Kiski dulhan [part 40]

मोहिनी को, जो तस्वीर मिलती है ,तब उसे देखकर रत्न प्रताप राजवीर कह्ते हैं ,मोहिनी और भानु की माँ की कहानी एक -दूसरे से जुडी हुई है। यह सुनकर मोहिनी का चेहरा गंभीर हो गया।उसने पूछा -उनका संबंध मुझसे कैसे ?

रत्न प्रताप ने उत्तर देने के बजाय, तस्वीर की ओर इशारा किया ,और बोले -उस रात दो बच्चों को बचाना था।

मोहिनी की आँखें फैल गईं ,"दो?"


साया ने तुरंत रत्न प्रताप की ओर देखा ,जैसे वह समझ गया हो ,कि रत्न प्रताप ने जरूरत से ज्यादा बोल दिया है।

मोहिनी ने वही शब्द पकड़ लिया ,"दो बच्चे?"वे दोनों कौन थे?"रत्न प्रताप फिर से चुप हो गया ,मोहिनी ने आगे बढ़कर पूछा—एक तो मैं थी, दूसरा कौन था ?"

रत्न प्रताप ने, भानु की ओर देखा,भानु के चेहरे का रंग उड़ गया और बोला -"मैं"

रत्न प्रताप ने सिर नहीं हिलाया किन्तु उनकी चुप्पी ही पर्याप्त थी।

मोहिनी धीरे-धीरे पीछे हट गई ,उसने तस्वीर फिर देखी ,वही महिला ,वही बच्ची और एक छोटा लड़का।उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।"तो...इसका अर्थ है ,उसने बहुत धीमे स्वर में कहा,उस रात मुझे और भानु  को एक साथ बचाया गया था?"

रत्न प्रताप ने कहा—"हाँ।"

भानु ने तुरंत पूछा—"किससे?"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा,और बोला -"यह अभी मत पूछो।"

भानु  हँसा किन्तु उसकी वह हँसी कड़वाहट लिए थी। क्या आपको पता है, सबसे अजीब बात क्या है?"रत्न प्रताप  चुप रहे।"मुझे अब यह भी नहीं पता, कि मेरे जीवन में कौन-सी बात सच है ?वह तस्वीर की ओर देखता रहा।"मेरी माँ..."उसकी आवाज़ टूट गई। मेरी शादी..."यह हवेली..."और अब मोहिनी !..."वह अचानक रुक गया। मोहिनी  ने उसकी ओर देखा,उनकी आँखें मिलीं ,दोनों के मध्य एक अजीब-सा मौन था ,क्योंकि पिछले कुछ दिनों में उनके बीच जो रिश्ता बना था...वह रिश्ता कहीं गलत न हो जाये। 

वह अब एक नए रहस्य के सामने खड़ा था।क्या वे सिर्फ़ इस रहस्य के कारण एक-दूसरे से जुड़े थे?या इससे भी कोई गहरा संबंध था?

साया ने धीरे से कहा—"तुम दोनों को ,एक बात अभी साफ़ कर दूँ ,दोनों उसकी ओर मुड़े ,तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।"कमरे में जैसे हवा रुक गई ,भानु ने कुछ नहीं कहा।

मोहिनी ने राहत की साँस ली, लेकिन उसके मन में एक और सवाल उठ गया "तो फिर..."

साया ने उसकी बात पूरी की—"तुम दोनों को उस रात एक साथ क्यों बचाया गया ?यह अभी भी रहस्य है।"

मोहिनी  ने पूछा—ये "M.V. कौन है?"

साया ने उसकी आँखों में देखा ,"यही वो नाम है, जिसे खोजने के पश्चात तुम्हें उस रात का असली कारण मिलेगा।"

"तो बता दो !"

"मैं नहीं बता सकता।"

"क्यों?"

साया ने धीमे स्वर में कहा—क्योंकि M.V. का पूरा नाम जानने वाला आख़िरी व्यक्ति..."वह रुका ..आज भी ज़िंदा है।"

मोहिनी की आँखें फैल गईं ,"कौन है ?वो !"

साया ने जवाब नहीं दिया,उसने सिर्फ़ कमरे के बाहर अंधेरे गलियारे की ओर देखा।तभी...दूर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। धड़ाम!

भानु तुरंत सतर्क हो गया ,चिल्लाकर पूछा -"कौन है?"

रत्न प्रताप ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया और कहा -"कोई तो है।"

साया ने मशाल उठाई ,और इधर -उधर देखने लगा ,चारों गलियारों में अंधेरा था लेकिन फर्श पर...गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।वही छोटे-छोटे पैरों के निशान !जो मोहिनी  और भानु ने सुरंग में पहले देखे थे।

मोहिनी  ने फुसफुसाकर कहा—"वह फिर आई है।"

रत्न प्रताप  ने उसकी ओर देखकर पूछा -"कौन?"

