Kiski dulhan [part 23]

'मोहिनी' दीवार के पीछे खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही थी और सोच रही थी - वो मासूम ! कौन हो सकता है ? जिसकी ये लोग हत्या करना चाहते थे ,क्या वे, मेरे विषय में हीें बात कर रहे थे... या किसी और के बारे में ?

उसी समय...मोहिनी की नज़र उस गुप्त कक्ष के फर्श पर पड़ी। वहां पड़ी धूल में, किसी ने बहुत पुराने समय में एक शब्द उकेरा होगा ,उसे देखने के लिए मोहिनी ने उँगली से धूल हटाई। धीरे-धीरे अक्षर साफ़ नजर आने लगे। उस स्थान पर —"विश्वास...लिखा था और उसके नीचे...किसी ने बाद में जोड़ दिया था—"सबसे खतरनाक हथियार है।"


अचानक मोहिनी को लगा, जैसे उस अँधेरे गुप्त कक्ष में उसके पीछे कोई  खड़ा है ,उसने अनायास ही पीछे मुड़कर देखा ,किन्तु वहां कोई नहीं था या...शायद था.... या फिर मेरा भ्रम ! 

दीवार के पीछे छिपी मोहिनी की, घबराहट के कारण साँसें तेज़ हो चुकी थीं ,अपने को विश्वास दिलवाने के लिए ,उसने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा। वहां बिल्कुल वैसा ही अँधेरा था...न जाने क्यों ? उसे बार-बार महसूस हो रहा था कि वह उस छोटे-से, गुप्त कक्ष में अकेली नहीं है।

 उसने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया ,शायद कोई चीज महसूस हो किन्तु वहां  हवा...पत्थर की ठंडी दीवार...और फिर...अचानक ही टक! की आवाज़ से ,उसकी उँगलियाँ किसी धातु की चीज़ से टकराईं ,मोहिनी चौंक गई ,उसने हाथ फेरकर देखा। पत्थर की दीवार में एक छोटी-सी गोल अंगूठी लगी हुई थी, जो धूल से पूरी तरह छिपी हुई थी। मोहिनी ने उसे हल्का-सा खींचा ,लेकिन वह नहीं हिली ,तभी बाहर से फिर वही आवाज़ आई -"पूरे कमरे की तलाशी लो!"

दोनों नकाबपोश अब हर पत्थर, हर दरार को ध्यान से देखने लगे थे।

मोहिनी  ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया ,अगर अभी कोई आवाज़ हुई...तो उसका छिपना बेकार हो जाएगा।

उधर...रहस्यमयी महिला बिल्कुल शांत खड़ी थीं।\

पहले नकाबपोश ने गुस्से में पास रखी, लकड़ी की कुर्सी को जोर से लात मारी ,कुर्सी टूटकर दूर जा गिरी।तब वो गुस्से से चिल्लाते हुए बोला -"आख़िरी बार पूछ रहा हूँ...लड़की कहाँ है?"

महिला ने बिना घबराए उत्तर दिया—"जिसे तुम ढूँढ़ रहे हो...वह तुम्हारी सोच से बहुत आगे निकल चुकी है।"

"झूठ!"दूसरे नकाबपोश ने उनकी कलाई और कसकर पकड़ ली  मोड़ने लगा,तब बोला -"हमें आदेश मिला है कि उस लड़की को ज़िंदा पकड़ना है।"

महिला की आँखों में एक अजीब-सी चमक उभरी ,तब वो भी गुस्से से बोली - तुम लोगों को हमेशा आदेश मिलते हैं......लेकिन कभी सच नहीं मिलता।"

दोनों नकाबपोश एक पल के लिए चुप हो गए ,स्पष्ट था...महिला उनसे डर नहीं रही थीं।

इधर' सभा कक्ष' में...भानु अब और इंतज़ार नहीं कर पा रहा था। तब वो बेचैनी से बोला - मैं,अब  मोहिनी  को ढूँढ़ने जा रहा हूँ।"

रत्न प्रताप ने उसका रास्ता रोक लिया,किसी भय से बोले  -"अकेले नहीं।"

विक्रम भी, उनके पास आ गए ,उन्होंने पहली बार अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और गंभीरता से बोले -"भानु ! भावनाओं में लिया गया फैसला..."...दुश्मन की सबसे बड़ी जीत होता है।"

भानु ने, अपने पिता की ओर देखा और पूछा -"अगर मोहिनी की जगह माँ होतीं..."...तो क्या आप तब भी यही कहते?"

विक्रम कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गए ,उनकी आँखों में जैसे एक पुराना दर्द तैर गया।

रत्न प्रताप  ने पहली बार महसूस किया...कि विक्रम आज भी किसी, ऐसे अपराधबोध के साथ जी रहे हैं...जिसे उन्होंने, कभी किसी से साझा नहीं किया।

'सभा कक्ष 'का नेता यह सब देख रहा था ,उसने धीमे स्वर में कहा—"अगर लड़की सचमुच उस हिस्से तक पहुँच गई है......तो शायद तीस साल बाद, पहली बार वो दरवाज़ा खुल जाएगा।"

रत्न प्रताप  ने तुरंत उसकी ओर देखा और पूछा "कौन-सा दरवाज़ा?"

