Shaitani sa....16

' केतकी' जब से ,'श्याम' से मिली है , उसे आजकल बहुत अच्छा लगने लगा है। कभी -कभी स्वतः ही मुस्कुराने लगती है। आज न जाने क्यों ? उसका मन किया, कि वह अच्छे से तैयार हो। उसने अपने बालों को खुला छोड़ा,अपने आपको आईने में देखा ,फिर सोचा ,किसी ने देख लिया तो पूछेंगे -'ये बाल क्यों बिखेरे घूम रही है ,बावली हो गयी है। ''गांव वाले भी न... फैशन को जानते नहीं। चलचित्रों में तो सभी अभिनेत्री बाल खोले घूमती हैं। किन्तु ये गांव है ,शहर नहीं सभी बातें सोचकर उसने तब एक पोनीटेल बनाई और कुछ लटाओं को अपने चेहरे पर आगे निकाल लिया, जिसे देखकर उसके दोनों भाई उसका मजाक उड़ाने लगे। उनके मजाक उड़ाने पर वो उदास होकर बैठ  हुई। 


जब उसकी मम्मी ने उसकी उदासी का कारण जानना चाहा , तो मुस्कुरा दीं और उसका समर्थन किया। वो समझ रही थीं , अब बेटी की उम्र ही ऐसी है ,कभी-कभी सजने -संवरने का मन करता है। तब वो अपने दोनों बच्चों को डांटते हुए कहती हैं-  -तुम इसे ऐसे क्यों परेशान कर रहे हो ?अच्छी तो लग रही है ?'' अब तक तो साधारण रहती थी, इसीलिए इसका ये बदलाव  तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है। तुम्हें उसकी प्रशंसा करनी चाहिए। आज लड़कियों की तरह कपड़े पहने हैं ,चोटी बनाई है। अब तक तो अपने भाइयों की पेंट -कमीज़ ही टांगकर खेतों में भाग जाती थी। 

देखो ! ये तुम्हारी छोटी बहन है ,मुझे तो अच्छा लगा, आज इसने कम से कम लड़कियों वाले ये कपड़े पहने हैं । मुझे तो इसकी चिंता सता रही थी - कल को इसका ब्याह होगा ,तो कैसे करेगी ? बाद में तो ये ऐसे ही कपड़े तो पहनेगी। 

क्यों ? वहां इसे हमारे कपड़े नहीं मिलेंगे, तो अपने पति के कपड़े पहन लिए करेगी ,कहकर दोनों हंसने लगे। 

तुम इसकी हंसी उड़ा रहे हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए। आज ये कितनी खुश थी ?तुमने इसका मन दुखा दिया। 

वही तो मम्मी ! हम भी तो यही सोच रहे थे ,आज इसे क्या हो गया ? जो ऐसे सज धज रही है। आज तो कोई त्योहर भी नहीं है दिवाकर ने कहा। 

सोचना क्या है ?अब बड़ी हो रही है ,इतनी समझदारी तो इसे आनी ही चाहिए। वो स्वयं भी समझ रहीं थीं इसकी उम्र ही ऐसी है ,इसी उम्र में तो लड़कियों को सजने ,संवरने का मन करता है। उन्हें क्या मालूम था ?इसके सजने -संवरने का कारण कुछ और ही है। 

तब वो बोलीं -  यह तो काम में लगी रहती है ,अच्छा हुआ कि यह अपने कामों में व्यस्त रहती है वरना तुमने देखा नहीं, लड़कियां कैसे बन ठनकर रहती हैं ?इसकी भाभी इसके लिए कितनी सुंदर कुर्ती -सलवार लाई थी। वे अब तक यूँ ही रक्खे हुए है। 

सही तो है ,अब अपने कपड़े पहनेगी ,मनोज ने मुस्कुराते हुए दिवाकर से कहा। बात को ज़्यादा न बढ़ाते हुए ,मनोज बोला -हम आपकी बेटी को कुछ नहीं कहेंगे ,ये चाहे कुछ भी करे ,कहते हुए उसने एक बार फिर केतकी की तरफ देखा ,उसको हंसी छूटने वाली थी ,उसने तुरंत अपना मुँह घुमा लिया। 

चल ! बेटा हम यहाँ से चलते हैं ,चिंतामणि जी बोलीं। वो दोनों कमरे से बाहर आ गयीं किन्तु केतकी का मन अभी भी उदास था ,उसे लग रहा था वो अच्छी नहीं लग रही है इसीलिए तो दोनों भाई हंस रहे होंगे। 

