसके लिए कितना मुश्किल रहा होगा ?

इसने तो सभी रिश्ते निभाए, सभी अपनों से प्यार किया होगा, क्या वह भी किसी की प्यारी थी ? क्या कोई चाहता था, कि वह मेरे लिए जीवित रहे।

 उसको कुछ देर की जांच के बाद, एक कपड़े में बांध दिया गया। उसका तो चेहरा भी ठीक से नजर नहीं आ रहा ,शायद कोई पहचान भी नहीं पाएगा। एक लावारिश लाश बनाकर, उसको ले जाया गया। इसको जलाना है या फिर दफनाना है ,किसी को इससे कोई सरोकार नहीं है। 

वह एक लावारिस लाश बनकर तालाब में मिली, कोई नहीं जानता, कहां से आई थी ? आनन -फानन में उसको एक बिजली की भट्टी में जला दिया गया,ज्यादा दिन रखना उचित नहीं था। 

अगले दिन अखबार में एक खबर छपी, तालाब में एक ''लावारिश लाश '' मिली ,जिसका कोई हकदार नहीं था, कोई उसकी पहचान नहीं पाया और उसको जला दिया गया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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