मोहिनी को, उस अजनबी नक़ाबपोश ने बताया था ,इस मानचित्र पर जो लाल बिंदु दिख रहे हैं ,वो जीवित व्यक्तियों के हैं और ये जो सफ़ेद बिंदु है...ढोंऽऽऽग...! तभी घंटी के तेज स्वर से सम्पूर्ण कक्ष गूंज उठा।
उस विशाल 'गोल कक्ष' में गूँजती घंटी की आवाज़ धीरे-धीरे शांत हुई, लेकिन उसका कंपन अभी भी, दीवारों में महसूस हो रहा था।
मोहिनी की नज़र अभी भी उस सफेद बिंदु पर टिकी हुई थी ,जो लाल बिंदुओं से बिल्कुल अलग था। न ही वह रुक रहा था...न ही उसकी दिशा बदल रही थी।वह सीधे उसी 'गोल कक्ष 'की ओर बढ़ रहा था। मोहिनी ने धीमे स्वर में उस नकाबपोश से पूछा -"तुमने कहा था 'कि लाल बिंदु ज़िंदा लोगों के होते हैं...तो सफेद बिंदु किसका है?"
उसके मन में आशंका थी ,जो वो समझ रही थी ,क्या वो सही हो सकता है ? इसकी पुष्टि चाहती थी।
काले वस्त्रों वाला वो अजनबी कुछ क्षण तक चुप रहा ,उस नक़ाब के पीछे भी, उसकी आँखों को पढ़ा जा सकता था ,उसकी आँखों में मोहिनी को पहली बार घबराहट स्पष्ट दिखलाई दे रही थी। तब वो बहुत ही धीमी आवाज़ में बोला -"इस सवाल का जवाब अगर अभी मिल गया..तो तुम्हारे बाकी सभी सवाल बेकार हो जाएँगे।"
मोहिनी ने एक गहरी साँस ली और उकताते हुए बोली -"तुम भी सबकी तरह आधी बातें क्यों करते हो?"
उसकी बात सुनकर अजनबी मुस्कुराया नहीं, इस बार उसकी आवाज़ गंभीर थी ,"क्योंकि अधूरा सच..."कई बार पूरी ज़िंदगी बचा लेता है।"
उधर...तीसरी सुरंग में...रत्न प्रताप झुककर ज़मीन पर फैले ,चाँदी के महीन तारों को ध्यान से देख रहे थे ,ताकि इनसे बचकर आगे जाया जा सके।
भानु अधीर होकर बोला -अब मुझसे और प्रतीक्षा नहीं होती "इन्हें काट देते हैं।"
"नहीं! रत्न प्रताप ने कड़े शब्दों से उसे तुरंत रोक दिया।"अगर एक भी तार टूटा...""...तो पूरी सुरंग की छत गिर सकती है, उन्होंने चेतावनी दी।
तब तक विक्रम भी पास आ गए थे ,उन्होंने मशाल की रोशनी में दीवार पर बने पुराने चिन्ह देखे।तीन त्रिकोण...उनके बीच एक वृत्त...और सबसे ऊपर उकेरी गई एक आँख ,उन्हें देखकर विक्रम ने धीरे से कहा -"यह सुरक्षा जाल नहीं है"...यह चेतावनी है।"
भानु ने उनकी ओर देखा ,"मतलब?"
विक्रम ने दीवार पर उँगली फिराते हुए कहा -"जिसने भी यह रास्ता बनाया है ,वह यही चाहता था कि केवल सही व्यक्ति ही आगे जा पाए।"
रत्न प्रताप ने पहली बार सहमति में सिर हिलाया और अपने शब्द जोड़ दिए "और गलत व्यक्ति"...यहीं दफ़्न हो जाए ,उन्होंने वाक्य पूर्ण किया।
उधर...गोल कक्ष में रखा पीतल का दीपक अचानक फिर से तेज़ जलने लगा।उसकी लौ सामान्य पीली नहीं...बल्कि हल्की नीली हो गई।दीवारों पर बने सभी स्तंभ चमकने लगे।आठों स्तंभों पर उकेरे गए नामों में से सात अब भी धुँधले थे...लेकिन आठवाँ नाम पहले से अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा। मोहिनी आगे बढ़ी,उसने ध्यान से देखा ,इतना चमकने के बावज़ूद भी ,वह नाम अभी भी पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सकता था।
बस अंतिम तीन अक्षर साफ़ दिखाई दे रहे थे—"...व्रत"उसी समय...दीपक की लौ एकदम ऊँची उठी और उसके सामने की हवा में कुछ आकृतियाँ बनने लगीं। मोहिनी घबरा गई ,उसके मुख से निकला -"ये क्या है?"
अजनबी ने धीरे से उसे चेताया -"पीछे हटो !"
"क्यों?"
