दीदी !किसका फोन था ?
बहु का फोन था।
क्या कह रही थी ?
पूछ रही थी , मम्मी कब आ रहीं हैं ?कहते हुए उन्होंने फोन अपने बिस्तर पर लापरवाही से फ़ेंक दिया।
दीदी ! आप इतने दिनों से आईं हुईं हैं और अचानक ही आ गयीं ,बुरा मत मानना किन्तु मुझे लगता है ,कुछ बात तो है ,जो आप इस तरह अचानक आ गयीं। आपको तो अपने परिवार के सिवा कहीं जाना अच्छा ही नहीं लगता था। कुछ तो हुआ है ,जो आप बताना नहीं चाहतीं।
होना क्या है ? ''वही सास -बहु के बीच की खाई जो बरसों से चली आ रही है ,जो कितना भी भरना चाहो !भरती नहीं। ''
क्या, बहु ने कुछ कहा ?
नहीं ,आजकल बहुएं कुछ कहतीं ही नहीं ,बस वो व्यवहार ऐसा कर देतीं हैं कि रहना मुश्किल हो जाता है। आजकल की बहुएं पढ़ी -लिखीं हैं ,वो कहेंगी कुछ नहीं किन्तु पल -पल एहसास करा देतीं हैं। हम उनके टुकड़ों पर पल रहे हैं। मैंने तो सोचा था ,हमारी सास कठोर थीं किन्तु मेरा तो एक ही बेटा है ,दोनों सास -बहु प्रेम से जीवनयापन करेंगी ,किन्तु इस रिश्ते की खाई कभी नहीं भरेगी। मैंने उसे 'बेटी 'माना किन्तु उसने तो मुझे 'माँ 'नहीं समझा। मैं उसके काम को बाँट लेती थी किन्तु उसने कभी वो अपनापन नहीं दिखाया।
मुझे लगा ,अभी नई आई है। धीरे -धीरे सब ठीक हो जायेगा किन्तु अब तो उसका बेटा भी पाल दिया किन्तु उसकी नज़रों में कोई इज्ज़त नहीं। जैसे ये सब करना तो मेरा फ़र्ज था किन्तु उसका मेरे या परिवार के प्रति कोई फ़र्ज नहीं। नौकरी करके एहसान जताती है ,क्या वो पैसे मुझे देती है ? न ही मैंने आज तक उससे कोई पैसा माँगा। मुझे क्या जरूरत पड़ी है ?उनकी पेंशन आ जाती है। नहीं भी आती तो क्या इस उम्र में माता -पिता के प्रति बच्चों का कोई कर्त्तव्य नहीं बनता ?
क्या राहुल ने कुछ कहा ?
वो क्या कहेगा ? उसकी माँ सब संभाल रही है किन्तु हमारे उस काम का, उनकी नजरों में कोई महत्व नहीं।
अब क्या हुआ ?जो आप उनसे नाराज़ हैं ,बहु -बेटे ने कुछ नहीं कहा फिर बात क्या हुई ? तब उन्होंने सुमति और उसकी सहेलियों के मध्य हुई सम्पूर्ण बातें विस्तार से बता दीं।
अब तो बहु को अपनी गलती का एहसास है ,तभी तो बुला रही है।
नहीं ,उसे गलती का एहसास नहीं है ,उसे अब मेरी जरूरत महसूस हो रही है। उसे पता चल गया है कि मैं कितना काम करती थी ?
चलो !देर आये दुरुस्त आये !अब उसे एहसास तो हो गया। अब चली जाइये !
अब तो मेरे हाथ -पांव चल रहे हैं ,कल को मैं बीमार हो गयी ,तब कुछ नहीं संभाल पाई ,तब वो फिर से वही व्यवहार करेगी। जिस औरत का बच्चा मैंने पाल दिया ,उसकी नजरों में आज तक कोई सम्मान नहीं ,तो अब क्या करेगी ?
तब आपने क्या सोचा है ?
सोचना क्या है ?कल तीर्थ के लिए निकल जाऊंगी। वहीं किसी व्रद्धाश्रम में समय बिता दूंगी उन्होंने अपना निर्णय सुना दिया, क्योंकि ये बातें आज नहीं, कल तो होंगी। कहते हुए उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे ,हमने अपने सास -ससुर की मरते दम तक सेवा की ,जबकि हमारी सास कितनी कठोर थी ?किन्तु आजकल तो बच्चों के साथ रहना भी मुश्किल हो गया है।
उनकी बहन उनके दर्द को समझती थी ,जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण ज़िंदगी उस घर में बिता दी आज वो इस तरह घर को छोड़कर आईं हैं ,उनके लिए यह निर्णय बड़ा ही कठिन रहा होगा। तब वो बोली -दीदी !हम महिलाओं का जीवन ही ऐसा है ,''जहाँ जन्म लेते हैं ,वहां से हमारी जड़ें हटाकर दूसरी जगह रोप दिया जाता है। यहां वृक्ष बने ,जड़ें मजबूत हुईं तो यहां भी ज़बरन उखाड़ने का प्रयास रहता है। वो भी अपनों के ही द्वारा। एक न एक दिन जाना सबको है ,ये बात सभी जानते हैं किन्तु उनके अहंकार इतने बड़े हैं ,सच्चाई जानकर भी उसे अनदेखा कर जाते हैं। ये तो सभी के साथ होना है ,वो इंसान अपने को चाहे कितना भी अक़्लमंद समझ रहा हो ?''