माँ मन ही मन सोच रही थी ,इसे तो ठीक से बाल बनाने भी नहीं आते, जब कम उम्र की थी तो हमें बात बनाती थी, कैसे रहना है ?और अब बिल्कुल ही जंगली हो गयी है। कल को ससुराल गयी तो क्या होगा ?अब इसे घर के काम के साथ -साथ ढंग से रहना -सहना सिखाना होगा। उन्होंने एक पल बेटी पर नजर डाली और बोलीं - जा कंघा लेकर आ, तेरे बाल मैं ठीक करूंगी।

तभी दिवाकर नीचे आया ,और उसे देखकर फिर से हंसने लगा और बोला -'भूतनी' लग रही है ,कहकर
हंसने लगा। 

चुप करो ! दोनों, कहते हुए चिंतामणि ने उसके बाल सँवारे और सच में ही ,अब उन्हें चिंता हुई। 

शाम को ,केशवदास जी बाहर से आये थे और आते ही केतकी से पूछा -क्या आज खेत पर गयी थी ?जानवरों को चारा ठीक से डाला था। 

हाँ ,गयी तो थी ,आज ज़्यादा काम नहीं था ,कहकर वो वहां से चली गयी। 

केतकी के जाने के पश्चात ,चिंतामणि बोली -आपने तो इसे बिल्कुल ही इन कामों में लगा दिया है। अब इसके लिए भी लड़का देखना शुरू करिये ? उसकी पढ़ाई छूट गयी ,जंगलों में रहकर जंगली सी हो गयी है।जो कुछ आता था ,वो भी भूलती जा रही है।  

आज क्या बात हो गयी ?जो तेरे तेवर ऐसे बदले हुए हैं ,केशवदास जी ने पूछा।  

कुछ याद भी है ,आपकी लड़की अब बड़ी हो रही है ,वो क्या इसी तरह खेतों में काम करती रहेगी ? आपके लड़के नहीं जाते और अब आप भी इस पर निर्भर हो गए हैं। तब चिंतामणि को एहसास हुआ ,उसने केशवदास जी के आते ही ,ये क्या बात उठा दी ,तब बोली - आप हाथ -मुँह धो आइये ! मैं चाय रखती हूँ। बाद में बात करते हैं। 

केशवदास जी के चले जाने पर वो सोचने लगी -धीरे-धीरे समय ऐसे ही व्यतीत हो जाता है और हमें पता ही नहीं चल पाता। हमें लगता है ,हम अभी भी वहीं पर हैं किंतु समय बहुत आगे निकल जाता है। बच्चे बड़े हो जाते हैं। मेरी दोनों बेटियां तो गई, अब इसकी तैयारी करनी होगी , कहते हुए उनकी आंखें नम हो आईं।

 सोच रही थी, अब तक तो यह मेरे साथ, काम करवाती थी ,अपने पिता के कार्य में भी, हाथ बँटाती रही है । इसके चले जाने पर मैं, कितनी अकेली हो जाऊंगी ? उन दोनों की कमी महसूस नहीं हुई थी। बेटी तो पराया धन है, भेजना तो है ही ,यह सोचकर उन्होंने अपने मन को सांत्वना  दिया। 

तब तक केशवदास जी भी ,हाथ -मुँह धोकर आ गए थे। वहीं पास में रखी कुर्सी पर बैठते हुए बोले -आज क्या हुआ ?

होना क्या है ?अपनी प्रेम ![केतकी ] आज तैयार हुई ,सूट पहना। 

इसमें क्या बड़ी बात है ?

सुन तो लीजिये ! खेतों में काम करते -करते उसके चेहरे पर अब वो रौनक नहीं रह गयी है । आज तैयार हुई तो दोनों बच्चे उसकी हंसी उड़ा रहे थे। भूतनी लग रही है। वो तो उन्हें ,मैंने डांट दिया और दोनों बेटों को समझाया, यदि वह कुछ सजती संवरती है तो उसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। न जाने कितने दिनों तक उसका यहां दाना -पानी है ,फिर अपने ससुराल की हो जाएगी। ससुराल वाले भेजेंगे भी या नहीं, उसे देखने को भी तरस जाओगे !

ठीक है ,चाय की चुस्की लेते हुए केशवदास जी बोले। ये तो तुमने अपने बच्चों से कहा ,मुझसे क्या कहना चाहती हो ?

आपसे यही कहना है ,अब लड़की घर के काम संभाले, सारा दिन पढ़ाई नहीं होती कभी -कभी अपने बेटों को भी तो ले जाया कीजिये। कल को बेटी के लिए लड़का ढूंढने चलेंगे, तो ससुराल वाले ही कहने लगेंगे। ये तो गांव की उज्जड गंवार है। इसे तो रहने -सहने का सलीका ही नहीं आता। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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