Shaitani sa.....19

केतकी, जब श्याम से मिलकर घर पहुंची ,उसकी हालत ऐसी थी ,वो स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी कि उसके साथ क्या हो रहा है ? श्याम से मिलने की प्रसन्नता अंदर ही अंदर उसे न जाने कैसी अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी ? मन में उससे मिलने की खुशी भी थी और अंदर ही अंदर न जाने कौन सा अनजाना भय  सता रहा था ? उसकी बेचैनी छुपाए नहीं छुप रही थी। रह -रहकर उसके कपोल उष्ण और रक्ताभ हो जाते ,उसको देखकर उसकी मम्मी ने सोचा - शायद इसकी तबीयत ठीक नहीं है किंतु जब उसका माथा छुआ तो बुखार नहीं था। 


 केतकी अपने कमरे में बैठी, श्याम के विषय में सोच रही थी। कल उससे मिलना होगा, मैं कल ,उससे कैसे मिलूँगी ? उसके तन में जैसे सनसनाहट सी दौड़ गयी। आज तो मैं ,उसके समीप आने से बच गई ,किसी ने देखा भी नहीं, अकेले में अगर मिलेगा और उसने, मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया तो.... यह सोचकर ही उसकी घबराहट बढ़ने लगी और मन में अजीब सी गुदगुदी होने लगी ,उसकी सांसें गर्म होने लगीं। 

 उसे समझ नहीं आ रहा था, कि यह सब उसके साथ क्यों हो रहा है ?लेकिन जो भी हो रहा है ,अच्छा लग रहा है। साथ ही यह डर भी था कि उससे मिलते हुए कोई मुझे देख न ले। सही अर्थों में देखा जाए तो चलचित्रों  की तरह ही कहीं मुझे प्यार तो नहीं हो गया। ऐसा भी कहीं होता है, अपने आप को ही समझाया किंतु मैं उससे मिलना क्यों चाहती हूं ?उससे मिलना मुझे अच्छा क्यों लग रहा है ? अभी वह यह सब सोच और पलंग पर लेटी करवटें  बदल रही थी। 

तभी उसके छोटे भाई ने उसे आवाज लगाई -केतकी ! कहां गई ? 

वो घबराकर बाहर की तरफ दौड़ी ,और भाई से पूछा -जी भैया ! क्या हुआ ?

तुझे, मम्मी नीचे बुला रही हैं  ? अच्छा ,अभी जाती हूँ ,कहकर उसने अपनी चप्पल पहनी और नीचे उतरते हुए सोचने लगी न जाने क्या हुआ है ,क्यों बुलाया है ? उन खुशियों भरे सपनों से बाहर नहीं आना चाहती थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे परीलोक से बाहर धरातल पर आ गयी है। उस धरातल का कठोर स्पर्श उसे वो सुकून नहीं दे पा रहा है। 

क्या हुआ ?मम्मी मुझे क्यों बुलाया है ?

क्या सो रही थी ?

नहीं तो... 

तब क्या कोई जरूरी काम कर रही थी ?

नहीं ,तो फिर इस तरह क्यों झुंझला रही है ? जैसे मैंने ,तुझे किसी आवश्यक कार्य करते हुए बुला लिया हो। 

उनकी बात सुनकर ,उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और बोली -वो तभी मेरी आँख लगी थी ,अचानक भाई की आवाज सुनकर ड़र गयी, इसीलिए पूछा। 

अच्छा ,अब आ ही गयी है ,तो जरा मेरी काम में मदद कर दे ! तेरे पापा घर आने वाले हैं और अभी तक भोजन तैयार  नहीं हुआ , तू इधर बैठकर थोड़ी सी सब्जी काट दे !

 अच्छा, मैं अभी करती हूं ,उसने किसी आज्ञाकारी बेटी की तरह काम करना शुरू कर दिया। 

मां देख रही थी, वैसे तो यह कार्य करती थी ,किन्तु आज तक तो इसने ,इस तरह आज्ञाकारी बच्चों की तरह, और इतनी तन्मयता से कार्य नहीं किया। बड़ी फुर्ती से काम कर रही थी ,पहले कुछ न कुछ बोलती ही रहती थी। आज तो यह चुपचाप अपने काम में जुटी हुई है ,देखने से लग रहा था कि उसका ध्यान कहीं और है और वह निर्लिप्त भाव से कार्य  करने में जुटी  हुई है। तब चिंतामणि ने पूछा- क्या कुछ बात  है ?

लेकिन केतकी ने नहीं सुना ,तब माँ अपनी आवाज तेज की और पूछा -केतकी ! आज क्या कुछ हुआ  है ?

