Hamara ghar

रत्ना, जब से अपनी ससुराल में विवाह करके आई है, वहां उसे हर सुख -सुविधा मिली है किंतु फिर भी उसे एक परेशानी है ,जो रह-रह कर उसे सताती रहती है -''मेरा घर '' जब से इस घर में ब्याह कर आई है, परिवार के सभी लोग, उससे अच्छा व्यवहार करते हैं ,प्यार के साथ रहते हैं। यहां रहकर  उसके दो बच्चे भी हो गए। किंतु अक्सर वह अपने पति से कहती रहती - काश ! कि कभी हमारा अपना भी घर होगा। 

उसका पति मुस्कुरा कर कह देता -' तुम्हें यहां क्या किस बात की कमी है ? क्या यह घर तुम्हारा नहीं है ?यह तुम्हारी ससुराल है, फिर तुम इसे अपना घर क्यों नहीं समझती हो ? 


कहने को तो यह' मेरा अपना घर' है किंतु मैं इस घर को अपने तरीके से न ही सजा -संवार सकती हूं ,न ही अपने तरीक़े जी सकती हूं। मेरा एक बड़ा सा घर लेने का सपना है, जिसे मैं बड़े प्रेम से आधुनिक तरीके से सजाना चाहती हूं। शायद ,आप भूल रहे हैं ,यह हमारा घर नहीं है ,यह मम्मी -पापा का घर है। इसमें उनके सपने बसते हैं ,उन्होंने इसे अपने तरीके से सजाया है और मैं अपने घर को अपने तरीके से सजाना चाहती हूं।

 रत्ना की बातें कभी-कभी विक्रम को समझ नहीं आतीं , वह सोचता था -इस घर में दादा- दादी रहे ,बहनें  रहीं, बड़े भाई तो विदेश चले गए और अब हम रह रहे हैं। पता नहीं ,यह अपना घर कैसा चाहती है ?तब उसने रत्ना  से कहा-  तुम इस घर को भी, चाहो तो अपने तरीके से सजा सँवार सकती हो। कुछ अच्छा करोगी तो... मम्मी पापा तुम्हें रोकेंगे नहीं, उन्हें तो और अच्छा लगेगा, कि तुम इस घर में कुछ नया , बदलाव ला रही हो, अच्छा कर रही हो। 

नहीं, मुझे अपना ही घर चाहिए ,जिसे मैं कह सकूं ''यह मेरा अपना घर है।'' 

समय बीतता गया, विक्रम नौकरी करता था अच्छे पैसे कमा रहा था। तब उसने सोचा -क्यों न छोटा सा ही घर ले लूं ,कम से कम पत्नी की ख्वाहिश और उसका सपना ही पूरा हो जाएगा। यह सोचकर उसने शहर में एक छोटा सा घर ले लिया। सोच रहा था, जब बच्चे बड़े हो जाएंगे, तो बच्चों के काम भी आ जाएगा।

 एक दिन यह खुशखबरी उसने अपनी पत्नी रत्ना को सुनाई ,तो वह खुशी से उछल पड़ी और उसके मुख से निकला'' मेरा अपना घर,'' जब मायके में रहती थी, तो मम्मी अपने तरीके से उस घर को सजाती थीं। उन्हें देखकर मुझे भी लगता था कभी 'मेरा अपना घर 'भी होगा। 

वह उस घर को देखने गई, और बोली -यह मेरी जिंदगी का सपना था, और यह मेरा अपना पहला घर है, जहां मैं अब सुकून से रह सकती हूं।

 विक्रम बोला -तुम यहां रहोगी तो उस घर में कौन रहेगा ?

वह तो मम्मी -पापा का है।

 मम्मी- पापा क्या गैर  हैं, वो भी तो हमारे अपने ही हैं। 

मुंह बनाते हुए रत्ना  बोली -जब तुम्हें ऐसा ही कहना था और हमें उन्हीं के साथ रहना था, तो फिर इस घर को लेने की क्या आवश्यकता थी ? रत्ना की जिद के सामने, विक्रम झुक गया और बोला -अबकी बार गर्मी की छुट्टियों में, हम यहीं आकर रहेंगे और मम्मी -पापा से कह देंगे ,''कि घूमने जा रहे हैं। ''

इस बात पर रत्ना राजी हो गई और गर्मी की छुट्टियों की प्रतीक्षा करने लगी , बच्चे भी उस नए घर में आ गए माता-पिता को लगा ,कि सभी घूमने गए हैं।

 अपनी इच्छाओं -अपेक्षाओं के लिए इंसान कभी-कभी कितना स्वार्थी हो जाता है ? दूसरे की खुशी और इच्छाओं का उसे भान ही नहीं रहता। ऐसा ही कुछ रत्ना के साथ भी हो रहा था। रत्ना  यहां पर आ तो गई थी अब उसे अपने सास - ससुर और परिवार की कोई चिंता नहीं थी क्योंकि उसका पति और उसके बच्चे उसके साथ थे ,उसके लिए तो उसका यही परिवार था।

