मेरी मां घर-घर काम करके ,हम बच्चों का पालन -पोषण करती थी। पिता तो न जाने शराब पीकर कहां पड़े रहते थे ? माँ ही, हम बच्चों के लिए सबकुछ थी और चाहती थी, कि हम बच्चे पढ़- लिख कर किसी योग्य बन जाएं ,अपने ''पैरों पर खड़े हो जाएँ'', ताकि उनकी तरह, हमें भी घर -घर काम न करना पड़े।
मैं सभी बहन -भाइयों में बड़ी थी, मैंने महसूस किया -'' समय के साथ-साथ माँ कमजोर होती जा रही है। उसके कपड़े भी कितने फट गए हैं ? उसके पास दो ही साड़ियां थीं , वह भी तीज -त्योहार पर किसी न किसी के घर से मिल जाती थीं , किंतु वो साड़ियां भी तो पुरानी होती थीं, इसलिए शीघ्र फट भी जाती थी। एक दिन भोजन करते समय,' माँ का आँचल' मेरे सिर पर गिरा,ऐसा लगा ,जैसे वो आशीष दे रहीं हों,मुझे बड़ी शांति महसूस हो रही थी। तभी मेरी नजर उस पल्ले के कई छेदों पर गयी, जो मेरी नजरों से छुप न सके, उसमें मेरी माँ के प्यार और उनके त्याग की महक थी।
अब तक मेरे पास दो सौ रूपये इकट्ठा हो गए। उस दिन मैं खुश थी ,मैंने माँ को उनके जन्मदिन पर उपहार के रूप में साड़ी देने के लिए बुलाया था। वो साड़ी मैंने ले भी ली क्योंकि एक दिन मैं अपनी माँ के साथ जा रही थी। तब माँ ने, उस साड़ी का दाम दुकानदार से पूछा था। मैं साड़ी लिए बैठी थी ,ताकि वो चौंक जाएँ। माँ को सामने से आते देख मैं प्रसन्न हो गयी ,वो सड़क पार कर ही रही थीं , तभी अचानक न जाने कहाँ से गाड़ी आकर उन्हें टक्कर मारकर भाग गयी।
