श्याम ,केतकी को बताता है -मैंने ,तुम्हें,तुम्हारे भाई के विवाह में देखा था। तब केतकी कहती है - अच्छा ! वहां तो और भी लड़कियां थीं ,फिर तुम, मुझसे ही क्यों मिलना चाहते हो ?
सोचने का अभिनय करते हुए श्याम ने कहा -अच्छा ,किन्तु मुझे तो तुम ही दिख रहीं थीं। अच्छा ,ये सब छोडो ! तुम ये खेती-बाड़ी का काम कब से कर रही हो ?
मैं और खेती !मैं भला खेती क्यों करूंगी ?हकलाते हुए केतकी ने पूछा।
अच्छा ,मुझे तुम अब और मूर्ख नहीं बना सकतीं ,तुम्हारी आवाज सुनकर मैं तो पहले ही समझ गया था ,तुम वही खेत वाली लड़की हो। अब तुम बताओगी, मुझे दो दिनों से क्यों मूर्ख बना रहीं थीं ?चेहरे पर कपड़ा ढ़क लेने से क्या पहचान छुप जाती है ?
नहीं, मैंने कोई मूर्ख नहीं बनाया ,गांव के सभी लोग मुझे जानते हैं ,तभी तो मुझे अपने पापा की' बेटी 'नहीं 'बेटा' कहते हैं। मैंने अपना चेहरा तुम्हें देखकर नहीं ढ़का ,मैं पहले से ही ऐसे चेहरे पर कपड़ा लपेटकर काम करती हूँ। तुम पहचाने या न पहचाने ये मेरी गलती नहीं।
मैं कब कह रहा हूँ ? तुम्हारी गलती है, किन्तु मुझे आश्चर्य हो रहा है ,जिस कार्य को करते पुरुष भी कठिन कार्य समझते हैं ,तुम अपनी इच्छा से कर रही हो। तुम तो ट्रैक्टर भी अच्छे से चला लेती हो।
काम को सीखने और करने की लग्न होनी चाहिए ,कोई भी काम कठिन नहीं है।
अच्छा ,उसकी बातें सुनकर श्याम को बड़ा अच्छा लग रहा था ,वो एक परिश्रमी और सुलझी हुई लड़की से बात कर रहा था।
तब बोला - जो लड़कियां घरों में बैठी रहती हैं ,खाना पकाती हैं ,सिलाई -कढ़ाई सिखती हैं ,तुम उन सबसे अलग कार्य कर रही हो।
हां, मैं अपनी मर्जी से ही कार्य करती हूं ,केतकी ने जवाब दिया।
तब श्याम ने पूछा - तुम, कितना पढ़ी हो ?
मेरी पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं, काम में मन लगता है ,वैसे मैंने छठी पास किया है। जो काम हम पढ़कर भी नहीं सीख़ सकते ,वो करने से सीख़ जाते हैं। अब तुम ही बताओ ! क्या तुम अपनी क़िताब से ट्रैक्टर चलाना सीख सकते हो ,उसके लिए तुम्हें ,उसे चलाना सीखना होगा। मैं मानती हूँ ,क़िताबी ज्ञान हमारे बहुत काम आता है किन्तु काम तो सीखना पड़ता है।
तुम्हारा मतलब है ,तुम प्रैक्टिक्ल में विश्वास करती हो।
कुछ भी समझ लो !
तुम समझ गयीं ,मैंने क्या कहा ?
क्यों नहीं ? मेरा परिवार पढ़ा -लिखा है ,मेरे तीनो भाई पढ़े हुए हैं ,जब वो आपस में बात करते हैं ,तो ये छोटी -मोटी अंग्रेजी की बातें समझ में तो आ ही जाती हैं। अचानक केतकी ने क्रोध में आने जैसा चेहरा बनाया और बोली - क्या तुमने, मुझे यहाँ मेरी पढ़ाई पूछने के लिए बुलाया है ?
नहीं, मैं तो बस ऐसे ही, तुम्हें एक नजर देखना चाहता था।
अब देख लिया ,अब मैं चली ,कहते हुए जैसे ही आगे बढ़ती है ,तब श्याम ने पूछा -अच्छा ,ये तो बताओ !फिर कब मिलने आओगी ?
मैं, तुमसे, मिलने क्यों आउंगी ? मेरे पास बहुत काम है।
जानता हूँ ,तुम बहुत व्यस्त हो किन्तु अपने इस भक्त के लिए ,थोड़ा सा समय तो निकाल ही सकती हो।
तुम मेरे भक्त कब से हो गए ?
