जब शिल्पा से, उसके पति प्रवीण ने, उसकी सहेली का नाम और पता जानना चाहा ,तब घबराहट के कारण शिल्पा का दिल जैसे उछलकर बाहर आ जायेगा,उसने महसूस किया।
तब अपनी घबराहट को छिपाते हुए उसने ,अपने आपको संभाला और बोली - वो इसी विद्यालय में मिली थी ,बेचारी ! बड़ी परेशान थी , पति कुछ काम धंधा नहीं करता है, इसीलिए कहने लगी -दीदी ! मुझे बच्चों की फीस भरनी है ,इसीलिए थोड़ी मदद कर दीजिये !
क्यों ?झूठ बोल रही हो ,क्या उसे वेतन नहीं मिला होगा ?क्या उसके बच्चे ,तुम्हारे स्कूल में नहीं पढ़ रहे हैं ?
तब अपनी घबराहट को छिपाते हुए उसने ,अपने आपको संभाला और बोली - वो इसी विद्यालय में मिली थी, इस स्कूल में पढ़ा रही है किन्तु अपने बच्चे दूसरे स्कूल में भेज रही है।
ये क्या बात हुई ?
उसके बच्चों का दाख़िला दूसरे विद्यालय में पहले से ही था ,इसीलिए उनका इंतज़ाम तो करना ही होगा।
जब ऐसे स्कूलों में पढ़ाने की उनकी हैसियत नहीं है ,तो क्यों पढ़ा रही है ,तुमने वो कहावत तो सुनी ही होगी -''जेते पांव पसारिये ,जाकी लाम्बी सोर ''
हाँ ,जानती हूँ किन्तु अब तो पैसे दे दिए ,आगे से ध्यान रखूंगी ,कल मिलकर उससे बात कर लूंगी ,कोशिश करूंगी, वो मेरे पैसे कल ही दे दे !
नहीं दिए तो... शिल्पा चुप रही , क्या मुसीबत है ? अपने पास पैसे होते हुए भी किसी के सामने हाथ फैलाने होंगे ,नाराज होकर वो करवट बदलकर लेट गया।
शिल्पा का मन भी खिन्न हो गया ,सोच रही थी -मैंने भी न जाने क्या सोचकर मुसीबत मोल ले ली ?कल स्कूल जाते ही ,सबसे पहले चतुर से पैसों के विषय में ही बात करूंगी। यदि प्रवीण को पता चल गया तो... यह सोचकर उसकी रूह जैसे काँप उठी।
अभी तो वो एक सभ्य परिवार की माँ ,पत्नी, बहु बनकर सुकून का जीवन जी रही थी। उसी की आड़ में उसने चतुर के विद्यालय में नौकरी की और उसके क़रीब भी आ गयी। मुझे यहाँ भी क्या परेशानी थी ? जो मैंने बैठे -बिठाये ये विष अपने जीवन में घोल लिया।
आज शिल्पा ,जब अपनी ज़िंदगी के बिषय में सोच रही है ,तो उसे अपनी हरक़तों पर अफ़सोस ही हो रहा है। क्यों ? मैं अपने घर का झगड़ा किसी बाहरवाले के सामने लेकर गयी ?उसकी चिकनी -चुपड़ी बातों में आकर अपने चरित्र को भी नीचे गिरा दिया। मेरे उन्हीं भावुक पलों का उसने लाभ उठाया।
अब ये सभी विचार शिल्पा को तभी से आ रहे हैं ,जब से उसने चतुर को पैसे तो दिए ,किन्तु चतुर के व्यवहार में उसके प्रति कोई ज्यादा सम्मान या अपनापन दिखलाई नहीं दे रहा था। उसी का विश्वास जीतने के लिए ही तो उसने, अपने पति से छल किया ,किन्तु अब उसे लगता है ,वही छली गयी है। सोचते -सोचते न जाने उसे कब नींद आ गयी ?
अगले दिन तैयार होकर जब घर से निकल ही रही थी ,उसे प्रवीण ने रोककर कहा -आज अपनी सहेली से बात कर लेना।
हाँ ,हाँ मुझे याद है ,कहकर वो शीघ्र ही विद्यालय के लिए निकली। विद्यालय में प्रवेश करते ही ,उसे सामने चतुर दिखलाई दिया। अभिवादन करने के पश्चात ,चतुर से बोली -सर !मुझे आपसे कुछ आवश्यक बात करनी है।
चतुर ने, उससे कुछ नहीं कहा और बोला -आप अपना काम सम्भालिये ! मैं अभी आता हूँ। शिल्पा अपने कक्ष में पहुंची और चतुर की प्रतीक्षा करने लगी। अन्य शिक्षिकाएं भी आने लगीं ,किन्तु चतुर न आया।
शिल्पा ने अन्य अध्यपिकाओं और बच्चों से पूछा -सर !को कहीं देखा है।
बाहर देखा था ,अब तो कहीं नहीं दिख रहे।
शिल्पा को बेचैनी होने लगी ,न जाने सर ,कहाँ गए हैं ? जबकि मैंने, उनसे कहा था ,कि मुझे कोई जरूरी बात करनी है।
छुट्टी का समय हो गया किन्तु चतुर कहीं भी दिखलाई नहीं दे रहा था ,किससे पूछूं ? परेशान होते हुए उसके घर की तरफ बढ़ गयी। कस्तूरी से पूछा ,आज सर !कहीं दिखलाई नहीं दे रहे ,कहाँ गए हैं ?
