मेरी माँ कितनी सरल और खूबसूरत है ,' सादगी ही', उनकी सुंदरता है। उन्हें मुझसे बहुत सी उम्मीदें हैं। जहां तक मैं सोचती हूं, मां ने हमेशा मेरी भलाई के लिए ही सोचा है।
मेरी शिक्षा के पश्चात, मेरे विवाह की भी तैयारी शुरू कर दी। मेरे घर को बसे हुए, देखना चाहती थीं । उन्हीं दिनों मां ने,मेरे लिए एक खूबसूरत साड़ी खरीदी और वो साड़ी मुझे भी बहुत अच्छी लगी।
तब मैंने माँ से कहा -यह आपने अच्छा किया, अपने अपने लिए एक साड़ी ले ली।
किंतु मां का जवाब अलग ही था,वो बोलीं - यह साड़ी मैंने अपने लिए नहीं, तेरे लिए ली है। सोचा था ,तेरे विवाह पर तुझे एक खूबसूरत साड़ी दूंगी। गहने - जेवर तो अब बहुत महंगे हैं ,कम से कम अपनी तरफ से ये साड़ी तो दे ही सकती हूँ।
मैं, मां को समझती थी और मैं यह भी देख रही थी ,मां के साथ पास कई साल पुरानी, दो-चार साड़ियां ही हैं, जिन्हें अदल- बदल कर पहनती रहती है। उन्होंने अपने लिए नहीं सोचा, मेरे लिए ही सोचा।
मैंने, मां की इच्छाओं का मान रखते हुए, वह साड़ी उनसे ले ली। विवाह पर वही साड़ी पहनना चाहती थी,किन्तु ससुराल से आये कपड़े पहनने पड़ते हैं, इसीलिए वो साड़ी संभाल कर रख ली।
जब मैं अपनी ससुराल गई वह साड़ी मेरी ननद को बहुत पसंद आई और उसने, मुझसे वह साड़ी मांगी, किंतु मैं अपनी मां की, वह साड़ी अपनी ननद को देना नहीं चाहती थी। मेरी मां ने मेरे लिए, कितने अरमानों से खरीदी थी ?न जाने अपनी कितनी इच्छाओं को दबाया था ? तब एक -एक पैसा जोड़कर साड़ी को खरीदा था।
किंतु सास और पति के कहने पर मुझे वो साड़ी अपनी ननद को देनी पड़ी। उस दिन मैं बहुत रोई थी।
उसके कुछ दिनों पश्चात, मेरे यहां हमारी दूर की रिश्तेदार मुझसे मिलने आईं ,उनसे मिलकर मुझे प्रसन्नता हुई। वे लड़के वालों की तरफ से थीं, पहली बार मुँह दिखाई में उन्होंने, मुझे उपहार में एक साड़ी भेंट की।
उस साड़ी को देखते ही मैं आश्चर्यचकित रह गई मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि वो मेरी ही साड़ी थी ,मेरी मां की दी हुई साड़ी थी। तब मैंने उनसे जानना चाहा,'' कि यह साड़ी आपने कहां से ली है ?''
तब उन्होंने बताया -यह साड़ी तो मेरी बहू अपने लिए लाई थी किंतु यह मुझे पसंद आ गई, और इसीलिए मैंने उससे यह साड़ी ले ली। क्यों तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो ?
क्योंकि यह साड़ी मेरी ही है,प्रसन्न होते हुए मैंने कहा -ये मैंने अपनी ननद को दी थी। जब साड़ी का, विस्तार से वर्णन किया गया तो पता चला, मेरी ननद की ननद उस साड़ी को ले गई थीं। वहां उसकी जेठानी ने, वह साड़ी ले ली थी, और उसकी जेठानी से होते हुए वह साड़ी, उनकी बहू के पास पहुंच गई और उनकी बहू से होते हुए, मेरी मां की साड़ी मेरे पास आ गई।
मैं उस साड़ी को देखकर भाव विभोर हो उठी थी, आज उस साड़ी को वापस पाकर बहुत खुश हूं, क्योंकि उससे मेरी मां की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। तब एक सीख़ भी मिली -''जिसके लिए जो चीज होती है,वो उसे मिल ही जाती है।''
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