"मुझे नहीं पता ,लेकिन वह मुझे जानती है।"

रत्न प्रताप का चेहरा गंभीर हो गया और चेतावनी देते हुए बोला -"उससे दूर रहना।"

मोहिनी ने पूछा—"क्या आप, उसे जानते हैं?"

रत्न प्रताप  ने कोई उत्तर नहीं दिया।

लेकिन इस बार साया ने कहा—"हाँ।"रत्न प्रताप ने उसे घूरा ,साया ने शांत स्वर में कहा—"अब छिपाने से कोई लाभ नहीं।"

मोहिनी ने पूछा—"कौन है ?वो !"

साया ने पैरों के निशान की ओर देखा ,जिसे तुमने माँ समझा..."मोहिनी की साँस जैसे अटक गई ,उसने एक गहरी साँस ली ,तब वो बोला -वो शायद तुम्हारी माँ नहीं थी।"

मोहिनी ने कुछ क्षण तक उसे देखा ,और बोली -"शायद ?"

साया ने सिर हिलाया ,क्योंकि मैंने उसका चेहरा कभी नहीं देखा।"

रत्न प्रताप ने कठोर आवाज़ में कहा—"अब बस भी करो !"

साया चुप हो गया। उसी समय...फर्श पर पड़े छोटे पैरों के निशान एक दरवाज़े तक पहुँचे ,दरवाज़ा बंद था।उस पर एक पुराना चाँद बना था।

मोहिनी धीरे-धीरे उस दरवाज़े के पास गई। जैसे ही, उसने दरवाज़े को छुआ...अंदर से आवाज़ आई—"मोहिनी ..."

वह घबराकर जैसे जम गई।भानु तुरंत उसके पास आया और पूछा -"क्या हुआ ?"

मोहिनी ने कुछ नहीं कहा।अंदर से फिर आवाज़ आई—"तुम्हें सच जानना है?"

मोहिनी ने धीमे स्वर में कहा—"हाँ।"वहां कुछ क्षण सन्नाटा छाया रहा ,फिर वो आवाज़ आई -' अकेली आओ !"

भानु ने तुरंत कहा—"नहीं।"

मोहिनी  ने उसकी ओर देखा और बोली ="मैं अकेली नहीं जाऊँगी।"अंदर से हल्की हँसी सुनाई दी, फिर आवाज़ आई—भानु  को साथ लाओगी तो, पहला सच हमेशा के लिए खो दोगी।"मोहिनी असमंजस की स्थिति में शांत खड़ी रही।

भानु ने दृढ़ता से कहा—"यह  हम दोनों को अलग करने की कोशिश कर रही है।

मोहिनी  ने ,समर्थन में सिर हिलाया और बोली -"मुझे भी यही लग रहा है।"

रत्न प्रताप अचानक आगे आए और आदेश दिया "दरवाज़ा मत खोलना !"

मोहिनी ने उनकी ओर देखा और पूछा - क्यों?"

रत्न प्रताप की आवाज़ बहुत धीमी थी—"क्योंकि वह दरवाज़ा.. उन्होंने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं..मैंने पच्चीस साल पहले बंद किया था।"

मोहिनी का दिल जोर से धड़क उठा ,और पूछा -इसके अंदर क्या है?"

रत्न प्रताप  ने कोई उत्तर नहीं दिया।

साया ने उनकी ओर देखा और बोला -"अब इसे पता चलना ही चाहिए।"

रत्न प्रताप ने कहा—"नहीं।"

"क्यों?"

रत्न प्रताप ने दरवाज़े की ओर देखा ,फिर बहुत धीमे स्वर में बोले—"क्योंकि उसके पीछे वह रात बंद है... जिसने हम सबकी ज़िंदगी बदल दी थी।"

तभी मोहिनी ने दरवाज़े पर हाथ रखा ,"तो फिर..."उसने दृढ़ता से कहा—"अब इसे खोलने का समय आ गया है।"

भानु उसके पास आकर खड़ा हो गया ,"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

रत्न प्रताप  ने दोनों को देखा।इस बार उन्होंने, उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।बस इतना कहा—"जो भी अंदर देखो... तुरंत उस पर विश्वास मत करना।"

मोहिनी ने, चाबी ताले में लगाई ,क्लिक ! दरवाज़ा धीरे -धीरे खुलने लगा।अंदर घना अंधेरा था।लेकिन अंधेरे के बीच...एक छोटी मेज़ पर जलता हुआ दीपक रखा था और उसके पास...एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी।कुर्सी पर सफ़ेद कपड़ों में कोई बैठा था ,उसका चेहरा नीचे झुका हुआ।मोहिनी ने एक कदम आगे बढ़ाया।उस व्यक्ति ने भी धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

भानु ने साँस रोक ली ,रत्न प्रताप के हाथ से मशाल लगभग गिर ही गई थी क्योंकि उस चेहरे को देखकर...उनके मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला—"मृणाल...और कमरे में बैठी महिला ने...धीरे से मुस्कुराकर मोहिनी की ओर देखा और बोली -"बहुत देर कर दी, बेटी !"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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