Kiski dulhan [part 45]

उस लाल अंगूठी वाले व्यक्ति से बचने के लिए ,वे सभी सीढ़ियों से होते हुए एक कक्ष में पहुंचते हैं। उन्हें वहां कुछ पुरानी कैसेट मिलती हैं ,जो शायद उनके लिए सबूत बन सकती थीं। तब उन्होंने जाँच करने पर पाया। सत्रह अगस्त वाली कैसेट गायब थी। उस कैसेट को ,साया ने कमरे में चारों ओर ढूंढा ,किन्तु वो कहीं नहीं मिली। तब साया बोला - किसी ने उसे जानबूझकर हटाया है।"

तब रत्न प्रताप ने धीरे से कहा—वो मेरे पास थी ,सबकी निगाह उनकी ओर गई।

भानु  ने आश्चर्य से पूछा—"क्या? वो आपके पास है और हम उसे ढूंढने के लिए इतना परेशान हो रहे हैं ,आपने ये बात हमें पहले क्यों नहीं बताई ?


रत्न प्रताप  ने कहा—थोड़ा शांत होकर मेरी बात तो सुन लो !"17 अगस्त की रिकॉर्डिंग...."

मोहिनी ने आगे बढ़कर पूछा—"आपने उसे कहाँ रखा है ?"

रत्न प्रताप  ने कुछ नहीं कहा ,वो एकदम ख़ामोश हो गया। 

"रत्न प्रताप जी "इस बार मोहिनी की आवाज़ में गुस्सा था।"आपने मुझसे कहा था,' कि आप मुझे बचा रहे हैं ।"

"हाँ।"

"फिर यह रिकॉर्डिंग क्यों छिपाई ?"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा और बोला -"क्योंकि उसमें...वह रुक गए

उसमें क्या?लगभग चीखते हुए मोहिनी ने पूछा -आगे क्यों नहीं बोल रहे हैं ?

"क्योकि उसमें तुम्हारे पिता की आवाज़ है ,"कमरे में सन्नाटा छा गया।

मोहिनी ने धीमे स्वर में पूछा—"और ?"

रत्न प्रताप ने कहा—"उसमें यह भी बताया गया है कि..."उनकी आवाज़ भारी हो गई ..तुम्हें किसने जन्म दिया ?"मोहिनी जैसे पत्थर की हो गई।

भानु ने उसकी ओर देखा और हताश मोहिनी को देखकर पूछा -".मोहिनी !..

लेकिन मोहिनी  ने हाथ उठा दिया -"नहीं "उसकी आँखें रिकॉर्डर पर थीं ,अब यह रिकॉर्डिंग मुझे सुननी है।"अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। धड़ाम! सबने पलटकर देखा ,लोहे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो चुका था।

भानु दौड़कर उसके पास गया और जोर लगाकर उसे खोलने का प्रयास किया किन्तु असफ़ल रहा ,तब बोला - यह खुल नहीं रहा है। "

M.V. ने उसके नजदीक जाकर ताला देखा और बोला - यह बाहर से बंद नहीं हुआ है। "

"तो?"

"अंदर से बंद हुआ है "

भानु पीछे हट गया ,इसका क्या मतलब हुआ ?"

M.V. ने धीरे से कहा—इस कमरे में कोई और भी है।"

मोहिनी का दिल तेज़ी धड़कने लगा ,साया ने मशाल ऊपर उठाई और इधर -उधर देखने पर कमरे के एक कोने में...उसे एक परछाईं दिखलाई दी। वो बहुत छोटी सी छाया थी ,जैसे किसी बच्चे की।

मोहिनी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी ,"कौन है ? परछाईं स्थिर रही। मोहिनी ने एक कदम और बढ़ाया।

फिर...परछाईं ने अपना हाथ उठाया ,उसकी उँगली में...एक छोटी लाल अंगूठी दिखलाई दी। 

मोहिनी वहीं रुक गई ,आश्चर्य से बोली -"यह...नहीं !

एकदम से M.V. का चेहरा बदल गया ,

भानु ने पूछा— क्या हुआ?"

M.V. ने बहुत धीमे स्वर में कहा—यह संभव नहीं है ,परछाईं धीरे-धीरे रोशनी में आई ,वो एक पांच -छह बरस की  बच्ची थी। उसके हाथ में वही पीतल की सीटी थी और वह सीधा मोहिनी को देख रही थी।

मोहिनी के होंठ काँपे ,"मैं..."

बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—तुमने ,मुझे बहुत देर से पहचाना।"

मोहिनी का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया ,"तुम कौन हो?"बच्ची ने कोई उत्तर नहीं दिया।उसने सिर्फ़ दीवार की ओर इशारा किया।वहाँ एक पुराना चित्र था।

मोहिनी ने उस चित्र को देखा ,चित्र में...दो बच्चे खड़े थे।एक मोहिनी ,दूसरा भानु  लेकिन उनके बीच...एक तीसरी बच्ची भी थी।मोहिनी ने काँपती आवाज़ में पूछा—"यह कौन है?"