जब से तुम्हें देखा है ,तभी से भक्त हो गया।
तब देवी की पूजा करते रहो !जब देवी प्रसन्न होगी तो आशीर्वाद मिला जायेगा।
देवी कब प्रसन्न होगी ?
पूजा करनी आरंभ नहीं की और फल की प्राप्ति की इच्छा करते हो।
तब क्या मैं पूछ सकता हूँ ?देवी की पूजा किस तरह से करनी होगी ? ताकि वो शीघ्र ही प्रसन्न हो सके।
निस्वार्थ भाव से ,देवी के दर्शन करने आते रहिये !जब देवी को लगेगा ,भक्त को आशीर्वाद देना है तो देवी अपने आप प्रसन्न हो जाएगी।
आशीर्वाद में मुझे मेरा इच्छित वरदान मिलना चाहिए।
केतकी को लगा ,अब ये बातचीत काफी लम्बी हो गयी है और ये बहस जरूरत से ज्यादा न बढ़ जाये। किसी ने देख लिया तो अच्छा नहीं होगा। तब वार्तालाप को अंतिम रूप देते हुए बोली - पहले वो दिन आने तो दो ! कहते हुए ,आगे बढ़ गयी। श्याम उसे जाते हुए देखता रहा ,जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी।
आज केतकी न जाने क्यों खिली -खिली सी लग रही है ,उसके पैरों में विद्युत सी, चंचलता आ गयी थी जबकि वो ये सभी कार्य बरसों से कर रही है ।
लड़के ने देखा, कि कोई उधर ही आ रहा है ,तो वह भी वहां से चलता बना।
केतकी मन ही मन अपने और श्याम के मध्य हुई बातचीत को स्मरण कर मुस्कुरा उठती। आज उसने माँ से अपनी चोटी बनाने के लिए नहीं कहा, बल्कि स्वयं आईने के सामने जाकर गहराई से अपने चेहरे को देखने लगी। ऐसा मुझमें क्या है ?अपने को निहारा और मुस्कुरा दी। आज उसे अपने आप पर प्यार आ रहा था। आइना छोटा था ,तब उसने उसे किसी ऊँची जगह पर रखा ,जिसमें उसका चेहरा उसे ठीक से दिखलाई दे सके। तब कंघा लेकर स्वयं ही अपने बाल बनाने लगी। तभी उसे चलचित्र के वो दृश्य स्मरण हो आये ,जिनमें अभिनेत्री बड़े ही क़रीने से अपने केशों को सजाती है। तब केतकी अपने बालों को सुलझाकर तरह -तरह से बनाकर देखने लगी।
केतकी की ये हरक़तें,माँ से छुपी न रह सकीं ,मन ही मन सोच रहीं थीं ,न जाने ,आज इसे क्या हुआ है ? अब तक तो घर आकर मुझसे ही चोटी बनवाती थी ,वरना ऐसे ही घूमती रहती थी। तब सोचा ,अब बड़ी हो रही है ,अपनी किसी सहेली को देख लिया होगा। यह सोचकर अपने काम में व्यस्त हो गयीं। उनका ध्यान जब भंग हुआ। जब उन्हें अपने बेटों की हंसी सुनाई दी और केतकी के झगड़ने की आवाज आई।
जब वो बच्चों के पास अंदर गयीं तो देखा ,आज केतकी ने बाल उठाकर ,एक 'पोनी टेल 'बनाई है और कुछ लटें कानों पर भी निकाली हैं ,उसकी इसी केश सज्जा को देखकर दोनों भाई हंस रहे थे और उसे भूतनी कहकर चिढ़ा रहे थे। उन्होंने केतकी की तरफ देखा ,अच्छी लग रही थी किन्तु हम सभी को तो उसे दो गुथी हुई चोटियों में देखने की आदत थी ,इसीलिए कुछ अलग लग रही थी।
चिंतामणि बेटी के इस फैशन पर रीझ गयी ,मुस्कुराते हुए ,दोनों लड़कों से पूछा -तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ?
मम्मी !देखा नहीं ,आज ये कैसी लग रही है ?कहकर दोनों हंसने लगे।
वो , केतकी के क़रीब गयीं ,जो उनके व्यवहार के कारण मुँह फुलाये बैठी थी ,उसे देखकर बोलीं -अच्छी तो लग रही है ?इसमें बुराई क्या है ?कम से कम आज अपने आपसे ,इसने बाल तो बनाये।
