अगले दिन शिल्पा स्कूल में, रोजाना की तरह प्रवेश करती है। वहां पर जाते ही देखती है, कि अभी तक छात्र और अन्य शिक्षिकाएं प्रार्थना स्थल पर ही खड़े हैं। सब उसी की तरफ देखते हैं, यह देखकर वो मन ही मन डर जाती है और उसे लगता है कि कहीं इन्हें कुछ पता तो नहीं चल गया है। मन का चोर स्वतः ही बाहर आ रहा था। उसे बड़ा अज़ीब सा लगा। वहां पर पहले से ही चतुर भी था , हिचकिचाते हुए शिल्पा, अन्य लोगों के मध्य पहुंचती है और कहती है -सॉरी ! आज थोड़ी सी देर हो गई।
आज तो इतना महत्वपूर्ण दिन है ,आज ही आप इतनी देरी से आ रही हैं ,एक शिक्षिका ने कहा
कौन सा दिन ?मैं कुछ समझी नहीं।
एक अध्यापिका होकर भी ये कैसे भूल सकती हैं ?कपिला ने कहा।
कोई बात नहीं, मैडम ! आज आपको छूट है ,चतुर ने कहा। शिल्पा को लगा, मेरी बेइज्जती करने से पहले ये कोई भूमिका बांध रहा है।
तब उसने पूछा - क्या कुछ हुआ है ? आप ऐसे क्यों कह रहे हैं ?
क्या आपको कुछ भी याद नहीं है , चतुर ने रहस्यमय तरीके से पूछा।
शिल्पा ने अन्य शिक्षिकाओं की तरफ देखा, शायद उनसे कोई जवाब मिले किंतु वो भी उसकी तरफ देखकर ही मुस्कुरा रही थी। तब उसने बच्चों की तरफ देखा और बोली -सर ! बच्चे यहाँ किसलिए खड़े हैं ?उन्हें तो कक्षा में भेजिए !
अब तो मन ही मन शिल्पा ने सोच लिया था ,इन सबके सामने आज पूरी तरह से मेरी बेइज्जती होगी। इसीलिए आज सभी यहां पर खड़े हुए हैं।
तभी एक अध्यापिका ने उसके करीब आकर पूछा -मैडम ! क्या आपको कुछ भी स्मरण नहीं है ?
इस तरह पहेलियां मत बुझाओ ! अंदर ही अंदर शिल्पा की घबराहट बढ़ रही थी ,किंतु वह बाहर से अपने को मजबूत दिखा रही थी ,तब वो बोली -कल तो सर ने कोई भी काम ऐसा नहीं बताया था, जो मुझे स्मरण नहीं रहा। फिर वह दिन गिनने लगी ,हो सकता है आज के दिन किसी महान नेता की जन्मतिथि हो।
तब एक शिक्षिका आगे आई और बोली -ऐसे अवसर पर ,अब मैडम और ज्यादा परेशान करने की आवश्यकता नहीं ,कहते हुए बोली - मैडम !आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई ! उसके इतना कहते ही शिल्पा को स्मरण हुआ ,आज तो उसका जन्मदिन है।उसके इतना कहते ही ,सभी बच्चों ने भी एक स्वर में जन्मदिन की बधाई दी।
तब शिल्पा ने एक गहरी सांस लेकर अपनी घबराहट को, अपने से दूर किया। तब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई और बोली -आप लोगों ने तो मुझे डरा ही दिया था।
आप कैसी अध्यापिका हैं ?आपको तो अपना ही जन्मदिन स्मरण नहीं है, एक ने व्यंग्य किया।
कभी-कभी अन्य कार्य भी, महत्वपूर्ण हो जाते हैं। हम गृहणियों को तो अपना जन्मदिन कहाँ याद रहता है ?ससुराल में आते ही पति की ख़्वाहिशें ,बच्चों के होमवर्क ,सास -ससुर की दवाइयां ,इत्यादि घरेलू कार्य ही स्मरण रह जाते हैं।
सही कह रही हो ?इस गृहस्थी के लिए ही तो हम अपने खाली समय का उपयोग करने के लिए यहाँ पढ़ाने आते हैं किन्तु तुम्हारी तो कोई मजबूरी नहीं थी।भाई साहब, तो अच्छा कमाते हैं।
हाँ ,मेरी कोई मजबूरी तो नहीं किन्तु मैं उस समय तो कुछ नहीं कर पाई ,इसीलिए अब मुझे कुछ करने का अवसर मिला तो मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। ''अपनी इच्छा से कुछ अलग करना एक बेहतरीन अनुभव है। हम चाहे, कितने भी बड़े हो जाएँ किन्तु 'उम्र का हर पड़ाव' कुछ न कुछ अनुभव तो दे ही जाता है। यहाँ आकर भी ,मैंने बहुत कुछ अनुभव किया।'' इस सबमें यह महत्व नहीं रखता कि हमारा जन्मदिन कब है ? उस जन्म के पश्चात, हम जो कर्म करते हैं, कभी-कभी वो ही हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
अरे ! मैडम ! आप कहाँ व्यस्त हो गयीं ? यहाँ आइये ! आपको बच्चे भी बधाई देना चाहते हैं। अब तो शिल्पा, सबसे बधाई ले रही थी और बच्चों ने भी, उसके लिए छोटी-छोटी कविताएं सुनाईं।
यह सब तुम्हें कैसे याद रहा ? प्रसन्न होते हुए शिल्पा ने एक अध्यापिका से पूछा।
यह सब' सर' की ही योजना थी, शिल्पा ने चतुर की तरफ देखा ,वह मुस्कुरा रहा था और एक बड़ा सा फूलों का बुके लेकर आया था ,तब बोला - आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई !
