Kiski dulhan [part 43]

वो अनजान शख्स आगे आता जा रहा था ,रत्न प्रताप शायद उसे जानता था, किन्तु उसने कुछ नहीं बताया। जब मोहिनी ने उससे पूछा - तुम कौन हो ?

 जिस नाम को तुम ढूंढ़ रही हो, तब उसने कहा -अपने अतीत को स्वीकारो ! 

मेरा अतीत ,मेरा मतलब मेरा बचपन तो मुझे स्मरण ही नहीं ...  

किन्तु तुम्हारा अतीत तुम्हें नहीं भूला। 


उसके गोलमोल जबाब सुनकर मोहिनी तेज स्वर में बोली -अब बहुत हुआ , अपना चेहरा दिखाओ।"

अजनबी कुछ क्षण चुप रहा ,तब वो धीरे-धीरे अपना चेहरा उस रोशनी में लाया।

उसका चेहरा देखकर मोहिनी की जैसे साँस रुक गई और भानु भी उसे देखकर स्तब्ध रह गया। वो कोई बूढ़ा आदमी नहीं था ,लगभग पचास वर्ष का अधेड़ पुरुष !उसके चेहरे पर हल्की -हल्की दाढ़ी थी। आँखों में असाधारण कठोरता और सबसे महत्वपूर्ण...उसके चेहरा भानु से मिलता -जुलता था या ये कहें भानु का चेहरा उससे मिलता -जुलता था।

भानु ने फुसफुसाकर कहा—"आप...?"

अजनबी ने उसकी ओर देखा ,"हाँ ,मैं "

"आप कौन हैं? मोहिनी कुछ भी न समझते हुए, उससे पूछती है ,उसने उत्तर देने से पहले मोहिनी की ओर देखा।

"यह सवाल तुम्हें ,मुझसे नहीं ..अपने पिता से पूछना चाहिए था । मोहिनी तुरंत रत्न प्रताप की ओर मुड़ी।उसकी आँखों में प्रश्न था ? रत्न प्रताप ने ,अपनी आँखें बंद कर लीं।

अजनबी ने कहा—"देखा ? ये अब भी चुप है।"

भानु का चेहरा कठोर हो गया और कड़े शब्दों में पूछा -क्या आप मेरा नाम जानते हैं ?"

"मैं, तुम्हें बचपन से जानता हूँ।"

भानु  को आश्चर्य हुआ ,आप मुझे मेरे बचपन में मिले हैं ? तब आप यह बताने का कष्ट करेंगे , आप कौन हैं?"

अजनबी ने धीमे स्वर में कहा—"M.V."अचानक कमरे में जैसे विस्फोट हो गया ,सभी एक -दूसरे को देखने लगे। 

मोहिनी के हाथ से तस्वीर लगभग छूट ही गई थी ।

भानु ने उसकी ओर देखा ,"क्या यही...उसकी ओर अंगुली से इशारा किया 

मोहिनी के मुख से भी निकला —"M.V."अजनबी ने 'हाँ 'में सिर हिलाया।

तब रत्न प्रताप आगे आए ,"बस "

M.V. ने उनकी ओर देखा और मुस्कुराया ,क्या तुम्हें डर लग रहा है? उसने पूछा। 

मुझे.....मुझे भला क्यों ड़र लगने लगा ? किससे ड़र लगेगा ?"

"तुम ही बताओ ! किससे लग रहा है ? कहकर रत्न प्रताप चुप हो गए।

M.V. ने फिर पूछा —क्या इन बच्चों से ड़र रहे हो ?"

भानु ने तुरंत कहा—"मैं बच्चा नहीं हूँ।"

M.V. मुस्कुराया, सही कहा ,'अब तुम बड़े हो चुके हो।"फिर उसकी नज़र मोहिनी पर गई और तुम..."

मोहिनी  ने पूछा— क्या ?

क्या तुम्हें सच में कुछ याद नहीं ? उसने अविश्वास से पूछा। 

मोहिनी  ने 'नहीं ' में सिर हिलाया।

M.V. ने धीरे से कहा—तो तुम्हें याद दिलाना पड़ेगा, कहते हुए ,उसने जेब से एक छोटी सी वस्तु निकाली।वह एक पुरानी पीतल की सीटी थी।

जैसे ही मोहिनी ने उसे देखा...उसके सिर में अचानक तेज़ दर्द  होने लगा ,वह पीछे हट गई "नहीं..."

भानु ने ,फिर उसे संभाला और उस अजनबी की तरफ घूरकर देखा और बोला -मोहिनी !"

मोहिनी की आँखों के सामने एक दृश्य चमक उठा ,एक छोटी बच्ची ,वही हवेली ,और बारिश !एक आदमी उसे गोद में लिए भाग रहा था।बच्ची रो रही थी— मुझे ,माँ के पास जाना है!"

आदमी कह रहा था—"चुप रहो ! मोहिनी! अगर उन्होंने तुम्हें देख लिया तो सब खत्म हो जाएगा।"फिर वही पीतल की सीटी ,उस आदमी ने ,उस बच्ची के हाथ में दे दी और बोला - जब कभी खतरा हो, तो इसे बजाना !"दृश्य अचानक टूट गया।मोहिनी ने अपनी आँखें खोल दीं ,उसकी साँसें तेज़ थीं।

भानु ने पूछा—"क्या देखा?"

