Rasiya [part 156]

शिल्पा ,अपनी सहयोगी अध्यापिकाओं के आ जाने से अत्यंत प्रसन्न थी और तब वह उन्हें बताती है -किस तरह चतुर उसे, अपने स्कूल में सहयोग के लिए बुलाता है ?

तब आपने क्या किया ?

क्या करती ?जैसा उसने कहा था ,ऐसा कुछ भी नहीं था ,वो तो अपनी पत्नी को किसी भी बात में आगे आने ही नहीं देता था। दोनों ही जैसे मिले हुए थे। वैसे हर समय उसके साथ होती। वो किसी को पत्नी की बीमारी बताकर ,कभी उसको अनपढ़ मूर्ख बताकर ''अपना उल्लू सीधा करता है। ''


सब कुछ अच्छे से चल रहा था ,अचानक ही न जाने क्या हो गया ? मैंने उनसे प्रश्न किया। 

चतुर ने मुझे बताया था ,कि कुछ आर्थिक परेशानी है ,तब मैंने उसकी सहायता की किंतु जब मुझे जरूरत आन पड़ी तो आनाकानी करने लगा। हालाँकि वो इतना तो समझती ही थी, कि किसी ने भी ,स्कूल में जाकर कह दिया तो संबंधों में और दरार पड़ सकती है। उसे ये भी ड़र था, कि स्कूल की कोई भी बात प्रवीण के कानों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। 

तब वो बोली - अब आप ही सोचिये ! जब मेरे पति को मालूम है कि मैं नौकरी करती हूं तो उन्हें भी लगता था इसके पास तो पैसे होंगे ही...उन्हें क्या मालूम था ? कि मैंने पैसे चतुर को दे दिए। अब ऐसे में मेरी परेशानी बढ़ गयी। 

यह क्या बात कर रही है ?आप ! क्या पिछले माह आपने अपना वेतन नहीं लिया था ?

नहीं, पिछले महीने तो लिया किन्तु उससे पहले मैंने एक ही महीने का वेतन नहीं लिया, बल्कि अपनी तरफ से और पैसे भी उनकी सहायता के लिए दे दिए।  तभी तो तुम लोगों को वेतन मिला था किंतु उसने मेरे पैसे मुझे समय पर नहीं दिए और मैं चाहती थी, कि मुझे पैसे मिलें , क्योंकि मेरे पति को यह मालूम था कि मैं वहां नौकरी करती हूं तो मेरे पास पैसे तो होंगे ही , उन्हें क्या मालूम था ? कि वे पैसे मैं, चतुर को दे चुकी हूं। 

उन्हें पता चल जाता कि मैंने स्कूल के लिए पैसे दिए हैं ,तब वो कितना नाराज होते ?मुझे क्या मालूम था मुझे समय पर पैसा वापस नहीं मिलेगा। अरे वो ,बड़ा मीठा है, वह लच्छेदार बात करके पहले फुसला लेता है, भाभी !भाभी ! करता है।  जब मुझे उसकी असलियत का एहसास हुआ, तब मैंने उसकी नौकरी छोड़ दी। 

सभी अध्यापिकाएं तो ,कुछ और ही बात सोचकर आईं थीं ,क्योंकि ''आँख की अंधी' तो वो भी नहीं थीं किन्तु जब उन्होंने, शिल्पा के मुख से बातें सुनी तो कहानी कुछ और ही नजर आई।  क्या आपको, आपके पैसे नहीं मिले ? एक अध्यापिका ने पूछा। 

मिले नहीं, मैंने लिए.... मैंने जब उसका हिसाब -किताब देखा और मुझे लगा ,कि उसने, मुझसे झूठ बोला है तब मैंने अपने पैसे ले लिए क्योंकि वह पैसे देने में आना कानी कर रहा था। अरे ! उसका तो व्यवहार ही बदल गया था।

आपने कैसे लिए ?काव्या ने पूछा। 

किन्तु उन्होंने, उसके प्रश्न का जबाब देना उचित नहीं समझा इसीलिए बात को गोलमोल कर गयी।  हम लोग चाय -नाश्ता करके उनके घर से और चतुर की बुराई सुनकर अपने घर आ गए। अपनी व्यथा  बताते हुए वो रोने भी लगी थी और कह रही थी -कि मैंने , उसके कहने  में आकर ,अपने घर के चार काम छोड़कर उसके यहां काम किया ,वह तो बहुत ही मतलबी इंसान निकला । इससे ज्यादा वह हमें कुछ और न बता सकी, किंतु उनका व्यवहार और उनके संबंध हमने स्कूल में भी देखे थे। इसलिए हम बहुत कुछ समझ भी गए थे जो वो कह न सकीं । 

