Woh din

 बचपन के वो दिन, 

 छुप-छुपकर मम्मी की साड़ी बांध लेना। 

अपने को,आईने में देख, कर इठलाना।

आईने से घंटों छुप-छुपकर बातें बनाना। 

आँखों में काज़ल लगा ,खुद पर रीझ जाना।

  



विभिन्न भावभंगिमाओं पर मुग्ध हो जाना। 

कभी-कभी मम्मी की , लिपस्टिक लगाना। 

 कभी माथे पर ''बिंदी ''लगाकर शर्माना। 

कोई देख तो नहीं रहा,घबराकर मुस्कुराना। 


साड़ी के पल्लू को,लहराकर हवा में उड़ाना। 

अपनी ही दोस्त बन , अपने आपसे पूछना। 

मेहँदी के बेल बूंटों में, जीवन के रंग सजाना।

हाथों की लक़ीरों से ,अपनी तक़दीर चुराना।

 

एक कल्पना,जिसका उसके इर्द गिर्द मंडराना। 

ख़्यालों में उससे बातें कर मुलाक़ात कर आना। 

उसकी छवि बना,उससे मीठी मीठीबातें बनाना। 

 बिटिया !जवान हो रही ,माँ का अंदाजा लगाना।

 


वो लडक़पन के दिन ,बालपन के दिन कहाँ खो गए ?

अभी तो उम्र सम्भली ही नहीं, कुछ जाना ही नहीं 

 वो उमंगें  !वो सपने ! आज न जाने कहां खो गए ? 

हाथों में चूड़ी हैं ,माथे पर लगी है,' बिंदी 'का पता नहीं। 

आईने से कब भेंट हुई ? नजरें मिलाने का समय  नहीं।

उलझे केशों, बेपरवाह लटों को सुलझाने की फुर्सत नहीं। 

कब पल्लू लहराया ? कब उड़ान भरी ?अब याद ही नहीं। 

बढे नाख़ून सजाना, समय है ,कि मिलता नहीं। 

नाखून कपड़े धोते टूटे, या बर्तन !पता नहीं। 

जीवन की उलझनों में,कब सुकून से सोई थी ?

बेपरवाह सी ज़िंदगी ,कब नजरंदाज हो गयी ?पता नहीं। 

 ज़िम्मेदारियों तले कब पापा की परी खो गयी ?पता नहीं।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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