Kiski dulhan [part 49]

मोहिनी जानना चाहती है ,उस बच्ची का क्या नाम है ? बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—जब तुम मुझे पहचानोगी, तब समझ जाओगी।

अचानक दूर से किसी व्यक्ति की आवाज आई—“बच्चों!”तीनों ने एक साथ पीछे देखा ,एक आदमी आँगन के दरवाजे पर खड़ा था।उसका चेहरा स्पष्ट दिखलाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी उंगली में…वही लाल पत्थर वाली अंगूठी थी। बच्ची का हाथ अचानक मोहिनी के हाथ से छूट गया ,उसकी आँखों में डर समा गया।


तब उस व्यक्ति ने, जैसे उन्हें आदेश दिया -तुम दोनों यहाँ से जाओ !”

मोहिनी ने उसका हाथ फिर पकड़ लिया “नहीं ,हम लोग साथ जाएंगे।

बच्ची ने सिर हिलाया -“नहीं ,उसकी आँखों में आँसू थे ,अगर हम तीनों साथ गए…वह रुक गई ,तो वो हम तीनों को ढूँढ लेगा।”

भानु ने पूछा—“कौन ?

बच्ची ने उस आदमी की तरफ देखा ,फिर बहुत धीमे से कहा—“जिससे, तुम्हें बचाने के लिए मुझे मरना पड़ेगा।

मोहिनी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली -“तुम नहीं मरोगी।”

बच्ची मुस्कुराई और बोली -तुम्हें यह बात हमेशा याद रखनी है।”

“क्या?”

“अगर कभी कोई कहे कि मैं मर गई…उसने मोहिनी के कान के पास आकर फुसफुसाया—उसकी बात पर विश्वास मत करना।”

मोहिनी ने अचानक आँखें खोल दीं ,वह वर्तमान में लौट आई थी।उसकी साँसें तेज थीं ,भानु ने उसके कंधे पकड़े हुए थे उसकी खुली आँखों को देखकर बोला -“मोहिनी !”

वह उसे देख रही थी ,तब वो बोली - मुझे सब याद आ गया, सभी उसकी ओर देखने लगे।

समवेत स्वर -“क्या?”

मोहिनी ने काँपती आवाज़ में कहा—“18 अगस्त की सुबह…उसकी नजर तस्वीर पर गई ,वह हमारे साथ थी।”

M.V. ने पूछा—“कौन?

मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,“वही तीसरी बच्ची ,फिर उसने अपनी मुट्ठी खोली ,उसमें कुछ नहीं था ,लेकिन उसकी उंगलियाँ ऐसे बंद थीं ,जैसे वह अभी भी कोई चीज़ पकड़े हुए हो। उसने मुझे एक लाल रिबन दिया था।”

मृणाल अचानक पीछे हट गई ,“रिबन…उसके मुँह से निकला।

मोहिनी ने तुरंत उसकी ओर देखा ,और पूछा -“क्या आप क्या जानती हैं ?उसके बारे में..”

मृणाल की आँखें भर आईं और बोली -“हाँ।”

“क्या?”

मृणाल ने उत्तर नहीं दिया।

मोहिनी  ने कहा—माँ…मृणाल ने उसकी तरफ देखा ,उस बच्ची ने उस रात…वह रुक गई।

“क्या?”

मृणाल ने धीरे से कहा—तुम दोनों को बचाने के लिए खुद को सामने कर दिया था। 

मोहिनी  का दिल जोरों  से धड़क उठा और पूछा -तो क्या वह मर गई ? 

मृणाल ने तुरंत उसकी आँखों में देखा ,मैंने ऐसा नहीं कहा।”

मोहिनी चुप हो गई ,यही शब्द…बिल्कुल यही शब्द…उस बच्ची ने भी कहे थे -“अगर कोई कहे कि मैं मर गई… तो उसकी बात पर विश्वास मत करना। मोहिनी ने धीरे से कहा—“वह जिंदा थी।”

M.V. ने उसकी तरफ देखा और बोला -“हो सकती है। ”

मोहिनी चौंकी -ये आप कह रहे हैं ,हो सकती है। ”

M.V. ने नजरें झुका लीं ,कुछ यादें सच होती हैं…उसने कहा ,लेकिन यादों में दिखाई देने वाली हर चीज़ जरूरी नहीं, कि उसी रूप में सच हो।

मोहिनी ने उसे घूरा ,आप फिर पहेली बुझा रहे हैं। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ?कि वो सच नहीं हो सकती। 

M.V. हल्का-सा मुस्कुराया ,क्योंकि अभी तुम्हें सिर्फ इतना जानना चाहिए 'कि वह बच्ची तुम्हारी दुश्मन नहीं थी।”

भानु ने पूछा—“और अब?”