वो हमारे पड़ोस और मोहल्ले में ही रहतीं थीं ,तब बाद में सुनने में आया था,कि उनके पति ने ,उस दिन उनकी बातें सुन ली थीं और तब उन्होंने बताया ,कि उनके पति प्रवीण को पहले ही पता चल गया था कि शिल्पा ने चतुर को पैसे दिए हैं। 

उनके किसी जानने वाले ने ही बताया था ,कि आपकी पत्नी स्कूल में कमाने जाती है या फिर पैसे लुटाने क्या बात है ? उसने ये बात इस तरह से बताई, कि प्रवीण को क्रोध आ गया। वो शिल्पा से पूछना चाहकर भी पूछ नहीं पा रहा था इसीलिए अपने पास पैसे न होने की बात कही ,ताकि उन्हें पता तो चल सके कि शिल्पा के पास पैसे हैं या नहीं। 

ये उसने बड़ी ही समझदारी से कार्य किया, समीर बोला -यदि वो सीधे -सीधे पूछ लेता, तो उस समय शिल्पा के पास भी कोई जबाब नहीं था। हो सकता है ,इस तरह से उनके बीच की दूरियां और बढ़ जातीं। समय रहते धीरे -धीरे सब सरल हो गया और शिल्पा को भी यह बात समझ आ गयी कि वो गलत थी ,तभी तो उसे पश्चाताप  हो रहा था। 

 आजकल कपिला पर विशेष ध्यान दिया जा रहा था, कपिला भी अपनी उन्नति से प्रसन्न थी ,नई-नई साड़ियां पहन कर आती थी, उसका वेतन भी बढ़ गया था। ''डूबते को तिनके का सहारा ''उसकी आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर थी किन्तु अब उसके बच्चे उसी स्कूल में आते ,उसका वेतन भी बढ़ गया। अपने को अब वह उस विद्यालय की'' प्रधानाचार्य '' समझती थी।  हालांकि वही कार्य करती थी, जो उससे चतुर कहता था। उसकी प्रशंसा करता ,कई बार उसके करीब आने का प्रयास करता। 

 पहले तो कपिला ने सोचा, कि मुझे सर को नाराज नहीं करना है। इस स्कूल में मेरे बच्चों की शिक्षा और मेरी आमदनी में इजाफा हुआ है। किंतु जब चतुर का व्यवहार हद से ज्यादा बढ़ने लगा। डर सताने लगा ,कल को यदि मेरी नौकरी पर आंच आती है ,तब शायद मेरे बच्चों को भी ये निकाल बाहर करे। 

तब एक दिन उसने स्वयं ही नौकरी छोड़ दी। 

क्या, उसने अचानक ऐसा क्यों किया ?क्या चतुर ने ,उससे भी कुछ कहा। 

उसने हमें तो कुछ नहीं बताया ,और ये सब उसने अचानक नहीं वरन पहले से ही सोच लिया था। 

जब मैं, उससे मिली थी, तब उसी ने बताया था कि चतुर चरित्र का अच्छा नहीं है ,ज़बरन ही करीब आने का प्रयास करता है ,उसे लगता है ,ये आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं ,तो जो कहूंगा, वो मानेगी ,मैंने उसकी नौकरी नहीं की ,उसके विद्यालय में सम्मान के साथ एक शिक्षिका के रूप में कार्य किया और अब सम्मान के साथ ही जा रही हूँ। उसे पता होना चाहिए ,हर महिला एक जैसी नहीं होती। 

मैं तो पहले से ही नौकरी ढूंढ ही रही थी। हम उसके यहां काम करते हैं, उसकी गुलामी करने नहीं आते  हैं  जहां मेहनत करेंगे, वहीं चार पैसे कमाएंगे, उसका ऐसा दृढ़ संकल्प और विश्वास देखकर मुझे बेहद खुशी हुई। मेरे भी लगभग छह महीने पूरे हो चुके थे, और मैंने भी, वहां से नौकरी छोड़ दी थी, किंतु, अड़ोसी -पड़ोसी से सुनने को मिल जाता था कि न जाने कहां से अध्यापिका उसके विद्यालय में आती हैं। आस -पड़ोस के लोग उससे कोई  संबंध नहीं रखते थे। सुनने में तो ये भी आया था ,वो अपने स्कूल की सातवीं -आठवीं कक्षा की लड़कियों को भी गलत तरीक़े से छूता था ,क्योंकि आठवीं तक आते -आते लड़कियां बड़ी हो जाती हैं और सब समझने भी लगती हैं।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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