Kiski dulhan [part 39]

मोहिनी ने जैसे ही महिला के चेहरे को देखा और उसके चित्र को छुआ,उसकी नजरों के सामने कुछ दृश्य उभरने लगे। एक महिला थी, जिसके पास दो बच्चे थे। वह महिला दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखकर कह रही थी—"एक दिन तुम दोनों को एक-दूसरे की रक्षा करनी होगी।

तभी "दृश्य बदल गया -आग ! चीखें ! भागते हुए लोग !फिर वही महिला...एक बच्ची को किसी के हाथ में देते हुए ,कहती है -"इसे ले जाओ !

उस व्यक्ति ने पूछा -कहाँ ?


"जहाँ 'देवगढ़ 'का नाम भी न पहुँचे ,फिर...दृश्य टूट गया और मोहिनी  ने अपनी आँखें खोल दीं।

भानु उसे संभाल रहा था ,वो जानता था ,जब मोहिनी को कुछ ऐसे दृश्य दिखलाई देते हैं ,तब उसे अपनी अवस्था का भान नहीं रहता। जैसे ही उसने आँखें खोलीं ,वो बोला -"मोहिनी !"क्या तुम ठीक हो ?वह हाँफ रही थी ,जैसे कहीं दौड़ रही थी ,या फिर घबराहट थी ,तब उसके मुख से निकला -"वह महिला..."

भानु ने पूछा—"कौन?"

मोहिनी ने काँपती आवाज़ में कहा—"तुम्हारी माँ।"

भानु एकदम से स्थिर सा हो गया, तुम ये क्या कह रही हो ?"

मोहिनी ने चित्र की ओर इशारा किया और बोली - मुझे नहीं पता कैसे...लेकिन मैंने उन्हें देखा है ।"

भानु धीरे-धीरे चित्र के सामने गया ,उसे  महिला का चेहरा स्पष्ट दिखलाई दे रहा था। उसकी आँखें भर आईं।"मैंने..."वह रुक गया ,मैंने उन्हें कभी ऐसे तस्वीर में नहीं देखा।"

"क्यों?"

"क्योंकि..."उसने काँपती आवाज़ में कहा—घर में जो भी तस्वीरें थीं ,उनमें उनका चेहरा हमेशा काट दिया गया था।"

मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,अब दोनों के सामने एक और सवाल था।भानु की माँ को तस्वीरों से क्यों मिटाया गया था?

 तभी...कमरे की छत से हल्की आवाज़ आई।खर्र...दोनों ने ऊपर देखा।एक छोटी-सी धूल की परत नीचे गिरी फिर...छत के एक कोने में लकड़ी का पैनल थोड़ा खुला। भानु ने एक कुर्सी खींचकर उसे खोला।अंदर एक छोटा कपड़े का पैकेट था।उस पर लिखा था—"सिर्फ़ मोहिनी के लिए।"मोहिनी ने उसे खोला ,अंदर...एक पुराना कपड़े का टुकड़ा था।उस पर हाथ से कढ़ा हुआ एक नाम—''मोहिनी "लिखा हुआ था और उसके साथ...एक बहुत छोटी बच्ची की तस्वीर।मोहिनी ने तस्वीर उठाई ,वो बच्ची वही थी ,लेकिन तस्वीर के पीछे लिखे शब्द पढ़कर उसकी साँस थम गई—"यह बच्ची हमारी बेटी नहीं थी।"नीचे...किसी ने सिर्फ़ दो अक्षर लिखे थे—"M.V."

मोहिनी ने तस्वीर भानु को दी।भानु  ने भी वे अक्षर देखे -"M.V..."वह सोचने लगा ,फिर उसकी आँखें अचानक आश्चर्य से फैल गईं और बोला ..मोहिनी !"

"क्या?"

"ये अक्षर...उसने तस्वीर कसकर पकड़ ली।मेरे पिता के नाम के भी हो सकते हैं।"विक्रम..."

मोहिनी ने धीरे से कहा लेकिन... भानु ने तुरंत सिर हिलाया ,"नहीं।"

"क्यों?"

उसने तस्वीर के नीचे छिपी आख़िरी पंक्ति पढ़ी—"M.V. ने उसे बचाया था ,कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

मोहिनी ने फुसफुसाकर कहा— तब ये M.V. कौन हो सकता है?

और उसी क्षण...कमरे के बाहर किसी ने बहुत धीरे से कहा—"तुम्हें सच में जानना है?"

दोनों ने दरवाज़े की ओर देखा ,इस बार आवाज़...साया की थी ,लेकिन वह अकेला नहीं था।उसके पीछे...रत्न प्रताप  खड़े थे और उनके चेहरे पर ऐसा डर था...जो मोहिनी ने पहली बार देखा था। दरवाज़े के बाहर खड़े  रत्न प्रताप और साया को देखकर मोहिनी कुछ क्षणों तक बिल्कुल स्थिर रही।उसके हाथ में अब भी वही पुरानी तस्वीर थी।तस्वीर के पीछे लिखे दो अक्षर—M.V.और नीचे—"M.V. ने उसे बचाया था।"

भानु की तलवार अब भी उसके हाथ में थी ,उसने दरवाज़े से कुछ दूरी बनाते हुए पूछा—"आप दोनों यहाँ कैसे पहुँचे?"

