Rasiya [part 153]

शिल्पा के मन में 'आग लगी थी 'अब वो अपने किये पर पछता रही थी ,चतुर के व्यवहार से आहत हो, अब वो उस स्कूल में रहना भी नहीं चाहती थी किन्तु  अब वो चाहती थी -''कस्तूरी को चतुर की हरकतों के विषय में बताकर ,उसे आगाह करे ,ताकि कस्तूरी अपने पति को जितना परिश्रमी और होशियार और ईमानदार समझती है ,वो ऐसा नहीं है। अपने  मन की कड़वाहट कस्तूरी के जीवन में घोलना चाहती थी। किन्तु इसके विपरीत कस्तूरी ने चतुर पर अपना ढृढ़ विश्वास और शिल्पा को आईना दिखला दिया। 

तब कस्तूरी कहती है - आपसे भी तो, उन्होंने कोई जबरदस्ती नहीं की थी ,आप खुद ही उनकी झोली में आ गईं , कहते हुए कस्तूरी ने उसे घूरा  और पास रखी मेज पर हाथ मारा। मुझे समझाने से पहले, अपने अंदर तो झांक लेतीं। गलती उनकी नहीं, उस औरत की है, जो किसी पराये पुरुष पर इतना विश्वास कर लेती है और वर्षों के रिश्तों को तार-तार कर देती है।


तुम्हें भी तो उसने झूठा दिलासा देकर ,बेवकूफ़ बनाया हुआ है। शिल्पा गुस्से से बोली -वो अपना स्वार्थ ही सिद्ध नहीं करता ,वो दूसरों की देह से खेलकर अपनी हवस भी मिटाता है और तुम उसका ही साथ दे रही हो। कई बार पारिवारिक झगड़ों में इंसान कमज़ोर पड़ जाता है ,इसका मतलब ये नहीं कि वो उसका लाभ उठाये। 

मैंने कब उन्हें सही ठहराया ? किन्तु ये हमारा आपस का मामला है , आप इसमें हस्तक्षेप न करें। हर रिश्ते में झगड़े होते हैं ,क्या उन्होंने, कभी तुमसे ज़बरन संबंध बनाया ? उस समय तुम भावुक हुईं किन्तु बाद में तो ठीक थी न.... जब तुम कमरे में उनके साथ होती थीं  ,तो क्या मेरे बदन में आग नहीं लगती थी ? मुझे क्रोध नहीं आया होगा। 

क्या कोई पत्नी चाहती है ?कि उसका पति किसी और के साथ सोये। तब मैं भी यही सोचकर संतोष कर लेती थी । मेरे पति का व्यवहार मेरे और बच्चों के प्रति सही है, हमारा ख़्याल रखता है। अपने घर में रहता है ,बाहर नहीं जाता। अब क्या मैं भी ,तुम्हारी तरह किसी और की झोली जा गिरुं ?ये तो समस्या का हल नहीं है। ''दाँत पिसते हुए ''कस्तूरी ने प्रश्न किया। एक इंसान नीचे गिर रहा है किन्तु मेरे संस्कार ऐसे नहीं ,मैं भी उसी राह पर चलूँ। मुझे कम से कम ये तो सुकून है ,वो मेरे पास और मेरे साथ हैं । कभी तुम जैसी औरतों को उसने हमारे रिश्ते के मध्य नहीं आने दिया। 

तुम जैसी औरतों से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?शिल्पा ,कस्तूरी को घूरते हुए बोली। 

देखो बहन जी !मुझे घूरने से कुछ नहीं होगा ,हमारे गांव में तो शहर की औरतों को पढ़ी -लिखी होने के साथ -साथ कुछ ज्यादा ही खुले विचारों की कहते हैं। वो किसी भी मर्द से बात करने में हिचकिचाती नहीं ,क्या पता ? उन्हें अपनी पढ़ाई का घमंड हो। अब तो मैं भी, कई सालों से शहर में रह रही हूँ ,मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,इसीलिए अब मैं कह सकती हूँ। शहर की हवा ख़राब नहीं है ,कुछ लोगों की सोच ही ख़राब है ,जो अपनी सोच के आधार पर अपने विचारों को, अपने सिद्धांतों को तोड़ते -मरोड़ते रहते हैं। 

ऐसा नहीं है ,सभी महिलाएं या फिर सभी पुरुष गलत हैं ,कई बार अपने पतियों के अत्याचार को सहन न कर पाने के कारण वो उनसे अलग हो जाती हैं या फिर ऐसे लोग लाभ उठा जाते हैं। 

तो क्या हुआ ?यदि पति ठीक नहीं है ,तब पढ़ी -लिखी महिला क्या किसी से कम है ?वो अपने को संभाल सकती है ,किन्तु ये बातें सब अलग है। आप यहाँ जो बात करने आईं हैं ,वही कीजिये !