धन्यवाद ! वह समझ नहीं पा रही थी, आखिर चतुर क्या चीज है? इस पर विश्वास किया जाए ? या ऐसे समय में भी इसकी कोई योजना है ,उसे विश्वास करना मुश्किल लग रहा था। धीरे-धीरे सभी बच्चों को कक्षा में भेज दिया गया और अन्य अध्यापिकाएं भी अपनी-अपनी कक्षाओं में चली गईं ।
यह सब देखकर शिल्पा को अच्छा तो लग रहा था,मन ही मन सोच रही थी ,अभी तक सर को पता नहीं चला। चलो !अच्छा ही है ,किंतु अंदर ही अंदर डर भी रही थी यदि किसी भी तरह से चतुर को पता चल गया कि पैसे मैंने निकाले हैं , तो शायद मुझे, बेइज्जत करके नौकरी से भी निकाल दे ! किंतु मैं बेइज्जत नहीं होना चाहती, पूरे सम्मान के साथ जाना चाहती हूं और इसकी योजनाओं को अब मैं समझने लगी हूं।
कपिला से भी, वह उसकी सच्चाई बताना चाहती थी , किंतु आज ऐसा मौका था, किसी से कुछ भी नहीं कह सकते थी। फ़िक्र थी, तो उस समय की जब अचानक एक विस्फोट हो।
वह भी कक्षा में चली गई थी किंतु ऐसा लग रहा था जैसे अगले ही पल उसके लिए, बुलावा आ जाएगा और चतुर उससे, उसके पैसों के विषय में जानना चाहेगा। तभी अपने मन को समझाया, उसे मुझ पर शक कैसे होगा ?मुझे तो किसी ने देखा भी नहीं। यहां पर मैं ही एक अकेली अध्यापिका नहीं हूं, अन्य अध्यापिकाएँ भी हो सकती हैं।
दोपहर के खाने के समय पर ,सभी अध्यापिकाएं अपनी कक्षा में ही रहती हैं, ताकि बच्चे, बिना कोई झगड़ा किए सलीके से अपने भोजन को ग्रहण कर सके। जब बच्चे भोजन कर लेते हैं, तब कुछ देर के लिए अध्यापिकाओं को भोजन का समय मिलता है या फिर वहीँ बैठे -बैठे खा लेतीं हैं ,किंतु आज दोपहर के भोजन का समय होते ही, अन्य सभी ने योजना बनाई कि आज सभी एक साथ बैठकर भोजन करेंगीं और इसके लिए उन्होंने शिल्पा को भी बुलाया। अब ऐसे कक्षा को तो छोड़कर नहीं जा सकते थे, तब कक्षा में एक- एक बड़े बच्चों को , अध्यापिका के स्थान पर खड़ा करके वो लोग इकट्ठा हो गईं । तभी सभी शिक्षिकाएं बोली -आज हम सभी मिलकर भोजन करेंगे !
यह सब शिल्पा को अच्छा लगा ,आज सभी एक साथ हैं ,वरना हमारी कभी भी आपस में बात होती तो इस विद्यालय या फिर बच्चों के विषय में ही होती। शिल्पा को भी अच्छा लगा और उसने बाहर से केक भी मंगा लिया। इस तरह से शिल्पा का जन्मदिन अच्छे से मन गया।
शाम को चलते समय, चतुर ने पूछा -मैडम ! आपने यहां किसी अध्यापिका को या किसी बच्चे को इधर-उधर भटकते हुए देखा था।