अचानक मां के तेज स्वर को सुनकर वह घबरा गई और बोली -नहीं तो ,आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं? ठीक से तो काम कर रही हूं .

ठीक से काम कर रही होती तो मुझे कहना नहीं पड़ता ,अच्छा सुन ! कल तेरी भाभी -भइया आ रहे हैं।

क्या ?? कल भाभी -भइया आ रहे हैं ? प्रसन्न होते हुए  केतकी ने शब्द दोहराये। 

तभी  तो कह रही हूँ  घर को थोड़ा ठीक -ठाक  कर लेना ,तेरी भाभी पहली बार यहाँ आकर रहेगी ,उसको ऐसा नहीं लगना चाहिए, कि ये उसकी ससुराल है। 

ससुराल है तो ससुराल ही लगेगी ,अब तो भाभी ही, घर को संभालेंगी। 

क्यों ?जब वो यहाँ नहीं थी ,तब भी तो हम माँ -बेटी काम  करती थी न... अब भी  ऐसे ही काम करना है। चिंतामणि ने बेटी को समझाया। 

चलो ! घर में रौनक हो जाएगी ,कुछ देर के लिए केतकी ,श्याम को भूल गयी थी क्योंकि घर की साफ -सफाई के लिए उसने चमेली को बुला लिया था। अभी घर पूरा पक्का नहीं था ,इसीलिए उसकी लिपाई के  चमेली से कह  आई थी। शाम को आकर अपना काम पूरा कर जाना। 

रात्रि में थककर जब केतकी बिस्तर पर लेटी ,ऊपर सितारों को देख ,उसे श्याम की याद हो आई ,वो भी अपने घर की छत पर लेटा, इन तारों को देख रहा होगा,नहीं गिन रहा होगा ,सोचकर मुस्कुराई। कल तो भाभी आ जाएगी , उनसे पता चल जायेगा ,ये कहाँ रहता है ? किस परिवार से है ? भाभी से ही कह दूंगी -वो ही हमारे मिलने की जुगत लगाएंगी। 

अगले दिन केतकी, घर के कामों में सुबह से ही व्यस्त हो गयी थी ,तभी उसे  स्मरण हुआ आज तो श्याम से मिलना है। उससे मिलने शाम को जाउंगी ,किन्तु मन फिर से बेचैन हो उठा। एक बार उसकी एक झलक मिल जाती। ऐसा भी नहीं ,जो मेरी गली से होकर ही गुजर जाता। उस दिन तो कैसे मेरे घर का पता पूछ रहा था ? किन्तु आज तक इधर नहीं आया। विचारों का सिलसिला आता चला गया ,उन्होंने एक जाल सा बुन दिया। तब केतकी ने मन बनाया ,एक बार खेतों की तरफ ही जाकर देखूंगी ,वो कहाँ है ?

तभी नीचे कुछ लोगों के स्वर उसे सुनाई दिए ,शायद भाभी -भइया आ गए ,यह सोचकर वो नीचे की तरफ दौड़ी। नीचे पहुंचकर खुश होते हुए बोली -भइया ! आप आ गए ,कहकर उनके गले लगी। 

भाभी घूंघट में थी ,उसने चिंतामणि के पैर छुए और वो धीरे -धीरे कदमों से चलते हुए ,एक कमरे की तरफ बढ़ने लगी। 

और कैसी है ? भइया ने ,केतकी से  पूछा। 

ठीक हूँ ,भइया ! मुस्कुराते हुए केतकी बोली। 

तू तो काफी बड़ी हो गयी है ,इतनी जल्दी बढ़ रही है। 

और क्या ?एक -दो बरस में ताड़ की तरह हो गयी ,अपनी दोनों बहनों से लम्बी जा रही है ,सोच रही हूँ ,अब इसके लिए भी लड़का देखना शुरू कर देना चाहिए। कहते हुए ,माँ ने केतकी को भाई को देने के लिए दूध का गिलास पकड़ा दिया। चिंतामणि को फ़िक्र थी ,पता नहीं ,इसे शहर में दूध मिलता भी होगा ,या  फिर चाय ही पीता होगा ,इसीलिए उसने पहले ही दूध उबालकर रख लिया था। मलाईदार दूध बेटे को तैयार करके दिया। 

हाँ ,सही कह रही हो ,भइया ने दूध का गिलास हाथ में लिया और एक ही साँस में गटागट पी गया। तब केतकी भाभी को भी दूध का गिलास लेकर अंदर गयी। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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