चिंतामणि ,अपनी बेटी केतकी के प्रति ,अपने पति केशवदास के सामने चिंता व्यक्त करती है। हमारी लड़की अब अन्य लड़कियों की तरह नहीं रही ,अब उसमें बहुत बदलाव आ गया है। आपको भी ,अब उसकी कोई फ़िक्र नहीं ,जंगलों में काम करके जंगली सी हो गयी है, हालाँकि वो कहना चाहती थी ,कि अब केतकी में लड़कियों वाली नज़ाकत ,कोमलता नहीं रही किन्तु उसके पिता के सामने कहते हुए हिचकिचा रही थी। वो भी नहीं समझ पा रहे थे।
तब वो बोले - तुम ऐसा क्यों कह रही हो ?हमारी बेटी बहुत ही होशियार और बहादुर है। तुम उसकी फ़िक्र न करो ! जिस घर भी जाएगी उसी घर में रौनक आ जाएगी। जितने अच्छे तरीक़े से वो मेरे साथ काम संभालती है। तुम्हारे साथ भी तो सहयोग करती है।ऐसे कोई लड़का भी नहीं कर सकता। तुम नाहक ही परेशान हो रही हो।
आप समझ नहीं रहे हैं ,अब वो सोहलवें बरस में चल रही है। अब उसके लिए लड़का देखना आरम्भ कर दीजिये ! काम करना ही सब कुछ नहीं होता। जीवन में बहुत ऐसे काम होते हैं ,जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता, किन्तु वो काम करने पड़ जाते हैं।
पता नहीं ,आज तुम कैसी बहकी -बहकी बातें कर रही हो ?ज़्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। समय आने पर सब अच्छा ही होगा।
आप कुछ नहीं समझेंगे, कहकर चिंता चुप हो गयी।
मां की बातें सुनकर दोनों भाई भी शांत हो गए थे। केतकी को अपना इस तरह से सजना कुछ ज्यादा अच्छा तो नहीं लग रहा था क्योंकि उसे तो साधारण रूप में रहने की आदत जो हो गई थी किंतु न जाने क्यों ?आज उसे लगा, मुझे सजना चाहिए। किन्तु किसलिए सजना है ? वो स्वयं ही नहीं जानती ,शायद श्याम के लिए ,उसको प्रभावित करने के लिए सजना है।
जब घर में केतकी के पिता थे ,तब शाम को केतकी खेतों पर टहलने के लिए चली गई ,काम करने का मन नहीं किया ,इधर-उधर देखने लगी। शायद ,उसे किसी का इंतजार है किन्तु यह बात वह स्वयं ही स्वीकार नहीं कर पा रही है। वहीं जमीन पर बैठकर कुछ सोचने लगी ,वो यहां क्यों बैठी है ? वह स्वयं ही नहीं जानती। कुछ देर ऐसे ही बैठी रही।
शाम के समय कुछ लोग, टहलने के लिए भी निकलते हैं ,केतकी को इस तरह बैठे देखकर किसी बुजुर्ग़ ने पूछा -लाली !यहाँ क्यों बैठी है ?
कुछ नहीं ताऊजी ! ऐसे ही बैठी हूँ।
अब घर जा !देर रात लड़की का इस तरह जंगल में ठहरना ठीक नहीं।
अभी जाउंगी ,थोड़ा सा काम बाक़ी है ।
तेरा बाप कहाँ है ?
पापा ,तो आज किसी काम से बाहर गए थे ,अभी आए हैं।
चल ,तो तू भी घर जा !कहकर वो आगे बढ़ गए।
केतकी सोच रही थी ,वो सही तो कह रहे हैं ,मैं यहाँ क्यों बैठी हूँ ? तभी उसके अंदर एक विचार आया- ,'उसने तो पूछा था, 'फिर कब मिलना है ?' मैने भी तो उसे कोई जबाब नहीं दिया था। जबाब नहीं दिया था तो क्या हुआ ? ,वैसे ही आ जाता ,इससे पहले भी क्या, मैंने उसे बुलाया था ?उसने वहीँ पास ही पडा एक मिटटी का ढ़ेला उठाया ,और दूर तक फेंककर मारा। वो ढ़ेला कहाँ गया ? उसमें, केतकी की कोई दिलचस्पी नहीं थी ,उसके मन की हलचल,उसे परेशान किये दे रही थी।
जब उससे मिलने का कोई वायदा नहीं , फिर मुझे उसका इंतजार क्यों है ? समय काटे नहीं कट रहा था,धड़कनें बेक़ाबू सी होने लगीं। ऐसा लगा ,इससे पहले की कोई उसे ,यहाँ खड़े हुए देखे और उसे नसीहत दे ! वो चाहती थी ,एक बार श्याम उसके सामने अचानक ही आ जाये। वो इधर-उधर दूर -दूर तक देखने का प्रयास करने लगी। ना उम्मीद हो ,वो घर की ओर बढ़ने लगी।रातभर उसी के सपने आते रहे ,वो उसे धुंध रही है ,वो न जाने कहाँ खो गया है ?