 जिद करके रत्ना ने, बच्चों का दाखिला भी वहीं  करवा दिया। वो वापस उस घर में जाना नहीं चाहती थी।  घर वालों से कह दिया,'' कि अब बच्चों की पढ़ाई ज्यादा है, बड़ी क्लास है ,अब बच्चे कॉलेज में जाएंगे तो इसलिए वहीं पर रहना होगा।''

 माता-पिता ने संतोष कर लिया ,जिसमें बच्चों की खुशी है। उनकी खुशी में ही माता-पिता की खुशी होती है। 

वह इतना छोटा गांव भी नहीं था, वहां के लोगों से ,उनका अच्छा मेलजोल था इसलिए माता-पिता को कोई परेशानी नहीं हुई ,लेकिन उन लोगों ने और विक्रम ने यह महसूस किया -'कि एक बार भी रत्ना ने, मम्मी -पापा को, अपने साथ चलने के लिए नहीं कहा। ''ये बात उसने रत्ना से भी कही ,अब तक हम मम्मी -पापा से घर में रह रहे थे ,उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा ,उनके लिए तो वो 'घर हमारा है।''किन्तु तुम्हारी सोच कितनी छोटी है ? तुमने एक बार भी उनसे अपने साथ चलने के लिए नहीं कहा।'' 

किन्तु उसके मम्मी -पापा ने कहा  -अब वो बहुत खुश हैं, लगता है, हम उसे ठीक से समझा नहीं पाए, शायद वह अपने दिल की बात हमें बता नहीं पाई और इतने दिनों के पश्चात भी, इस परिवार को अपना नहीं पाई। उसे भी, खुश रहने का अधिकार है ,यदि वो हमसे अलग रहकर खुश है ,तब हम उसकी ख़ुशी में बाधा नहीं डालना चाहेंगे। 

 दो -तीन वर्षों में बच्चों की कॉलेज की पढ़ाई समाप्त हुई और वो  नौकरी की तलाश में निकल पड़े दोनों बच्चों की नौकरी अलग-अलग जगह पर लग गई और बेटी का विवाह भी हो गया। अब गांव में माता-पिता भी नहीं रहे थे, और एक दिन अचानक एक दुर्घटना में विक्रम जी भी नहीं रहे।

 अब रत्ना अकेली रह गई थी, जिस घर को ,उसने अपने सपनों का महल बनाया था। आज उस सपनों के  घर में, उससे कोई बात करने वाला भी नहीं था। यदि बीमार हो जाए तो कोई पूछने वाला नहीं था क्योंकि यहां तो शहर में आस- पड़ोस में क्या हो रहा है ?कोई पूछना ही नहीं चाहता ,न ही जानना चाहता है क्योंकि कोई पूछ भी ले, तो सब गलत ही अर्थ निकाल लेते हैं कि न जाने इसका क्या लालच होगा ?अधिकतर होता भी यही है ,हर कोई घात लगाए बैठा है। 

रत्ना की उम्र बढ़ती जा रही थी, अकेलेपन से कभी-कभी उसे घबराहट भी होती ,तब वह बच्चों से कहने लगी कि मुझे भी अपने साथ ले चलो ! लेकिन बच्चों ने काम आय में और बड़े शहरों में जाकर नौकरी करने का बहाना बनाया-  इतनी कम कमाई में हम आपको नहीं संभाल पाएंगे। हम नौकरी करेंगे या आपका ख़्याल रखेंगे। देखा जाए तो,अपनी जगह उनकी बात भी सही थी किंतु अब इस घर में रत्ना का मन नहीं लग रहा था।

 मन में अंदर ही अंदर घुटन होने लगती थी। कभी-कभी अकेलेपन से घबरा उठती। तब उसे एहसास हुआ कि किस तरह उसके सास -ससुर अकेले रह गए थे ,उन्हें भी ऐसा ही महसूस होता होगा। सास -ससुर का स्मरण होते ही, उसे अपना वह घर भी स्मरण हो आया और एक दिन इस घर को ताला लगाकर, वह अपने सास -ससुर वाले बड़े घर में पहुंच गई। वहां जाकर देखा तो, वहां भी ताला लगा हुआ था।

 घर वही होता है, जहां लोग बसते हैं वरना वह खंडहर और वीरान बन जाता है। तब रत्ना के मन में एक विचार आया और उसने उस घर की साफ सफाई करवाई। 

 तब उसे एहसास हुआ कि एक उम्र ऐसी आती है जब इंसान कहीं इधर-उधर भी नहीं जा सकता और अपनों के लिए तरसता है ,अपनों का साथ पाना चाहता है। अकेलेपन से डरता है। तब उसने ऐसे लोगों के लिए, उस घर को चुना और तब रत्ना ने अपने सास -ससुर की याद में उस घर का नाम रखा ''हमारा घर '' वह घर अब बस गया था। जहां पर अकेलेपन से घबराये ,अपनों के लिए तरसते बुजुर्ग आते थे। उनका यही 'अंतिम बसेरा' था।  अब उनका यही घर बन गया था और यहीं पर रहकर रत्ना भी ,उन लोगों के साथ, अपना अकेलापन बांट रही थी । 

तब उसे एहसास हुआ ,घर कितने भी बन जाएं, किंतु बिना लोगों के घर-घर नहीं होता, घर वही है ,जहां उसे सुरक्षा,और अपनापन महसूस हो।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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