Mera pahala ghar

एक जीवात्मा, जब जन्म लेने के लिए उत्सुक होती है, तब उसकी मां की कोख़ ही, उसका सबसे पहला घर  होती है और तब वह जीव इस संसार में आता है। किन्तु जिस घर में उसकी आँखें खुलती हैं ,अपने लोगों से, रिश्तों से परिचय होता है। वह उसका पहला सांसारिक घर होता है ,किंतु यह तन की सीमाओं में बंध  जाता है और उसे वही घर अपना लगता है। जहां उसने अपनी आंखें खोली, जहां उसका बचपन बीता। क्या यही उसका पहला अपना पहला घर है ?जो उसके माता-पिता या दादा- दादी ने अपने परिश्रम से बनाया है।

 अब प्रश्न यह उठता है। इंसान का पहला घर कौन सा होता है ? जो उसने अपने परिश्रम से बनाया है या फिर माता-पिता का वो घर ,जहां उसने अपनी आंखें खोली हैं। यह तो समझ -समझ का फेर है ,जब बहु ससुराल आती है ,उसके भी कुछ सपने होते हैं और जब उसका पति उसके लिए घर बनवाकर देता है ,या फिर अपने सपनों को साकार रूप देता है ,जो उसके परिश्रम से बना ,उसके जीवन का अपना पहला घर... वह उसका पहला घर होता है। वो घर जहाँ हम अपनापन और सुरक्षा महसूस करते हैं। 


कुछ लोग अपना घर उसे मानते हैं ,जहां उनके सपने बसते हैं ,अपनी इच्छानुसार उसे सजाते -संवारते हैं। किन्तु कुछ लोग ,जिनको जहाँ ख़ुशी मिले, वहीं बस जाते हैं और अपने परिवार के साथ वहीं रमण करने लगते हैं। ये सब भाव मानव की मनःस्थिति पर निर्भर करता है। 

जब कभी हम कहीं घूमने जाते हैं ,जब किसी भी व्यक्ति का मन प्रसन्न होता है ,तो कह उठता है -''मन करता है ,यहीं बस जाऊँ ''किन्तु ये भाव क्षणिक होता है। दुनिया के किसी भी कोने में घूम लो ! किन्तु तन की थकान तो अपने घर आकर ही उतरती है। अपना घर ,जहाँ सुरक्षा है ,अपना परिवार है ,रिश्ते हैं ,किन्तु जब इन रिश्तों में तनाव बढ़ जाता है। तब उसी घर में घुटन होने लगती है। वो उस घर से दूर जाना चाहता है। जहाँ उसे दो पल का सुकून ओ शांति मिले। देखा जाये तो ये धरा, इतनी बड़ी है ,ये सम्पूर्ण धरा ही अपना घर है जहाँ भांति -भांति के लोग रहते हैं। जहाँ के लोगों में प्रेम ,सम्मान और विश्वास हो ,वहीं इंसान रहने लगता है। 

नौकरी के चलते ,लोग जगह -जगह ,अलग -अलग स्थानों पर जाने लगते हैं और वहाँ जो जगह मिलती है वहीं के होकर रह जाते हैं। तब मन में ऐसा कोई भाव ही नहीं आता ,''मेरा घर ''जहाँ सुख -दुख के साथी मिलें ,हम विचार ,हम कदम लोग मिल जाते हैं। वहीं 'अपना घर 'हो जाता है। 

तब भी वो घर कभी भुलाये नहीं भूलता ,जहाँ अपना बचपन खेला हो ,छोटी -छोटी बातों को लेकर बहन -भाइयों में  झगड़ा होता था। माता -पिता की स्नेह भरी डांट -फटकार,हमारे जीवन को लेकर उसके पनपते सपने ,वो घर जहाँ दादा -दादी की बाँहों का झूला ,झूला था ,वो बचपन जो सुकून से माँ के आंचल सोता था। उम्र और उन्नति के चलते घर तो बनते हैं ,जहाँ हमारे बचपन के सपने पलते हैं। उस घर में रहकर आज हम अपने उस ''पहले घर को'' कभी तन्हाइयों में टटोलते हैं।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post