Kiski dulhan [part 51]

सुबह की पहली रोशनी की किरण ,हवेली की ऊँची खिड़कियों से भीतर उतर रही थी।रात में जो कुछ हुआ था, उसके निशान अभी भी सबके चेहरों पर थे लेकिन हवेली…हमेशा की तरह शांत थी। इतनी शांत कि लगता था, जैसे उसने रात की हर चीख, हर रहस्य और हर कदम को अपने भीतर दफना लिया हो। मोहिनी अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी।उसकी हथेली में वही लाल रिबन था ,वह बार-बार उसे देख रही थी।उसे वो रात की बातें किसी सपने जैसी लग रही थीं। तीन बच्चे ! 18 अगस्त 2001 वह रहस्यमयी लड़की। M.V.,लाल अंगूठी और फिर कानों में गूंजते वो शब्द —“मैंने तुम्हें पहचाना, मोहिनी !”


वो शब्द जैसे अभी भी उसके कानों में गूंज रहे थे ,मोहिनी समझ नहीं पा रही थी ,वो सपना था या फिर सच... उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं ,लेकिन इस बार कोई पुरानी याद नहीं आई ,सिर्फ एक सवाल उसके ज़ेहन में आया—अगर वह लड़की सचमुच मौजूद थी, तो आज कहाँ है ?

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई ,मोहिनी खिड़की से हटकर पलटी, उसने पलटकर देखा ,बाहर भानु खड़ा था।उसके चेहरे पर रातभर की थकान थी ,लेकिन आँखों में वही बेचैनी !मोहिनी उसे देख रही थी ,तब वो मोहिनी को वहीं खड़े देखते, देखकर बोला - क्या मैं अंदर आऊँ?”

अपनी भूल पर मोहिनी थोड़ा हड़बड़ाई ,ओह ! कहते हुए दरवाजे के सामने से हट गयी ,तब हल्का-सा मुस्कुराई और बोली - यह तुम्हारा भी कमरा है।”भानु  अंदर आया और उसने दरवाजा बंद कर दिया।कुछ क्षण दोनों के मध्य  खामोशी बनी रही।तब  भानु ने पूछा—“क्या आज सोई नहीं? 

“नहीं, तुम्हारी आँखें बता रहीं हैं ,तुम भी नहीं सोये। 

“हाँ ,मैं भी नहीं सो पाया। 

मोहिनी  ने उसकी ओर देखा और पूछा -“क्यों?”

भानु  कुछ पल चुप रहा ,फिर बोला—क्योंकि मेरे दिमाग में एक बात घूम रही है।”

“क्या?”

वह उसके सामने आकर खड़ा हो गया ,तुम हर रात दो बजे कहाँ जाती थीं ?”

मोहिनी की मुस्कान अचानक गायब हो गयी,वह अभी चुप ही थी। वो समझ ही नहीं पा रही थी क्या जबाब दे ?

भानु  ने आवाज धीमी रखी ,तब बोला -मैंने यह सवाल तुमसे पहले भी पूछा था।”

मोहिनी ने नजरें झुका लीं और बोली - मुझे नहीं पता ,कुछ महसूस तो होता है ,कुछ दृश्य अस्पष्ट से नजर आते हैं। 

“क्या तुम्हें सच में नहीं पता ?”भानु उसके चेहरे पर नजरें टिकाते हुए पूछता है। 

“हाँ।”

  तुम कब उठकर जाती थीं?”

“मुझे याद ही नहीं है। 

और कब सुबह वापस आ जाती थीं?”

मोहिनी ने धीरे से सिर हिलाया ,“शायद !अपने आप आ जाती होंगी ,हो सकता है ,मैं जाती ही न हों। 

भानु ने कुछ क्षण उसे देखा ,“शायद ”क्या शायद तुम्हारा जाना या सुबह आ जाना। 

“भानु …क्या तुम, मुझ पर शक कर रहे हो ?

“नहीं ,उसकी आवाज कठोर नहीं थी ,बस थकी हुई थी ,अब मुझे सच चाहिए।”

मोहिनी ने उसकी आँखों में देखा और एक गहरी स्वांस लेते हुए बोली -“मुझे भी।”

भानु कुछ कह नहीं पाया।

तब मोहिनी ने आगे कहा -लेकिन एक बात मुझे अब समझ आ रही है।”

“क्या?”

“शायद ,मैं हर रात कहीं जाती ही नहीं थी।”

भानु की भौंहें सिकुड़ गईं ,“तो? तुम कहना क्या चाहती हो ?

मोहिनी ने अपनी कनपटी पर हाथ रखा ,जैसे याद करने का प्रयास कर रही हो,तब बोली - शायद, कोई मुझे कहीं ले जाता था।”

भानु बिल्कुल स्थिर हो गया ,“कौन?”

“पता नहीं।”

“ क्या तुम्हें कोई आवाज याद है ?”

मोहिनी ने सोचने की कोशिश की ,कुछ क्षण बाद उसने कहा—“एक घंटी।”

“घंटी?”

