Kiski dulhan [part 31]

जब मोहिनी ने उस कक्ष में प्रवेश किया , तब उसके पांव के नीचे पायल आ गयी ,मोहिनी ने झुककर उस पायल को उठाया ,उसकी आँखें अचानक ठहर गईं।उसे लगा जैसे ,वो इन्हें जानती है। 

"ये क्या है ? भानु ने पूछा -"क्या हुआ?"

मोहिनी ने पायल को गौर से देखा,उसमें एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट लगा था। इतना ही नहीं ,उस लॉकेट के पीछे खुदा था—"आर."

भानु ने उसे देखा और मोहिनी को आवाज लगाई -मोहिनी !


मोहिनी ने सिर हिलाया ,शायद , उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठ रही थी।उसे यह पायल पहले कहीं देखी हुई लग रही थी।ये कहाँ देखी थी ?बहुत पहले ,इतनी पहले...कि उसकी याद तक पहुँचने की कोशिश करते ही सिर में दर्द होने लगा।

अचानक कमरे के कोने से आवाज़ आई -खर्र...दोनों एक साथ पलटे किन्तु वहाँ कुछ नहीं था।

भानु  ने फ्लैश लाइट उस आवाज की तरफ घुमाई ,वहां सिर्फ़ एक पुराना लकड़ी का संदूक पड़ा था।उसका ढक्कन भी थोड़ा खुला हुआ था। भानु कहते हुए आगे बढ़ा ,"शायद हवा से..."

तभी मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली -"रुको !"

"क्यों?"

तुमने सोचा ,यह कमरा बंद था ,तब वह धीरे से बोली -अगर यहाँ हवा इतनी है, कि संदूक का ढक्कन खुल जाए..तो खिड़कियाँ कहाँ हैं?"

मोहिनी के कहने पर भानु ने कमरे के चारों ओर देखा ,इससे पहले उसका ध्यान ,इस ओर नहीं गया था ,उसने देखा ,वहां कोई खिड़की नहीं थी,सिर्फ़ बंद दीवारें थीं ,यह सब देखकर दोनों चुप हो गए।

तभी  संदूक के भीतर से...टिक... टिक... टिक...की आवाज़ आने लगी।

भानु ने अपनी तलवार निकाल ली।

मोहिनी थोड़ा पीछे हट गई और बोली -लगता है ,यह घड़ी की आवाज़ है ?"

भानु ने ,धीरे से संदूक खोला ,उसके अंदर पुराने कपड़े थे ,उनके नीचे...एक छोटी-सी लकड़ी की डिब्बी थी। जिस पर  लिखा था—जिसे यह मिले, वह पहले आईना देखे।"

भानु ने ,मोहिनी  की ओर देखा और बोला -यह तुम्हारे लिए है।"

मोहिनी ने ,कुछ नहीं कहा- उसकी नज़र कमरे के सामने रखे बड़े आईने पर टिक गई। उस पर अभी भी सफेद कपड़ा पड़ा था। मोहिनी, धीरे-धीरे आईने के पास गई।उसने कपड़े का एक सिरा पकड़ा।

भानु  ने कहा - मोहिनी ! शायद ,इससे पहले कि वो अपना वाक्य पूर्ण करता ,तब तक मोहिनी, कपड़ा हटा चुकी थी।फड़ाक! आईना सामने था। पहली नज़र में...उसमें सिर्फ़ भानु और मोहिनी दिखाई दे रहे थे।लेकिन अगले ही पल मोहिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। आईने में उनके पीछे...एक तीसरी आकृति खड़ी थी।एक छोटी लड़की ! वो सफेद कपड़ों  में थी ,बाल खुले हुए और हाथ में...वही चाँदी की पायल।

मोहिनी ने, घबराकर पीछे देखा तो कमरा खाली था।

भानु  ने पूछा -"क्या हुआ? 

मोहिनी ने आईने में.. फिर से देखा। इस बार वो लड़की, वहाँ नहीं थी ,सिर्फ़ उनका प्रतिबिंब था। 

भानु ने कुछ क्षण आईने को देखा और मोहिनी से पूछा - तुमने इसमें क्या देखा?"

मोहिनी ने काँपती आवाज़ में कहा—"एक बच्ची !"

भानु कुछ बोल पाता...उससे पहले ही आईने पर धुंध जमने लगी और उस धुंध पर किसी अदृश्य उँगली ने धीरे-धीरे तीन शब्द लिख दिए—"मैं यहाँ थी।"

मोहिनी  की साँस जैसे अटक गई ,"कौन?"

धुंध पर अगला शब्द उभरने लगा -"मृणाल !"

भानु पीछे हट गया "मृणाल..."उसने धीरे से नाम दोहराया।

कमरे के बाहर अचानक किसी के कदमों की आहट सुनाई दी ,दोनों ने एक साथ दरवाज़े की ओर देखा।ठक... ठक...

फिर एक महिला की बहुत धीमी आवाज़ आई—मोहिनी !"