M.V. की मुस्कान गायब हो गई ,“अब…गंभीर होते हुए उसने शब्द दोहराया। उसने तस्वीर की तरफ देखा और बोला - मुझे नहीं पता, वह किसके साथ है।”उसी क्षण कमरे के बाहर से धीमी कदमों की आवाज आई। उसने एक…दो…और तीन…क़दम ही बढ़ाये होंगे ,फिर दरवाजे के बाहर आकर जैसे कोई रुक गया। सभी चुप हो गए ,दरवाजा धीरे-धीरे खुला ,लेकिन वहाँ कोई नहीं था। फर्श पर एक छोटी-सी लाल रिबन पड़ी थी। मोहिनी की साँस रुक गई ,वही रिबन…जो उसने अपनी याद में उस बच्ची के हाथ में देखा था। वह आगे बढ़ी ,भानु ने उसका हाथ पकड़ना चाहा लेकिन इस बार मोहिनी  ने उसका हाथ नहीं छोड़ा ,दोनों साथ आगे बढ़े। मोहिनी ने रिबन उठाया,उसके पीछे एक छोटा-सा कागज बंधा था।उस पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे—“मैंने तुम्हें पहचान लिया मोहिनी !और नीचे…सिर्फ एक अक्षर ,“— A”

वो लाल रिबन मोहिनी की हथेली में था ,उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं ,कागज पर लिखे चार शब्द लगातार उसकी आँखों के सामने घूम रहे थे—मैंने तुम्हें पहचाना, मोहिनी !और नीचे सिर्फ एक अक्षर—A

भानु बिल्कुल उसके समीप खड़ा था ,तब उसने पूछा -यह A किसका है?”

मोहिनी ने कागज को पलटकर देखा, पीछे कुछ नहीं था “पता नहीं ,तुम्हें क्या लगता है ?यह उसी बच्ची ने भेजा है?”

मोहिनी ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया ,उसने रिबन को देखा और बोली - यह रिबन वही है।”

“पक्का ! क्या तुम्हें विश्वास है ?

“मेरी याद में…वह रुकी ,उसने मुझे यही रिबन दिया था।”

M.V. धीरे-धीरे आगे आया ,उसने रिबन को ध्यान से देखा ,लेकिन जैसे ही उसकी नजर रिबन के एक छोटे-से किनारे पर पड़ी, उसका चेहरा बदल गया।

भानु ने भी गौर से देखा ,आपने कुछ पहचाना।”

M.V. ने रिबन हाथ में लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ,लेकिन मोहिनी ने ,उसे रोक दिया “नहीं”

M.V. ने मोहिनी की तरफ देखा,और बोला - इसे, मुझे देखने दो !

 पहले बताइए इसमें क्या है ? कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे ,फिर M.V. ने कहा—इस रिबन के किनारे पर जो धागा है…मोहिनी ने उसे ध्यान से देखा ,लाल रिबन के किनारे बहुत बारीक सुनहरे धागे से एक छोटा-सा निशान बना हुआ था ,'दो साँप !और उनके बीच एक फूल ,वही निशान ! जो उन्हें हवेली के तहखाने में बार-बार दिखलाई दे रहा था। मोहिनी ने धीमे से कहा—यह वही है।

भानु ने पूछा—लेकिन यह निशान तो हमारे परिवार से जुड़ा है।”

M.V. ने, न में सिर हिलाया। 

“तो ? क्या यह परिवार का निशान नहीं है ?

 उसकी आवाज़ गंभीर हो गई ,यह उस कमरे का निशान है।”

मोहिनी ने तुरंत पूछा—कौन-सा कमरा ?M.V. ने कोई जवाब नहीं दिया।

रत्न प्रताप अचानक बोला—पुरानी नर्सरी !

मोहिनी और भानु  दोनों उसकी तरफ मुड़े ,“नर्सरी?”

रत्न प्रताप ने नजरें फेर लीं ,और पिछली यादों में पहुंच सोचते हुए बोला -“हवेली के पश्चिमी हिस्से में एक कमरा था।

“था' क्या अब नहीं है ?या अब बंद है मोहिनी  ने पूछा - अब बंद है ,तो क्यों?”रत्न प्रताप  चुप रहा ,उसने कोई उत्तर नहीं दिया। 

भानु ने कहा—क्योंकि वहाँ कुछ हुआ था?”

रत्न प्रताप ने, भानु की तरफ देखा और उसकी बात का समर्थन किया “हाँ।”

“क्या?”

रत्न प्रताप  ने, बहुत धीमे से कहा—तीन बच्चे वहाँ खेलते थे।”

मोहिनी  का दिल फिर तेजी से धड़कने लगा और पूछा -“हम ”

रत्न प्रताप ने सिर हिलाया ,“हाँ”

और वो तीसरी बच्ची कौन थी ? इस बार भी रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।

मोहिनी समझ गई ,वह भी हमारे साथ रही होगी। 

कुछ पल बाद उसने पूछा— तो आपने हमें ये सब पहले कभी क्यों नहीं बताया ?”

रत्न प्रताप  की आवाज में थकान थी ,क्योंकि उस कमरे का दरवाजा बंद करने के साथ…वह रुका ,कुछ यादें भी बंद करनी पड़ी थीं।”

मोहिनी ने,उस रिबन को मुट्ठी में कसकर पकड़  लिया ,मुझे वहाँ जाना है।M.V. ने तुरंत कहा—“नहीं।”“क्यों?”

“क्योंकि वह कमरा सुरक्षित नहीं है।”

भानु ने पूछा—किससे?”

M.V. ने उसकी तरफ देखा ,जिस आदमी से तुम दोनों को बचाया गया था।”

मोहिनी का चेहरा कठोर हो गया ,क्या ये वही लाल अंगूठी वाला इंसान था ? 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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