बच्ची ने धीरे से कहा—"मैं और उसी क्षण...दीवार के पीछे से एक आवाज़ आई—मोहिनी  को एक नहीं... दो बच्चों से बचाया गया था।"

रत्न प्रताप का चेहरा बदल गया ,M.V. ने आँखें बंद कर लीं।

भानु ने पूछा—ये तीसरा बच्चा कौन था?"

बच्ची ने मोहिनी की ओर देखा ,फिर बहुत धीमे स्वर में कहा—जिसे तुम सबने मरा हुआ समझ लिया था।"

मोहिनी की साँस रुक गई ,बच्ची की लाल अंगूठी चमकी और कमरे की सारी मशालें एक साथ बुझ गईं।अब कमरे में घना अंधेरा था।इतना गहन अंधकार कि मोहिनी को अपनी साँसों की आवाज़ भी किसी और की प्रतीत हो रही थी।

 कुछ क्षण पहले तक सामने खड़ी वह छोटी-सी बच्ची अब स्पष्ट दिखलाई दे रही थी—हाथ में पीतल की सीटी, उंगली में लाल पत्थर वाली छोटी-सी अंगूठी और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान, जिसमें मासूमियत से ज्यादा कोई पुराना रहस्य छिपा था और फिर…सब कुछ अंधेकारमय !

“मोहिनी !”भानु की आवाज़ अचानक अंधेरे को चीरती हुई आई।

“मैं यहीं हूँ !मोहिनी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया ,उसी पल किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।वो स्पर्श भानु का नहीं लग रहा था ,वो घबरा गई और पूछा -“कौन?”

“मैं हूँ ,भानु ! उसकी आवाज सुनकर मोहिनी ने राहत की साँस ली ,शायद अँधेरे के डर ने उससे ये करवाया। भानु की पकड़ मजबूत थी ,तब वो बोला -मेरे पास रहो !”मोहिनी ने कुछ नहीं कहा लेकिन उसकी उंगलियाँ अनजाने में भानु की उंगलियों में कस गईं। अंधेरे में दोनों कुछ पल वैसे ही खड़े रहे।

फिर पीछे से मृणाल की धीमी आवाज़ सुनाई दी - वह बच्ची कहाँ गई?”

कोई क्या जबाब देता ?वहां सन्नाटा छाया रहा। 

भानु ने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और उसकी फ्लैशलाइट जलाई ,कमरे में एक तेज रोशनी फैली ,लेकिन…वो बच्ची वहाँ नहीं थी।न दरवाजे के पास ,न दीवार के पीछे ,न उस पुराने टेप रिकॉर्डर के पास।वहां कुछ भी नहीं था। सिर्फ फर्श पर वह तस्वीर पड़ी थी ,ये वही तस्वीर थी ,जिसमें छोटी मोहिनी और छोटा भानु उस बच्ची के साथ खड़े थे।

मोहिनी  धीरे-धीरे आगे बढ़ी ,उसने वो तस्वीर उठाई।उसकी नजर सबसे पहले उस बच्ची के चेहरे पर गई।फिर उसने तस्वीर के पीछे कुछ लिखा देखा ,स्याही बहुत पुरानी थी ,लेकिन अक्षर अभी भी पढ़े जा सकते थे। तीसरे बच्चे को कभी वापस मत आने देना।मोहिनी  के हाथ काँप गए ,“तीसरा बच्चा…”उसके मुख से  धीरे से निकला ।

भानु उसके पास आया , मोहिनी मुझे तस्वीर मुझे दे दो !उसने तस्वीर भानु को दे दी।भानु ने पीछे लिखा वाक्य पढ़ा। उसका चेहरा एकदम गंभीर हो गया और बुदबुदाया -“तीसरा बच्चा…”

साया ने फुसफुसाकर कहा— तो वह सचमुच तीसरी थी।”

रत्न प्रताप ने उसकी तरफ देखा और बोला -साया !”

“क्या?”

जो तुम सोच रहे हो, वह मत सोचो !

साया हल्का-सा मुस्कुराया ,मैं वही सोच रहा हूँ, रत्न प्रताप जी … जिससे आप इतने सालों से सबको दूर रखते आए हैं।”

मोहिनी ने दोनों की तरफ देखा और पूछा - आप लोग जानते हैं ,कि वह कौन है?”

किन्तु उधर से कोई जवाब नहीं आया।

मोहिनी की बेचैनी बढ़ गई आगे आकर बोली ,मैंने पूछा… वह बच्ची कौन है?”

रत्न प्रताप ने नजरें झुका लीं ,भानु ने भी उसकी ओर कदम बढ़ाया ,इस बार चुप मत रहिए ! आपको जबाब देना होगा। रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा। भानु की आँखों में गुस्सा था ,पहले मेरी माँ के बारे में झूठ बोला गया ,फिर मोहिनी के बारे में ,फिर हमारे बचपन के बारे में ,क्रोध से भानु की आवाज़ भारी हो गई और अब एक बच्ची सामने आकर कहती है ,-'कि उसे हम सबने मरा हुआ समझ लिया था।”वह एक कदम और आगे बढ़ा ,बताओ -“कौन है ?वो ”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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