नेता मुस्कुराया और बोला - जिसे बंद रखने के लिए कई लोगों ने अपनी जान दी थी।"

"क्या वहाँ डायरी है या फिर तीसरे भाई का सच ?रत्न प्रताप ने पूछा। 

नेता ने कोई उत्तर नहीं दिया,बस इतना कहा—तुम अभी भी गलत सवाल पूछ रहे हो।"

उधर...दीवार के पीछे छिपी मोहिनी ने, फिर उस लोहे की अंगूठी को देखा।इस बार उसने बड़ी सावधानी से उसके आसपास की धूल हटाई।धूल हटते ही उसे समझ आया...वह कोई साधारण अंगूठी नहीं थी।उसके चारों ओर छोटे-छोटे अक्षर खुदे हुए थे।"सत्य बिना मूल्य के नहीं मिलता,''उसके नीचे...दो साँपों का वही चिन्ह ! लेकिन इस बार उनके बीच एक चाबी बनी हुई थी।

मोहिनी को अचानक अपनी जेब में रखी चाँदी की चाबी स्मरण हो आई।वही चाबी...जो उसे तहखाने में मिली थी।उसने धीरे-धीरे अपनी चाबी बाहर निकाली।कुछ पल तक वह उसे देखती रही।उसके मन में संघर्ष चल रहा था।"अगर यह जाल हुआ तो?""अगर यही रास्ता मुझे किसी और मुसीबत में ले गया तो?"बड़ी असमंजस की स्थिति थी। 

तभी उसे रत्न प्रताप की बात याद आई—"हर दरवाज़ा खोलने के लिए नहीं होता ''और उसी क्षण...उस अनजान महिला की आवाज़ उसके कानों में गूँज उठी—"डर कर लिए गए फैसले... हमेशा गलत होते हैं।"

मोहिनी  ने गहरी साँस ली ,उसने चाबी उस छोटे-से गोल छेद में डाली। टक...चाबी बिल्कुल सही बैठ गई।उसने उसे धीरे-धीरे और घुमाया ,घर्ररर...पूरे गुप्त कक्ष में कंपन महसूस हुआ।

मोहिनी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा ,बाहर खड़े दोनों नकाबपोश भी चौकन्ने हो गए।"रुको!"एक ने ज़ोर से कहा-"यह आवाज़ कहाँ से आई?"दोनों ने तुरंत कमरे की दीवारों को टटोलना शुरू कर दिया।

दीवार के पीछे...जहाँ मोहिनी  छिपी थी...फर्श का एक चौकोर हिस्सा धीरे-धीरे नीचे धँसने लगा।वहाँ एक संकरी सीढ़ी दिखाई दी।नीचे से एक ठंडी हवा का झोंका आया। साथ ही...बहुत सी हल्की घंटियों की आवाज़ सुनाई दी।जैसे नीचे कहीं कोई पुराना मंदिर हो। मोहिनी सीढ़ियों को देख ही रही थी कि अचानक उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा ,उसका दिल ज़ोर से उछल पड़ा।

वह पलटने ही वाली थी, कि पीछे से धीमी आवाज़ आई—"आवाज़ मत करना।"

मोहिनी ने धीरे से पीछे देखा ,अँधेरे में एक आदमी खड़ा था ,उसका चेहरा पूरी तरह काले कपड़े से ढका हुआ ,लेकिन यह वही काला मुखौटा नहीं था...जो सभा कक्ष से डायरी लेकर भागा था।

इस व्यक्ति की आँखें बिल्कुल अलग थीं -शांत...लेकिन बेहद सतर्क ,उसने अपनी तर्जनी होंठों पर रखी और बोला -"अगर उन्हें पता चल गया कि यह रास्ता खुल गया है......तो हम दोनों ज़िंदा नहीं बचेंगे।"

मोहिनी कुछ पूछ पाती...उससे पहले उसने अपनी मुट्ठी खोली ,उसकी हथेली पर एक पुरानी चाँदी की अंगूठी रखी थी।

अंगूठी के अंदर की तरफ़ बेहद बारीक अक्षरों में कुछ खुदा हुआ था ,उसने अंगूठी मोहिनी की हथेली पर रख दी और फुसफुसाकर बोला -"इसे अभी मत पढ़ना।"

"क्यों?"मोहिनी  ने भी फुसफुसाकर पूछा।

वह आदमी कुछ क्षण चुप रहा ,फिर बोला—"क्योंकि......जिस दिन तुमने इसके अंदर लिखा नाम पढ़ लिया..."...उसी दिन तुम्हें तय करना होगा, कि तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है....और तुम्हारा अपना कौन ? इतना कहकर उसने सीढ़ियों की ओर इशारा किया,और बोला -"नीचे चलो।"

"वहाँ तुम्हें जवाब तो नहीं मिलेंगे......लेकिन सही सवाल ज़रूर मिलेंगे।"

उसी समय...बाहर खड़े नकाबपोशों में से एक ने दीवार पर ज़ोर से एक हथौड़ा मारा ,धड़ाम ! की आवाज के साथ पत्थर में दरार पड़ गई ,रहस्यमयी महिला की आँखों में पहली बार चिंता दिखाई दी।

तब उसने अपनी फ़िक्र छोड़ ऊँची आवाज़ में कहा—"भागो!"और अगले ही पल...दीवार का एक हिस्सा टूटकर भीतर गिरने लगा।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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