आजकल हर रिश्ता पैसों के तराज़ू में तोला जाता है। जिनके पास पैसे नहीं होते, लोग उन्हें पहचानने से भी इंकार कर देते हैं और यह बात दूसरे अनजाने लोगों पर ही नहीं बल्कि अपने रिश्तों पर भी लागू होती है। अपने ही ,उसे देखकर रास्ता बदल देते हैं। हर रिश्ते की एक अलग पहचान होती थी ,अलग मर्यादा होती थी किंतु अब रिश्तों से ज्यादा' धन 'सर्वोपरि हो गया है। अब और रिश्ते तो छोड़ो !जो रिश्ता माता-पिता का या पति-पत्नी का होता था। एक अभिभावक ही निस्वार्थ भाव से अपने बच्चे की भलाई सोचते थे ,आज वे भी थोड़े स्वार्थी हो गए हैं ।
जो पत्नी निस्वार्थ ,समर्पण भाव से अपनी ससुराल में ,अपने परिवार के लिए त्याग करती थी ,उनकी सेवा करती थी। पति बाहर कमाने जाता था और पत्नी परिवार के लिए समर्पित रहती थी। स्नेह और समझदारी से उस परिवार को जोड़कर चलती थी।
कुछ परिवारों में उस नारी को सम्मान मिलता ,उसके समय और परिश्रम को प्रशंसा मिलती तो उसकी दिनभर की थकान दूर हो जाती, जब पति के चेहरे पर अपने लिए सम्मान और प्रेम देखती ,रात्रि में उसकी बांहों के तकिये पर सो, उसकी दिनभर की थकान समाप्त हो जाती थी । वो एक सादगी से भरे ,स्नेहपूर्ण परिवार की नींव होती थी।
आज के समय में बहुत बदलाव आया है ,ये बदलाव ऐसे परिवारों को देखकर आया है ,जहाँ नारी को सम्मान देना तो दूर ,उसके साथ मारपीट की जाती। मारपीट भी नहीं तो ,उसके काम का कोई महत्व नहीं समझता था। उसको अपमानित करने के साथ -साथ उससे पूछा जाता -''तुम दिनभर घर में बैठी करती ही क्या हो ?'' ऐसे में अब महिलाएं भी जागरूक हुई हैं। पढ़ने के साथ -साथ नौकरी करना चाहती हैं। घर के चूल्हे -चौके दूर रह ,अब एयरकंडीशन 'में बैठकर लैपटॉप पर काम करना ज्यादा पसंद करने लगीं हैं। क्योंकि जो उनकी माँओं ने भुगता ,अब वो झेलना नहीं चाहतीं ,स्वयं उनकी माँ भी, उसको इस बात की इजाजत नहीं देती।
सभी को मालूम है ,बच्चे पैदा करना, सास -ससुर की सेवा करना , घर के सभी कार्य करने के पश्चात भी ,उसके काम का कोई मूल्य नहीं ,क्योंकि वो कमाती नहीं। उसके त्याग ,परिश्रम का उसे उचित परिणाम नहीं मिला। अब कानून भी बना है ,लोगों ने महसूस किया है ,'अब उनके घर बस नहीं, रहे टूट रहे हैं।' माता -पिता 'वृद्ध आश्रम' की शरण में जा रहे हैं। अब नौकरी वाली बहु जो आ गयी है। चाहे वो बीस हज़ार से चालीस हज़ार ही क्यों न कमा रही हो ?किन्तु अब समय पर नाश्ता ,घर का भोजन जहाँ पहले सब एकसाथ बेेठकर घर का बना ताज़ा भोजन करते थे।धीरे -धीरे ये भूली -बिसरी बातें हो जाएँगी।
अब बाहर खाने जाते हैं या फिर कामवाली आएगी ,उसकी प्रतीक्षा रहती है। उसकी प्रतीक्षा में ,घर में रातभर के झूठे बर्तन पड़े रहते हैं। जब वो आएगी ,तो चाय मिलेगी।
जो महिला अपने पति की बीस हजार की नौकरी में भी सुचारु रूप से घर सँभाल लेती थी ,आज पचास हज़ार में तो क्या, एक लाख भी कम पड़ जाते हैं। तब भी बेचारे माता -पिता को समय पर भोजन नहीं और भी न जाने कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है ? एक परिवार जिसकी नींव प्यार ,सम्मान और विश्वास पर रखी जाती थी,जिसको पैसों से नहीं तोला जाता था। उसका मूल्य कोई लगा भी नहीं सकता। आज उस रिश्ते और काम का मूल्य भी तय हो गया है। चंद ऐसे परिवार और लोगों के कारण जो उस गृहणी को इंसान नहीं ,गधा या बिना वेतन की नौकरानी समझते थे। तीस हज़ार रूपये मासिक आय के रूप में ,एक गृहणी के लिए तय किये गए हैं ।
जब ये धनराशि इन रिश्तों के मध्य आ जाएगी ,क्या वो प्यार ,सम्मान ,अपनापन उस परिवार में रहेगा ?जो पति ,अपनी पत्नी को ये कह सकता है -'तुम दिनभर क्या करती रहती हो ? तो क्या वो ये नहीं कहेगा ? यदि तू काम कर रही है ,तो उसका पैसा तुझे मिल रहा है , हम पर क्यों एहसान जता रही है ? क्या गांरंटी है ?वो ऐसा नहीं कहेगा ? तब रिश्ते में प्यार ,सम्मान कहां रहा ? पति ये भी तो कह सकता है -''यदि तू काम कर रही है ,तो तेरे रहने ,खाने -पीने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व भी तो मैं उठा रहा हूँ। ''क्या वो उन पैसों का हिसाब लगाएगा ? तब इस सौदेबाज़ी में पत्नी का वो अधिकार कहाँ रहा ?जो अपने पति से लड़े ,उससे पैसे मांगे और मेरे पति की कमाई पर मेरा अधिकार है ,तब वो अधिकार कहाँ रहा ?
हर रिश्ता पैसों से तौला जाने लगा तो एक सुखद परिवार की नींव कैसे रखी जा सकती है ?जिन्हें सुख -दुःख का साथी बनाकर जीवनभर साथ निभाने के लिए इस संबंध को बनाया जाता था। जिसमें ये दो अज़नबी 'हमसफ़र 'और 'दोस्त 'बन जाते हैं। वो रिश्ता भी अब 'धन 'से अछूता नहीं रहा।
