अब तक भानु और मोहिनी अपनी सच्चाई की तलाश में हवेली के गलियारों में भटक रहे हैं। वो अपने जीवन की सच्चाई जानना चाहते हैं जो उनसे छुपाई गयी है। मोहिनी उन गलियारों में उपस्थित पुरानी चीजों को स्पर्श करके उनका पूर्वानुमान लगा लेती है। उसे किसी भी वस्तु को छुकर पुरानी चीजें और दृश्य नजर आने लगते हैं जिसके कारण वो अपने जीवन और भानु के जीवन का अनुमान लगाती है। किन्तु बहुत सी चीजें अभी भी उनकी नजरों से अदृश्य हैं।
उस महल में रहने वाले अभी भी उन्हें अधूरा सत्य बताते हैं। तब वे दोनों स्वयं ही आगे बढ़ते हैं। इस तलाश में मोहिनी को उसकी माँ मृणाल मिलकर भी न जाने कहाँ अदृश्य हो जाती हैं ?तब वो अपना आगे का सफर जारी रखते हुए ,ऐसे स्थानों तक पहुंच जाते हैं। जहाँ भानु बचपन से, हवेली में रहते हुए भी नहीं पहुंच पाया।
तब वो दोनों एक अन्य कक्ष में प्रवेश करते हैं। उस कक्ष में दीवारों पर बहुत सारी तस्वीरें थीं। भानु ने पहली तस्वीर देखी ,वह उसके बचपन की तस्वीर थी।दूसरी में मोहिनी !तीसरी में दोनों बच्चे...एक साथ थे ,भानु यह देखकर पीछे हट गया और बोला - ये सब यहाँ क्यों है?"
मोहिनी एक तस्वीर के पास गई ,उस तस्वीर में वह बहुत छोटी थी ,उसी के पास एक महिला भी खड़ी थी।महिला का चेहरा आधा ढका हुआ था, मोहिनी ने वो तस्वीर उतारी ,जिसके पीछे लिखा था—उसे दूर रखना ,इसका क्या अर्थ हो सकता है ,सोचते हुए मोहिनी ने अगली तस्वीर उतारी ,जिस पर लिखा था—दोनों को कभी एक साथ मत आने देना।"
भानु ने भी वो पंक्तियाँ पढ़ीं, दोनों...उसने मोहिनी की ओर देखा और बोला -इसका मतलब है ,हमें अलग रखने की कोशिश की गई थी।"
साया ने कहा—"हाँ।"
भानु ने पूछा—"क्यों?"साया ने जवाब नहीं दिया ,लेकिन कमरे के बीच रखी मेज़ पर एक पुरानी डायरी थी।
भानु ने उस डायरी को उठाया और खोलकर देखने लगा ,किन्तु पहला पन्ना खाली था ,दूसरा भी किन्तु तीसरा...उस पर केवल एक तारीख लिखी थी - 17 अगस्त 2001
मोहिनी ने तारीख देखते ही कहा—"यह वही साल है...जब हमें अलग किया गया था।"
भानु ने डायरी का अगला पन्ना पलटा ,वहाँ एक वाक्य लिखा था—"अगर ये दोनों बच्चे फिर कभी एक-दूसरे के सामने आए, तो वो सब याद करना शुरू कर देंगे। "
मोहिनी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा और पूछा -ये किस याद की बात लिखी है ?"
भानु ने अगला पन्ना पलटा ,लेकिन वो पन्ना फाड़ दिया गया था।उसके बाद के भी कई पन्ने गायब थे।सिर्फ़ आख़िरी पन्ने पर कुछ शब्द बचे थे—"यादें मिटाई नहीं गई थीं..नीचे स्याही फैली हुई थी जिसके कारण अगले शब्द मुश्किल से पढ़े जा रहे थे— बस छिपा दी गई थीं ,कुछ समझ नहीं आया।
तभी अचानक मोहिनी के सिर में तेज़ दर्द उठा ,उसने अपना सिर पकड़ लिया,उसकी हालत देखकर भानु ने पूछा -मोहिनी ,क्या हुआ ? भानु उसे संभालने का प्रयास कर रहा था। मोहिनी के सामने फिर एक दृश्य उभरा -एक कमरा ! छोटी मोहिनी रो रही थी ,पास ही एक छोटा बच्चा खड़ा था।वह...शायद भानु था।दोनों बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे। सामने मृणाल खड़ी थी ,किन्तु उसकी आँखों में आँसू थे।वह उन दोनों से कह रही थी—"जो भी हो, एक-दूसरे को मत छोड़ना !"