“हाँ।”

“वो घंटी कैसी थी ?उत्साहित होते हुए भानु ने पूछा। 

“बहुत हल्की ,वह आँखें बंद करके बोली—हर रात…उसकी आवाज धीमी हो गई ,दो बजने के कुछ मिनट बाद।”

भानु ने तुरंत कहा—तो आज रात हम पता लगाएंगे।”

मोहिनी ने उसकी तरफ देखा और बोली -“हम?”

“हाँ ,अगर तुम्हें कुछ हो गया तो? कहकर भानु  हल्का-सा मुस्कुराया और बोला - तुम्हारे साथ शादी करने के बाद, वैसे भी मेरी जिंदगी सामान्य नहीं रही।”

मोहिनी के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई ,तब बोली -तुम्हें, मुझसे बहुत शिकायतें  हैं ?”

“बहुत।”

“फिर भी साथ हो?”

भानु ने, उसकी आँखों में देखते हुए कहा—यही तो समस्या है।”

मोहिनी की मुस्कान कुछ क्षणों के लिए रुक गई। भानु ने अपनी नजरें हटा लीं।कमरे में फिर से खामोशी छा गई ,लेकिन इस बार वह खामोशी असहज नहीं थी ,उसमें दोनों के बीच कुछ बदल रहा था।शायद भरोसा, शायद उससे भी ज्यादा कुछ ,तभी बाहर से किसी की आवाज आई—''भानु !”

भानु ने दरवाजा खोला ,तो सामने रणवीर खड़ा था ,उसके चेहरे पर सामान्य शरारती भाव नहीं थे।इस समय वह गंभीर था।“क्या हुआ?” भानु ने पूछा।

रणवीर ने मोहिनी की तरफ देखा और बोला -आप दोनों को नीचे आना होगा।”

“क्यों?”

“ रत्न प्रताप जी ने सबको बुलाया है।”

भानु  ने पूछा—“किसलिए?”

रणवीर ने धीमे से कहा—रूद्र आ गया है।”

यह सुनकर मोहिनी का चेहरा अचानक बदल गया ,उसके मुख से निकला -'रूद्र !

रणवीर ने हाँ में सिर हिलाया।भानु ने मोहिनी की तरफ देखा।उसके चेहरे पर कोई स्पष्ट भाव नहीं था।लेकिन मोहिनी के भीतर जैसे कुछ ड़गमगा रहा था। रूद्र ! उसका अतीत !उसकी शादी से जुड़ा नाम। वह व्यक्ति जिसके कारण, उसकी जिंदगी की दिशा बदली थी।जिसके बारे में हवेली में कोई खुलकर बात नहीं करता था।

भानु ने उसका हाथ पकड़ा और बोला -अब तुम अकेली नहीं हो ,इसीलिए तुम अकेली नहीं जाओगी।”

मोहिनी ने उसकी ओर देखा और बोली - मुझे डर नहीं लग रहा।”

मुझे लग रहा है।”

“किससे?”

भानु ने नीचे की ओर देखते हुए कहा—यही डर  सता रहा है कि वो यहाँ क्यों आया है ?”

हवेली के मुख्य हॉल में लगभग पूरा परिवार मौजूद था।रत्न प्रताप राजवीर  सबसे आगे खड़ा था। उसके चेहरे पर तनाव था।साया खिड़की के पास खड़ा था।मृणाल कुछ दूरी पर बैठी थी। रणवीर सीढ़ियों के पास था और हॉल के बीचोंबीच…एक आदमी खड़ा था ,मोहिनी ने उसे देखा। कुछ पल के लिए उसकी साँस रुक गई और मुख से निकला -रूद्र !

वह पहले से ज्यादा बदला हुआ लग रहा था।इस समय उसका चेहरा गंभीर था ,उसकी आँखों में थकान थी लेकिन सबसे अजीब बात यह थी—वह सीधे मोहिनी को नहीं देख रहा था।वह भानु को देख रहा था।जैसे दोनों के मध्य कोई ऐसी बात हो जिसे मोहिनी नहीं जानती।

भानु आगे बढ़ा और उससे पूछा -“तुम यहाँ क्यों आए हो?”

रूद्र ने शांत स्वर में कहा—क्योंकि अब छिपने का समय खत्म हो गया है।”

रत्न प्रताप ने तुरंत कहा—रूद्र !

रूद्र  ने उसकी तरफ देखा ,और बोला - आपने बहुत साल छिपाया,जो करना जरूरी था, किया।”

“जरूरी?”

रूद्र हँसा ,लेकिन उस हँसी में कड़वाहट थी ,आपने एक आदमी को मृत घोषित किया।”

मोहिनी का दिल धड़क उठा।

रत्न प्रताप का चेहरा कठोर हो गया और वो बोला -इस विषय पर यहाँ बात नहीं होगी।”

रूद्र  ने पूछा —“तो कहाँ होगी?फिर उसकी नजर मोहिनी पर गई और बोला -शायद ,अब इन्हें भी जानना चाहिए।”

मोहिनी आगे बढ़ी और पूछा -मुझे क्या जानना चाहिए ?”

रूद्र  कुछ क्षण चुप रहा ,फिर बोला—जिस आदमी को इस परिवार ने मृत बताया है…”उसने भानु की तरफ देखा और रहस्य खोलते हुए बोला …वह जिंदा है।”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post