वो क्या मुझे बताकर जाते हैं ?कहते हुए कस्तूरी ने मुँह बनाया ,तब बोली -कल भी परेशान दिख रहे थे।
क्यों ?क्या हुआ ?
मुझे लगता है ,शायद पैसों का प्रबंध करने गए थे ,जहाँ से पैसे मिलने थे ,शायद ,मिले नहीं ,उन्हें भी तो परेशानी होती होगी ,आपके पैसे भी वापस करने हैं।
यह सुनकर शिल्पा को सुकून मिला ,किन्तु उसे तो आज ही पैसे चाहिए थे ,सोचकर मन विचलित हो गया। हो सकता है ,कहीं से पैसों का प्रबंध करने ही गए हों किन्तु मुझे ,प्रवीण को भी तो जबाब देना है। क्यों मैं व्यर्थ में यहाँ आकर फंस गयी। किसी के मन में मेरे लिए कोई भाव नहीं है। मुझे ही क्या जरूरत पड़ी थी ?कि उनका वेतन समय पर मिले।
तब उसने अपनी एक सहेली को फोन किया ,और उससे पूछती है - क्या तुम्हारे पास कुछ पैसे पड़े होंगे ?
क्यों ?तुझे क्यों पैसों की जरूरत पड़ने लगी ,क्या जीजू ने पैसे देने से इंकार कर दिया ?
मुझे जरूरत है ,उनकी तो मैं बात ही नहीं कर रही ,मुझे चाहिए।
देख !मैं नहीं जानती ,तुझे क्या आवश्यकता आन पड़ी ? किन्तु मैं भी मजबूर हूँ , उसकी सहेली ने तुरंत इनकार कर दिया।
देख ले, यार ! शिल्पा गिड़गिड़ाई।
अच्छा ,बता ! कितने पैसों की आवश्यकता है ? कम से कम तीस हज़ार !
तीस हज़ार .... उसने वाक्य दोहराये !अचानक जैसे उसे कुछ याद आया बोली -तू ,तो नौकरी कर रही है फिर ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी ?
क्या बताऊं ?सारी बातें अभी पूछ लेगी ,पहले तू ये बता ! तू ,पैसे दे सकती है या नहीं नाराज़ होते हुए शिल्पा बोली।
अच्छा ,इतने तो मेरे पास भी नहीं होंगे, दस या पंद्रह करके दे सकती हूँ।
शिल्पा को थोड़ा सुकून मिला ,तब बोली - किसी और से पूछकर देख ले ,पूरे तीस हो जाएँ तो अच्छा रहेगा।
नहीं ,इतने तो नहीं हो पाएंगे ,अब इतने से ही काम चला ले।
ठीक है ,मैं लेने आ जाउंगी।
आना क्यों है ?मैं ऑनलाइन भेज देती हूँ।
इससे पहले कि शिल्पा कुछ और कहती ,तब तक उसने पैसे भेज दिए थे।
शिल्पा अपनी दोस्त तन्वी से पैसे उधार मांग रही थी और सोच रही थी - कि मैं अपने पति से कह दूंगी कि ये पैसे मैंने, उससे वापस लिए हैं।बाक़ी भी दो -एक दिन में दे देगी। वो यह तो नहीं बता सकती थी ,कि उसने अपने पैसे स्कूल के वेतन के लिए चतुर को दिए हैं । प्रवीण को ये पता चला,तो घर में बहुत बड़ा झगड़ा हो जाएगा। वो पूछेगा -'जब तुम्हें समय पर वेतन नहीं मिल रहा , फिर तुम नौकरी किस बात की कर रही हो ? उसे पैसे भी दे रही हो और उसका काम भी कर रही हो। तुम्हें, उससे इतनी हमदर्दी क्यों है ?' तभी यह प्रश्न , उसने अपने आप से भी पूछा, ''मैं यह सब क्यों कर रही हूं ?''
चतुर की चाहत में ,वो मेरे लिए अपना परिवार तो नहीं छोड़ रहा ,ये प्यार है ,या छलावा ! यदि इन्हें पता चल गया तो बहुत नाराज होंगे और मेरा स्कूल भी छुड़वा देंगे। आज तो उसे लग रहा था -न जाने, उसने क्या मुसीबत मोल ले ली है ?आज लग रहा था ,ऐसे रिश्ते कभी सफ़ल नहीं होते। तब मैंने ही प्रवीण के साथ छल क्यों किया ?
तब उसने, कुछ दूर जाकर चतुर को भी फोन किया और उससे भी पूछा - अब तो आपके कुछ बच्चों की फीस आ गई होगी ,कुछ पैसे इकट्ठे हुए हों तो मुझे दे दीजिए ?मुझे बहुत जरूरत है।
हमारी कहानी का 'रसिया' यानि 'चतुर भार्गव' का क्या जब होगा ?क्या शिल्पा अपनी परेशानियों से उबर पायेगी ?आइये आगे बढ़ते हैं।