साया ने कोई उत्तर नहीं दिया।उसकी नज़र सीधे मोहिनी के हाथ में मौजूद तस्वीर पर थी।रत्न प्रताप ने जैसे ही उस तस्वीर को देखा, उनके  चेहरे के भाव बदल गए।एक पल के लिए उनकी आँखों में भय उभरा।फिर उन्होंने तुरंत खुद को संभाल लिया। 

मोहिनी ने उनके  बदलते भावों को देख लिया ,तब उसने ,उनसे पूछा -क्या आप इस तस्वीर के विषय में कुछ जानते हैं। 

रत्न प्रताप ने कोई जबाब नहीं दिया।

"मैंने पूछा ,क्या आप इस तस्वीर के विषय में कुछ जानते हैं ,इस बार उसकी आवाज़ कठोर थी।

रत्न प्रताप ने धीरे से कहा—"हाँ।"

भानु आगे आया और पूछा -और ये M.V.?"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा।उनकी आँखों में ऐसी बेचैनी थी ,जैसे यह नाम सुनना ही उनके लिए किसी पुराने'' घाव को हरा कर देने ''जैसा था।

"उस नाम को अभी भूल जाओ !उनका जबाब था। 

मोहिनी की आँखें सिकुड़ गईं ,"यही तो समस्या है। वह तस्वीर उठाकर उनके सामने ले आई।हर बार जब भी मैं कोई प्रश्न पूछती हूँ, आप लोग कह देते  हैं—भूल जाओ ! माँ के बारे में पूछूँ—तो भूल जाओ !मेरे बचपन के बारे में पूछूँ—तो भूल जाओ !"इस हवेली के तहखाने के बारे में पूछूँ—तो वहाँ मत जाओ !"और अब M.V. का नाम सामने आया है...उसने तस्वीर नीचे की ,तो इसे भी भूल जाऊँ?"

रत्न प्रताप ने कोई उत्तर नहीं दिया।मोहिनी ने पहली बार महसूस किया कि उसकी आवाज़ में डर से ज्यादा गुस्सा था।

साया ने धीमे स्वर में कहा—रत्न प्रताप, अब इसे रोकना संभव नहीं है।"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा ,"तुम चुप रहो।"

"क्यों?चुप रहूं "साया ने शांत भाव से कहा ,तुम समझ नहीं रहे हो , जितना तुम इससे छिपाओगे, उतना ही वह गलत लोगों से जवाब ढूँढ़ेगी।"

भानु ने साया की ओर देखा और पूछा -क्या तुम जानते हो M.V. कौन है?"

साया ने उसकी आँखों में देखा,"हाँ"

"तो बताओ।"

"अभी नहीं।"

भानु का धैर्य टूट गया ,हर कोई 'अभी नहीं' क्यों कह रहा है?"

साया ने कुछ नहीं कहा ,भानु ने तलवार नीचे कर दी और व्यथित होते हुए बोला -मैं अब इस खेल से थक चुका हूँ।"

रत्न प्रताप ने पहली बार सीधे उससे कहा—"यह खेल नहीं है, भानु !"

"तो क्या है?"

रत्न प्रताप की आवाज़ भारी हो गई ,"एक गलती...वो रुके और बोले -जिसे ठीक करने में पच्चीस साल लग गए।"

मोहिनी  ने तुरंत पूछा—"किसकी गलती?"

रत्न प्रताप  उसकी ओर देखा,और बोले -"मेरी"कमरे में सन्नाटा छा गया।

मोहिनी को उम्मीद नहीं थी कि रत्न प्रताप इतनी जल्दी अपनी गलती स्वीकार कर लेंगे।

"क्या गलती?"

रत्न प्रताप ने कोई  जवाब नहीं दिया ,उन्होंने कमरे में रखी पुरानी तस्वीर की ओर देखा और बोले -यह तस्वीर तुम्हें नहीं मिलनी चाहिए थी।"

मोहिनी ने कहा—लेकिन अब तो मिल गई।"

"हाँ।"

"तो अब सच बताइए !"

रत्न प्रताप ने एक गहरी साँस ली और बोले -यह तस्वीर उस रात की है जब...वो रुक गए।

भानु ने पूछा—"जब क्या?"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा ,जब तुम्हारी माँ आख़िरी बार इस हवेली में थीं।"

भानु का चेहरा कठोर हो गया और उन्हें स्मरण कराते  हुए पूछा -आपने तो कहा था, मेरी माँ की मृत्यु हो गई थी।"रत्न प्रताप  ने कुछ नहीं कहा और आपने ही कहा था 'कि वह मुझे छोड़कर चली गईं।'

अब रत्न प्रताप की आँखों में अपराधबोध स्पष्ट था "मैंने जो कहा था...उन्होंने धीमे स्वर में कहा -.वह पूरा सच नहीं था।"

भानु  की क्रोध के कारण मुट्ठियाँ कस गईं ,तो क्या मेरी माँ ज़िंदा थीं?"

रत्न प्रताप ने तुरंत उत्तर नहीं दिया और यही मौन...भानु के लिए उत्तर से भी ज्यादा भयावह था।

"रत्न प्रताप !''वो लगभग चिल्ला उठा ,"मेरी माँ ज़िंदा थीं?"

रत्न प्रताप  ने आँखें बंद कर लीं ,फिर धीरे से कहा—"कुछ समय तक।"

भानु  की साँस जैसे रुक गई।

"कहाँ?"

"यह मैं नहीं बता सकता।"

"क्यों?"

"क्योंकि..."

रत्न प्रताप  ने मोहिनी की ओर देखा और बोला -तुम्हारी कहानी और उसकी कहानी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।"



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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