अगले दिन प्रातः उठते ही,बाहर निकल गयी। खेतों में भी ऐसा कोई विशेष कार्य नहीं था, धूप बढ़ती जा रही थी। फिर सोचा क्यों न मैं घर वापस चली जाऊं और वह घर आ गई किंतु अब घर में उसका मन नहीं लग रहा था। मन का पंछी उसकी तलाश में बाहर जाना चाहता था। न जाने क्यों ? उसका मन बार-बार श्याम के पीछे चला जाता था। जबकि उसने कोई ऐसा वायदा भी नहीं किया था। तब उसे अपने आप पर ही क्रोध आया मुझे ,उससे पूछ लेना चाहिए था। हो सकता है अपने गांव चला गया हो। फिर सोचा वह यहां किसके यहां रहता था ? मैंने तो यह भी पता नहीं लगाया । न ही उससे पूछा। अब उसे, अपनी ढेर सारी गलतियों का एहसास हो रहा था। थककर मन ही मन बुदबुदाई ,वो यहां आया ही क्यों था ?
मुझे, उसके विषय में जानना ही क्यों है ? वह अपनी मां के साथ काम में हाथ बंटाना चाहती है ,ताकि उसका मन भी इधर -उधर भटकने की बजाय व्यस्त हो जाये।किन्तु केतकी आज जैसे अपने में नहीं थी। वह शायद कुछ सोच रही थी,तब चिंतामणि ने महसूस किया ,तब उन्होंने केतकी से पूछा -क्या कोई बात है ?
नहीं तो.... उसने हिचकिचाते हुए कहा।
क्या किसी सहेली के यहां जाना है ?
अरे हाँ माँ, अच्छा याद दिलाया, मुझे अपनी सहेली के यहां जाना था कहते हुए वह घर से बाहर निकली, घर में उसका मन ही नहीं लग रहा था। घर से बाहर जाने का बहाना ढूंढ रही थी।
किसके यहां जा रही है ? बताकर तो जा !!! पीछे चिंतामणि कहती ही रह गई।ये उम्र ही ऐसी है ,मन भटकने लगता है। कहीं एक जगह नहीं लगता ,वो बेटी के ह्रदय की व्यथा को समझते हुए ,उस पर ज्यादा टोकाटाकी नहीं करना चाहती थीं।
केतकी घर से बाहर, सहेली से मिलने के लिए निकली थी और क़दम स्वतः ही उसी ट्यूबवेल के तरफ बढ़ने लगे ,जहाँ वो श्याम से मिली थी। ढलती धूप थी फिर भी काफी गर्मी थी।
मन ही मन सोच रही थी किसी ने पूछा -'कि मैं कहां जा रही हूं तो क्या जवाब दूंगी ? 'जब मैं ऐसे ही इधर -उधर घूमती थी तो कोई नहीं पूछता था किन्तु अब न जाने कहाँ से आ जाते हैं ?और पूछने लगते हैं -यहाँ क्या कर रही है ?अकेले नहीं जाते ,शाम को ठहरना ठीक नहीं।
अब टूयबवेल पर मुझसे क्या कोई पूछेगा? इस विश्वास के साथ आगे बढ़ रही थी। यहां मुझसे कोई क्या पूछेगा ?इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रही थी।
जब केतकी ,उस स्थान पर पहुंची ,तो देखा,वहां पहले से ही कुछ लोग उपस्थित हैं। छुपकर देखने का प्रयास किया और वापस लौट आई। वहां तो स्वयं हरिया काका थे।
वहां दूर -दूर तक खेत और हरियाली थी खुला आसमान ,उड़ते पंछी ,फिर भी न जाने क्यों ?केतकी को सब वीरान नजर आ रहा था। प्रकृति का नज़ारा सामने ही था ,खुश होती तो, इससे बेहतर कुछ नहीं किन्तु केतकी के सामने सबकुछ होते हुए भी... वो खज़ाना अदृश्य हो गया था। तभी सामने से कोई उसे आता दिखलाई दिया। दिल के अँधेरे में उम्मीद की एक किरण चमकी हो जैसे ....वो इतनी दूर था ,अंदाजा लगाना मुश्किल था ,कौन हो सकता है ?बहुत देर तक उसके हावभाव से अंदाजा लगाती रही।
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