 शिल्पा,को कुछ सूझ नहीं रहा था ,उसके मन पर इतना बड़ा बोझ पहले से ही था ,अब तो कस्तूरी ने तो जैसे उसे नग्न ही कर दिया। उसकी देह जैसे बहुत भारी हो गयी थी ,एक कम पढ़ी-लिखी कस्तूरी की बातें सुन रही थी, उसे लग रहा था ,'आज वह कस्तूरी के सामने कितनी तुच्छ हो गई है ? इसने  सच्च ही तो कहा है -गलती, उन महिलाओं की भी है ,जो जज्बात में आकर बहक जाती हैं। चतुर का तो काम ही है ,बेवकूफ बनाना। जिसमें कि वो शादीशुदा है , उसे कौन कहेगा ? जिस पति के साथ तुम बरसों से रह रही हो, उससे झगड़े भी होते हैं ,प्यार भी उसी से होता है। शिल्पा के तन पर जैसे ''सौ घड़ा पानी पड़ गया हो।'' 

वह धीरे से उठी और आगे बढ़ गयी ,जिससे विवाह हुआ ,सात फेरे लिए ,जब वह ही अपना नहीं हुआ तो चार  दिन पहले तुम्हारे जीवन में आया इंसान ,तुम्हारा क्या होगा ? वो तो उसको भड़काने के उद्देश्य से ,यहाँ आई थी किन्तु आज इस औरत ने ,मुझे ही मेरी गलतियों से परिचय करा दिया। अंदर ही अंदर जैसे वो बिख़र रही थी। इतने वर्षों से, अभी तक अपने दामन में दाग़ नहीं लगने दिया और इन दिनों न जाने ,मुझे क्या हो गया था ? मेरा गुरुर टूट गया। 

आज इस औरत ने शिल्पा की आंखें खोल दीं, उसकी आंखों से झरझर पानी बह रहा था। वो पश्चाताप के आंसू थे या इस उम्र में छली गई है। वह अपने पति से क्या नजरें मिलाएगी ,अपने आप से ही नहीं मिला पा रही थी। क्या वो प्रवीण के सामने सब स्वीकार कर पाएगी  ? आखिरी बार मैंने उनको  स्कूल से रोते हुए जाते देखा था ,उर्वशी ने अपने पति समीर को बताया।

उसका पश्चाताप ही, उसे सही राह पर ले जाने के लिए बहुत है। इंसान जीवन में कभी न कभी धोखा खा ही जाता है। वह अपने आप ही अपने जीवन को सही राह पर चलाये वही बहुत है। पति को बताना तो उचित नहीं है। 

क्या उचित है ,क्या नहीं ,ये तो अब निर्णय उनका अपना रहा होगा किन्तु उसके पश्चात वो कभी स्कूल में दिखलाई नहीं दी। 

 अध्यापिकाओं में यह चर्चा हुई थी, कि अवश्य ही इन लोगों के मध्य कुछ तो हुआ था, अंदाज़ा और अटकलें सभी लगा रहे थे, किंतु कोई भी बातों को, जबान पर लाना नहीं चाहता था।

जब चार दिनों तक शिल्पा जी नहीं आईं ,न ही कोई सूचना भेजी ,तब दबी आवाज में ,उन्होंने  चतुर से पूछा - सर ! शिल्पा मैम ,नहीं आ रहीं हैं, क्या कारण हो सकता है ?

मुझे तो उन्होंने कुछ नहीं बताया ,न ही कोई सूचना दी ,क्या ये एक ज़िम्मेदार अध्यापिका का कार्य है ? हो सकता है ,अब उन्हें नौकरी ही नहीं करनी होगी। 

सर !किसी को तो पता लगाना ही होगा। कहीं वो बीमार तो नहीं हो गयीं। 

क्या आवश्यकता है ? यहाँ सब अपनी इच्छा से आते हैं ,अपनी इच्छा से चले जाते हैं। वो पढ़ी -लिखीं है ,क्या इतनी बात भी नहीं जानतीं ? जाने से पहले सूचना दी जाती है ,यदि ऐसी कोई बात थी ,तो फोन पर बता सकती थीं। 

तब उनका कार्य कौन संभालेगा ? उस समय उस कक्ष में आठ अध्यापिकाएं खड़ीं थीं ,सभी को लगता था ,शिल्पा जी के जाने के पश्चात, वही उनके कार्यभार को संभाल सकती है। अब किसी को भी शिल्पा जी के जाने का अफ़सोस नहीं हो रहा था।

अब चतुर का अगला शिकार कौन होगा ? क्या शिल्पा दुबारा आएगी ? क्या चतुर आगे भी इसी तरह सफल रहेगा ? क्या शिल्पा अपने ग़म से उबर पायेगी ,या प्रवीण को सम्पूर्ण सच्चाई बताकर मन को हल्का करेगी ?सभी प्रश्नों के जबाब आगे मिलेंगे। पढ़ते रहिये -रसिया ! 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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