फिर दरवाज़ा खुला और एक आदमी अंदर आया ,उसका चेहरा दिखाई नहीं दिया ,उसने कहा—"समय खत्म हो गया ,मृणाल ने बच्चों को अपने पीछे कर लिया ,फिर...एक तेज़ आवाज़ ,अंधेरा,मोहिनी ने झटके से अपनी आँखें खोल दीं।भानु उसे अभी भी पकड़े हुए था।
मोहिनी के आँखें खोलते ही पूछा -क्या देखा ?"
मोहिनी ने काँपते हुए कहा—"हम...हमारा बचपन !हम बचपन में, एक-दूसरे को जानते थे।
आश्चर्य से भानु की आँखें फैल गईं ,"क्या?"मुझे तो कुछ भी याद नहीं..."
वह अपने माथे पर हाथ रखकर बोली—लेकिन हम मिले थे।
भानु कुछ कहने ही वाला था ,कि कमरे के बाहर किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ आई ,साया ने तुरंत मशाल उठाई और चिल्लाया -"कौन है ?"वे तीनों बाहर आ गए। गलियारा एकदम खाली था लेकिन फर्श पर एक चीज़ पड़ी थी। मृणाल की चाँदी की अंगूठी।
मोहिनी ने उसे उठाया,अंगूठी के अंदर अब एक नया अक्षर दिखाई दे रहा था। पहले सिर्फ़ M था ,अब उसके साथ...V मिलाकर लिखा था—M.V.
मोहिनी ने धीरे से कहा—इसका अर्थ है ,मृणाल M.V. नहीं है।"
भानु ने पूछा—"फिर कौन हो सकता है ?"
साया ने पहली बार कोई अनुमान नहीं लगाया।उसने बस सामने अंधेरे में देखा और कहा—"एक नाम तुम दोनों ने अभी तक नहीं पूछा..."
मोहिनी ने पूछा—"किसका?"
साया ने बहुत धीमे स्वर में कहा—"तुम्हारे पिता का ,उसी क्षण...गलियारे के अंत में एक परछाईं दिखलाई दी। कोई वहाँ खड़ा था ,कुछ क्षणों तक वह स्थिर खड़ा रहा ,फिर उसने धीरे से कहा—"बहुत देर से तुम लोग, मेरा नाम ढूँढ़ रहे हो...
मोहिनी और भानु ने एक-दूसरे की ओर देखा,तब वो परछाईं थोड़ा आगे बढ़ी ,लेकिन उसका चेहरा अभी भी अंधेरे में ही था।
तब उधर से स्वर गूंजा -अब मैं खुद तुम्हारे पास आया हूँ।"गलियारे के अंतिम छोर पर खड़ी वह परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
मशाल की काँपती रोशनी उसके चेहरे तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर बार जैसे अंधेरा उसे निगल लेता ,यह देखकर मोहिनी ने डरकर भानु का हाथ पकड़ लिया।
साया एक कदम आगे आया ,रत्न प्रताप अब उनके पीछे ही थे ,उन्होंने उस परछाईं को देखते ही कहा—"तुम..."वे उसे पहचान गए थे ,उनकी आवाज़ से पता चल रहा था कि वो उस परछाई को पहचान गए हैं और उनकी आवाज में डर भी झलक रहा था।
भानु ने तुरंत उनकी ओर देखा और उनसे पूछा -"क्या आप इसे जानते हैं?"
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।दूसरी तरफ से परछाईं की हल्की हँसी सुनाई दी और फिर एक भारी आवाज सुनाई दी -रत्न प्रताप ! इतने सालों बाद भी, तुमने वही गलती दोहराई।"
क्रोध में रत्न प्रताप की मुट्ठियाँ कस गईं ,वो बोले -तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
"मुझे !अजनबी परछाई ने धीमे स्वर में कहा ,यह हवेली मेरी भी उतनी ही है, जितनी कि तुम्हारी।"
मोहिनी ने पूछा—"आप कौन हैं?"
वो अजनबी आगे बढ़ते -बढ़ते रुक गया ,कुछ क्षणों तक उसकी निगाह मोहिनी पर टिकी रही तब उसने कहा—जिस नाम को तुम ढूँढ़ रही हो...कहते हुए वह एक कदम आगे आया ,उसका आधा हिस्सा तुम्हारे सामने खड़ा है।"
मोहिनी ने अपनी आँखें सिकोडकर उसे न पहचानते हुए कहा - मुझे पहेलियाँ नहीं चाहिए।
"तुम्हें सच चाहिए ,कहते हुए मुस्कुराया।
"हाँ"
"तो पहले अपने अतीत को स्वीकार करना सीखो !"
मोहिनी ने कठोर स्वर में कहा—"मेरा अतीत तो मुझे याद ही नहीं है।"
अजनबी मुस्कुराया ,यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है।तुम्हें याद नहीं...उसने धीरे से कहा—लेकिन तुम्हारा अतीत तुम्हें भूला नहीं है।