"क्योंकि"...यह कमरा यादें दिखाता है।"
कुछ ही क्षणों में धुएँ जैसी धुंध ने एक दृश्य का रूप ले लिया ,जैसे कोई पुरानी घटना फिर से जीवित हो रही हो।
मोहिनी ने देखा—यही गोल कक्ष...यही आठ स्तंभ...लेकिन वे सभी नए थे।बीच में आठ लोग खड़े थे।उनमें से तीन के चेहरे धुंधले थे।बाकी पाँच ने काले चोगे पहन रखे थे।उनमें से एक ने कहा—"अगर आठवाँ उत्तराधिकारी समय से पहले मिला..तो ये हवेली नष्ट हो जाएगी।"**
दूसरी आवाज़ आई -"और अगर उसे छिपाया गया...तो पूरा वंश टूट जाएगा।"**
तीसरी आवाज़..जो सबसे भारी थी...धीरे से बोली—फैसला आज नहीं..पच्चीस साल बाद होगा।"**दृश्य अचानक धुँधला हो गया।
मोहिनी ने घबराकर पूछा -"ये लोग कौन थे?"
अजनबी ने उत्तर दिया,"जिन्होंने इस हवेली की सबसे बड़ी गलती की थी।"
"कौन-सी गलती?"
"यही कि ...वह कुछ कहने ही वाला था ,तभी ..
धप्प! ऊपर कहीं भारी पत्थर गिरने की आवाज़ आई ,अजनबी तुरंत सतर्क हो गया।वह नक्शे की ओर भागा। लाल बिंदु अब पहले से बहुत पास आ चुका था लेकिन...एक और बात बदल चुकी थी। सफेद बिंदु अब रुक गया था।ठीक उस जगह...जहाँ नक्शे में कोई रास्ता दिखाई ही नहीं देता था।
अजनबी हैरानी से फुसफुसाया -"नहीं.."यह संभव नहीं है ।"
मोहिनी ने पूछा -"क्या हुआ?"
उसने काँपती उँगली से नक्शे की ओर इशारा किया -"वह..दीवारों के अंदर चल रहा है।"
उधर...भानु अभी भी ,चाँदी के तारों के सामने खड़ा था ,उसने पूरा रास्ता ध्यान से देखा ,फिर अचानक उसकी नज़र दाईं दीवार पर पड़ी।वहाँ पत्थर का एक छोटा-सा टुकड़ा बाकी दीवार से थोड़ा बाहर निकला हुआ था।भानु ने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया ही था।
तभी रत्न प्रताप राजवीर चिल्लाए—भानु उसे मत—"
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी ,टक! पत्थर अंदर दब गया।एक पल के लिए सब शांत हो गया ,फिर...ज़मीन पर फैले ,सभी चाँदी के तार धीरे-धीरे नीचे धँसने लगे। कुछ ही सेकंड में पूरा जाल गायब हो गया।रास्ता पूरी तरह साफ़ था।
विक्रम और रत्न प्रताप दोनों आश्चर्य से, भानु को देखने लगे।भानु खुद भी ,समझ नहीं पा रहा था कि उसने सही पत्थर कैसे पहचान लिया ? यह मात्र उसका अंदाजा था ,यह उसने मन ही मन स्वीकार किया।
रत्न प्रताप ने बहुत धीमे स्वर में कहा—"यह मात्र संयोग नहीं हो सकता..."
विक्रम ने उनकी ओर देखा -"तुम क्या कहना चाहते हो?"
रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया ,लेकिन उनके मन में वर्षों पुरानी एक बात गूँज रही थी—
"सिर्फ़ वही व्यक्ति इस मार्ग का पहला द्वार खोल पाएगा... जिसे रास्ता स्वयं स्वीकार करेगा।"
उसी समय...गोल कक्ष में खड़ी मोहिनी को अचानक अपने गले के पीछे तेज़ जलन महसूस हुई।वह दर्द से कराह उठी ,उसने अपना हाथ पीछे गर्दन पर रखा।उसकी उँगलियाँ किसी उभरी हुई आकृति से टकराईं।जैसे त्वचा पर कोई पुराना निशान उभर आया हो।
जब अजनबी ने यह सब देखा तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया,एकाएक उसके मुख से निकला -"नहीं.."इतनी जल्दी नहीं..."
मोहिनी ने घबराकर पूछा -"तुम्हें क्या हुआ है ?"
अजनबी कुछ बोल पाता...उससे पहले गोल कक्ष के बाहर से किसी की आवाज़ गूँजी—मोहिनी ! यह भानु की आवाज़ थी।
मोहिनी प्रसन्नता से उछल पड़ी ,आखिर उसने मुझे ढूँढ ही निकाला ,उसकी आँखों में उम्मीद लौट आई और खुश होते हुए बोली - भानु !"वह दौड़कर बाहर जाने लगी ,लेकिन तभी फुर्ती से उस अजनबी ने उसका हाथ पकड़ लिया -"रुको!"
क्या वह सचमुच भानु है ?..या कोई उसकी आवाज़ में तुम्हें बुला रहा है ,यह जाने बिना एक कदम भी बाहर मत रखना,उसने चेतावनी दी।
उसी क्षण...बाहर से फिर वही आवाज़ आई—मोहिनी !... मैं तुम्हें लेने आया हूँ ,लेकिन इस बार...उस आवाज़ में एक ऐसी ठंडी मुस्कान छिपी हुई थी...जो भानु की कभी नहीं हो सकती थी।