मोहिनी ने M.V. की ओर देखा और कहा -"आप..."वह कुछ क्षणों तक बोल नहीं पाई ,कुछ देर बाद उसने पूछा -आप ,मुझे बचाकर ले गए थे।"

M.V. के चेहरे पर पहली बार कोई भाव आया,"हाँ।"

मोहिनी ने एक कदम आगे बढ़ाया और उनसे पूछा -उस रात...आप मुझे कहाँ ले गए थे?"

M.V. ने उत्तर दिया—एक ऐसी जगह..जहाँ 'देवगढ़ परिवार 'तुम्हें कभी नहीं ढूँढ़ सकता था।"

"फिर मैं वापस कैसे आई?"

M.V. की आँखों में एक अजीब-सी उदासी उतर आई ,उदास स्वर में  बोला -तुम वापस नहीं आई थीं।"

मोहिनी चौंकी,"क्या? ये आप क्या कह रहे हैं ?

हाँ ,तुम्हें वापस लाया गया था।"

भानु ने पूछा—" कौन, इसे वापस लाया ?"

M.V. ने उसकी ओर देखा और बोला - वही आदमी..जिससे तुम्हें बचाने के लिए ,मैंने तुम्हें वहाँ से निकाला था।"

मोहिनी  ने पूछा—क्या वे मेरे पिता थे ?"

M.V. ने सिर हिलाया ,"हाँ।"

रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—उसका नाम मत लेना !

M.V. ने उनकी ओर देखा ,"क्यों?"क्यों उसका नाम न लूँ 

"क्योंकि...रत्न प्रताप की आवाज़ टूट गई ,तुम जानते हो, वह क्या कर सकता है ?"

M.V. मुस्कुराया"जानता हूँ ,इसीलिए तो मैं वापस आया हूँ।"

साया अब तक चुप था ,उसने अचानक पूछा—तुम्हें पता है, कि वह फिर सक्रिय हो चुका है?"

M.V. ने उसकी ओर देखा ,मुझे पता है।"

"और तुम्हें पता है कि उसने मोहिनी को पहचान लिया है?"

"हाँ ,सब जानता हूँ 

मोहिनी ने उनकी बातों को सुनकर दोनों की ओर देखा और पूछा -वो कौन है ?"किन्तु किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। 

भानु ने गुस्से में कहा—बस ,अब और नहीं!"उसने M.V. की ओर तलवार तान दी ,अगर आप सच जानते हैं ,तो हमें बताइये ।"

M.V. ने तलवार की ओर देखा और बेरुख़ी से मुस्कुराया और बोला -तुम्हें क्या लगता है ?तलवार से सच बाहर निकलेगा। "

कम-से-कम डर तो नहीं रहेगा ,भानु ने उत्तर दिया। 

M.V. की आँखों में हल्की चमक आई और बोला -तुम बिल्कुल अपनी माँ जैसे हो।"

भानु की तलवार नीचे हो गई और लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला -क्या आप मेरी माँ को जानते हैं ?"

"बहुत अच्छी तरह ,उसकी आँखों में विश्वास था। 

"अब वो कहाँ हैं?"

M.V. ने कुछ क्षण उसे देखा ,फिर कहा—तुम्हें सच में जानना है?"

"हाँ।"

"तो पहले यह स्वीकार करो ,कि तुम्हें जो कहानी सुनाई गई थी...वह रुका ,उसमें तुम्हारी माँ की मृत्यु सबसे बड़ा झूठ था।"

भानु की आँखों में आँसू आ गए ,इसका मतलब मेरी माँ ज़िंदा हैं?"

M.V. ने उत्तर देने के बजाय ,मोहिनी की  ओर देखा और बोला -तुम दोनों को अलग करने का कारण सिर्फ़ एक था।"

मोहिनी  ने पूछा—"क्या?"

"तुम दोनों के पास उस रात की अलग-अलग आधी -आधी यादें हैं और अगर तुम दोनों साथ आ जाते..."उसने धीरे से कहा—तो पूरी घटना तुम्हें याद आ सकती है ।"

मोहिनी ने काँपती आवाज़ में पूछा—उस रात हुआ ,क्या था?"

M.V. ने उसकी ओर देखा था -एक दुर्घटना !"

भानु ने कहा—"कैसी दुर्घटना? एक आग !

मोहिनी की आँखों के सामने फिर वही दृश्य चमका ,आग की लपटें !लोगों की चीखें !मृणाल बच्चों को बचाने की कोशिश कर रही थी। रत्न प्रताप किसी से लड़ रहे थे और एक तीसरा आदमी...मोहिनी को लेकर भाग रहा था ,वो M.V.था। लेकिन इस बार दृश्य में कुछ नया था।उस आदमी के हाथ में एक लाल रंग की अंगूठी थी। मोहिनी ने अपनी आँखें खोल दीं और उससे पूछा -आपके हाथ में...M.V. ने तुरंत अपनी मुट्ठी बंद कर ली।

मोहिनी ने कहा—"लाल अंगूठी "M.V. का चेहरा एकदम बदल गया।

रत्न प्रताप भी चौंक गए ,साया ने डायरी की ओर देखा ,"उसे याद आने लगा है।"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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