अब आपकी इच्छा है। जब तक आप यहां रहना चाहें, यहां रहें ,जहाँ जाना चाहें ,वहां चली जाएँ ,मैं कुछ नहीं कहूंगी।
अब सुमति को लग रहा था ,सच में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है । अब क्या होगा ?वो तो आने से इंकार कर रहीं हैं। शाम को जब राहुल आया, तो उससे सारी बातें बताईं।
उसने कहा - तुमने ,मम्मी को फोन किया ,तो क्या उन्हें लगा नहीं होगा ,काम के लिए मेरी ज़रूरत महसूस हुई तो फोन लगा दिया। कल को वो बिमार हों गयीं तो क्या तुम उनकी सेवा कर पाओगी ? अब परिवार इतने बड़े नहीं रहे ,जो हैं ,वो रिश्ते तो इतने मजबूत हों ,कि सुख -दुःख में साथ खड़े हों सकें ।
अकेले मेरी ही गलती नहीं है ,तुम भी तो लापरवाह थे ,मम्मी ! तुमसे भी कुछ नहीं कहती थीं। यदि तुम्हें अपनी माँ की चिंता थी ,उनकी परवाह थी ,तो तुमको तो मैंने कभी कहते नहीं सुना -मम्मी !आप थक गयीं होंगी ,आराम कर लो ! तुम तो एक गिलास पानी भी मम्मी से मांगते ,तब मुझे भी लगा ,जब वे तुम्हारे लिए काम कर रहीं हैं ,मेरे लिए भी करेंगी ,तो क्या बुरा है ?अब तक तो कर ही रहीं थीं। अभी अचानक उन्हें न जाने क्या हो गया ?'' बेटा करे तो उसे कोई नहीं कहेगा ,यदि बहु करे ,तो उसे चार नसीहत देने आ जाते हैं। ''तुम तो अपनी मम्मी का ख़्याल रख सकते हो।
वो हमें परख रहीं थीं ,देखें इन्हें मेरी कितनी परवाह है ? हम दोनों ही फेल हो गए ,राहुल को भी अपनी गलती का एहसास हुआ।
दो दिनों के पश्चात ,सरस्वती जी अपने घर के आंगन में खड़ी थीं ,उन्हें देखकर उनका पोता दौड़कर उनसे लिपट गया। सुमति तो जैसे निराश ही हो चुकी थी किन्तु उन्हें देखकर उसके चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी और आज उसने उनके पैर नहीं छुए बल्कि किसी बच्चे की तरह उनसे लिपट गयी और बोली -मम्मी जी ! आप मुझे माफ़ कर दीजिये !बच्चों से तो गलती हो ही जाती है। तब उसने, उनके साथ खड़े राहुल की तरफ देखा।
जब सरस्वती जी अपने कमरे में चलीं गयीं ,तब राहुल ने बताया -मुझे मौसी का फोन आया था ,वे तीर्थ के लिए जा रहीं हैं ,कभी घर से बाहर नहीं निकली ,परिवार से दूर रहकर वो भी खुश नहीं हैं। हाँ, थोड़ी नाराजग़ी है। यदि तुम्हें अपनी माँ चाहिए तो ,दस बजे बस अड्डे पर पहुंच जाएँगी ,उन्हें लेने आ जाना। यह फोन मौसी ने मुझे मम्मी को बिना बताये किया था।
जब मैं दस बजे वहां पहुंचा तो मम्मी बेंच पर उदास बैठीं थीं ,मुझे सामने देखकर रो दीं ,जब मैंने उनसे कहा -मैं ,उन्हें लेने आया हूँ। थोड़ी नाराज़ रहीं किन्तु शीघ्र ही मान भी गयीं। आखिर ये उनका अपना घर है ,हम उनके अपने हैं ,कहाँ जाएँगी ?चार -पांच दिनों में ही देखो !कैसी कमज़ोर लग रहीं हैं ?अब उनका ख़्याल रखना ,फिर से इस घर को अपनाने में इन्हें थोड़ा समय तो लगेगा ,धीरे -धीरे सब ठीक हो जायेगा।
जब कोई अपना घर छोड़कर जा रहा है ,तो उसके दिल पर क्या बीती होगी ?मैं समझ सकता हूँ। सुमति ने भी प्रण लिया ,अब मैं भी जितना बन पड़ेगा ,मम्मी जी का सहारा बनूंगी। मोंटू तो दादी के पास कमरे में ही पहुंच गया।