मोहिनी के  चेहरे का भाव बदल गया ,ये आवाज़...उसे वो आवाज़ पहचान में आ रही थी।यह वही आवाज़ थी...जो उसे कई रातों से सपनों में बुलाती थी।दरवाज़े के बाहर से फिर फुसफुसाहट आई—"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था...और उसी क्षण...कमरे की सारी मोमबत्तियाँ एक साथ जल उठीं।

आईने पर आख़िरी शब्द उभरे—वह अभी भी तुम्हें देख रही है।मोहिनी ने भानु का हाथ कसकर पकड़ लिया लेकिन भानु की नज़र अब आईने पर नहीं...दरवाज़े के बाहर खड़ी उस परछाईं पर थी।

दरवाज़े के बाहर खड़ी परछाईं बिल्कुल स्थिर थी ,मोहिनी ने, भानु का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

कुछ क्षण पहले तक जो कमरा सिर्फ़ पुरानी चीज़ों और धूल से भरा हुआ लग रहा था, अब वही कमरा किसी जीवित रहस्य की तरह उनके सामने खड़ा था।दरवाज़े के बाहर से फिर वही आवाज़ आई ..मोहिनी ! इस बार आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे किसी ने उसके कान के बिल्कुल पास फुसफुसाया हो।

मोहिनी के शरीर में सिहरन दौड़ गई। भानु ने तलवार निकाल ली और चिल्लाते हुए बोला -"कौन है?"

बाहर से कोई उत्तर नहीं आया ,सिर्फ़...ठक... ठक...दो धीमे कदम ,फिर सन्नाटा !जैसे कोई वहां से धीरे -धीरे चला गया। 

भानु ने दरवाज़े की ओर बढ़ना चाहा किन्तु मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली -"नहीं ,तुम अभी नहीं जाओगे !

"क्यों?"

"क्योंकि उसकी नज़र आईने पर थी। वह परछाईं दरवाज़े के बाहर है...किन्तु अब आईने में नहीं।"

भानु रुक गया ,उसने तुरंत आईने की ओर देखा। वास्तव में...दरवाज़े के बाहर खड़ी आकृति कमरे के भीतर दिखाई देनी चाहिए थी, लेकिन आईने में केवल मोहिनी और भानु का प्रतिबिंब था और उनके बीच...वह छोटी बच्ची !वही सफेद कपड़े ,वही खुली हुई बालों की लटें और हाथ में वही पायल।

भानु धीरे से बोला—यह कैसे संभव हो सकता है ?

बच्ची ने आईने में अपना सिर उठाया ,उसकी आँखें सीधे मोहिनी पर थीं ,फिर उसने अपने होंठ हिलाए उसके होंठ तो हिल रहे थे किन्तु कोई आवाज़ नहीं आ रही थी ।

किन्तु उसके होठों के हिलने की प्रतिक्रिया से मोहिनी समझ गई ,वह कह रही थी—"पीछे देखो !"

मोहिनी ने धीरे-धीरे पीछे मुड़ने की कोशिश की किन्तु भानु ने उसका कंधा पकड़ लिया और बोला - मत मुड़ो !

"लेकिन—"

"अभी नहीं ,उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन आँखों में तनाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था,पहले आईने को देखते रहो।"

अचानक आईने की सतह पर 'चटाक 'के साथ हल्की दरार उभरी। मोहिनी घबराकर पीछे हट गई।दरार धीरे-धीरे बढ़ने लगी किन्तु शीशा नहीं टूटा ,बल्कि...उस दरार के पीछे कुछ दिखाई देने लगा।

एक पुराना कमरा ,जिसमें एक छोटी बच्ची बैठी थी,उसके सामने एक महिला घुटनों के बल बैठी थी।महिला का चेहरा स्पष्ट नहीं था लेकिन उसकी आवाज़ स्पष्ट थी,वो कह रही थी —"तुम्हें डरना नहीं है।"

बच्ची रोते हुए बोली—माँ...! मैं कहाँ जाऊँगी ?"

महिला ने उसे गले लगा लिया ,जहाँ तुम्हें कोई नहीं ढूँढ़ पाएगा ,लेकिन आप?"महिला की आँखों में आँसू आ गए ,मैं तुम्हें ढूँढ़ लूँगी।

 अचानक दृश्य बदल गया। दरवाज़े पर किसी ने ज़ोर से दस्तक दी ,किन्तु दरवाजा न खुलने पर उसने तेजी से दरवाज़े को ठोकर मारी ,धड़ाम ! की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुल गया। 

महिला ने, बच्ची को एक बड़े संदूक के पीछे छिपा दिया और उसे समझाया "किसी भी हालत में बाहर मत आना।"

बच्ची रोते हुए बोली—"माँ..."महिला ने उसके माथे को चूमा ,मेरी बात याद रखना ,अगर कभी कोई तुम्हें कहे -' कि तुम्हारा घर यही है तो उस पर भरोसा मत करना ,तभी वो दृश्य धुँधला हो गया।

मोहिनी ने घबराकर आईने को छूना चाहा ,भानु ने उसका हाथ रोक लिया -रुको ,मोहिनी !लेकिन तब तक देर हो चुकी थी ,उसकी उँगलियाँ शीशे से छू गईं थीं और उसी क्षण...एक तेज़ ठंडक उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।उसके सामने एक और दृश्य उभरा ,जिसमें इस बार...वह खुद थी।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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