Kiski dulhan [part 24]

जिस दीवार के पीछे मोहिनी छिपी हुई ,खड़ी थी ,तभी उन दोनों  नकाबपोशों ने ,उसी दीवार पर हथौड़ा मारा अबकि बार वो अनजान रहस्य्मयी महिला घबरा गयी और जोर से चिल्लाई -भागो !

उधर मोहिनी ,उस अनजान काले कपड़ों वाले नकाबपोश के साथ मिलकर वहां का एक रहस्यमई मार्ग खोल देती है ,जहाँ पर उसे सीढ़ियां नजर आ रहीं थीं। मोहिनी अभी सोच ही रही थी। तभी....

धड़ाम! पत्थर का भारी हिस्सा टूटकर भीतर की तरफ आ गिरा। धूल का घना गुबार पूरे कमरे

में फैल गया।

बाहर खड़े दोनों नकाबपोशों ने,फुर्ती से अपने हाथों की मशालें ऊँची कर लीं।"दीवार के पीछे कोई है!"एक ने चिल्लाकर कहा -"जल्दी! दूसरी तरफ़ से रास्ता बंद करो!"

दीवार के पीछे से रहस्यमयी महिला ने मोहिनी  हाथ पकड़कर उसे पीछे धकेला और बोली -"भागो!"

मोहिनी  अभी भी स्तब्ध खड़ी थी ,उसे उस महिला की चिंता भी हुई और उसने पूछा -लेकिन आप—"

"तुम मेरी चिंता मत करो!"तुमसे जो कहा गया है ,वही करो ! अब महिला की आवाज़ पहली बार आदेश जैसी थी ,अगर तुम रुकीं ......तो पिछले पच्चीस सालों  की सारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी।"

मोहिनी  कुछ समझ नहीं पा रही थी ,"पच्चीस साल?""क्या ये  इतने वर्षों से मेरा इंतज़ार कर रही  हैं ?"उसके मन में अनगिनत सवाल उठे, लेकिन पूछने का समय नहीं था।काले कपड़े वाला अजनबी पहले ही संकरी सीढ़ियों से होते हुए नीचे जा चुका था।

उसने नीचे से ही धीरे से कहा—"जल्दी करो ! वे लोग, ज़्यादा देर नहीं रुकेंगे!"

मोहिनी ने, एक बार फिर पीछे की तरफ देखा ,रहस्यमयी महिला जानबूझकर टूटी हुई दीवार के सामने आकर खड़ी हो गई और उसने पास रखी ,लकड़ी की भारी अलमारी को जोर से धक्का दिया। घर्र...!करते हुए अलमारी गिरकर दीवार के टूटे हिस्से के सामने आकर अटक गई।

नकाबपोशों ने उस महिला को घूरकर देखा ,वे जानते थे -ये सब इसने जानबूझकर किया है ,ये चाहती है ,हम मोहिनी तक न पहुंच सकें ,हुआ भी ऐसा ही कुछ समय के लिए उनका रास्ता रुक गया।

तब एक चिल्लाते हुए बोला इसे हटाओ !दूसरे ने काफी जोर लगाया किन्तु पत्थरों के कारण वो अलमारी नहीं खिसक पा रही थी ,तब क्रोध से दूसरा चिल्लाया -"तोड़ो इसे!"

तब लोहे का हथौड़ा , पत्थर और लकड़ी उस अलमारी पर बरसाने लगे।

मोहिनी मजबूर होकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी। करीब बीस सीढ़ियाँ नीचे उतरने के पश्चात  वह एक संकरी सुरंग में पहुँची गयी। यह सुरंग बाकी अन्य सभी सुरंगों से अलग थी।यहाँ की दीवारें चिकने काले पत्थर की बनी हुईं थीं। छत पर छोटी-छोटी हवा के लिए  खिड़कियाँ थीं, जिनसे हल्की ठंडी हवा आ रही थी।

सबसे अजीब बात...यहाँ धूल बिल्कुल नहीं थी,ऐसा लग रहा था -जैसे कोई इस रास्ते का नियमित उपयोग करता हो। मोहिनी  ने धीमे स्वर में उस काले वस्त्रों वाले नक़ाबपोश से पूछा—"तुम कौन हो?"

काले कपड़े वाले आदमी ने चलते-चलते उत्तर दिया—"अगर मैंने अभी अपना नाम बता दिया......तो तुम मुझ पर भरोसा नहीं करोगी और अगर नहीं बताया......तो भी नहीं करोगी।"

उसकी बात सुनकर मोहिनी कुछ पल चुप रही ,फिर बोली—" कम से कम यह तो बता ही सकते हो , कि तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो?"

उसने नक़ाब पहना हुआ था फिर भी महसूस हुआ ,वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला -"क्योंकि...""...कभी किसी ने मेरी भी मदद की थी।"

उधर...'सभा कक्ष' में भानु  का धैर्य टूट चुका था ,उसने रत्न प्रताप की ओर देखा और बोला -"बस बहुत हुआ ,यहाँ हर कोई आधी -अधूरी बातें कर रहा है ,अब मैं किसी की अनुमति की प्रतीक्षा नहीं करूँगा।"वह तेज़ी से उसी दिशा में दौड़ा, जहाँ से उसे मोहिनी के गायब होने का अंदाज़ा था।

विक्रम ने उसे रोकने का प्रयास किया -"विराज!"लेकिन इस बार वह नहीं रुका।

रत्न प्रताप  ने विक्रम की ओर देखा और बोला -"उसे जाने दो !अब वो नहीं रुकेगा। 

विक्रम ने आश्चर्य से पूछा—ये तुम कह रहे हो ,क्या तुम जानते हो ,वह किस तरफ़ जा रहा है?"

रत्न प्रताप ने गंभीर स्वर में कहा—"हाँ"और अगर मेरी आशंका सही है.....तो आज पहली बार कोई राजवीर परिवार का सदस्य 'तीसरी सुरंग' में प्रवेश करेगा।"

'सभा कक्ष 'का नेता यह सुनकर अचानक से सतर्क हो गया।तभी उसने तेज़ आवाज़ में अपने साथियों को आदेश दिया—"उसे रोको! वह तीसरी सुरंग तक नहीं पहुँचना चाहिए !उसकी आज्ञा मिलते ही सातों नकाबपोश अलग-अलग दिशाओं में दौड़ पड़े।

उधर...मोहिनी और वो अजनबी सुरंग में लगातार आगे बढ़ते जा  रहे थे। कुछ दूर जाकर रास्ता अचानक तीन भागों में बँट गया।

पहले रास्ते पर पत्थर की पट्टिका लगी थी—"उत्तर मार्ग"

दूसरे पर—"पुराना जलमार्ग"

और तीसरे पर कोई नाम नहीं था ,सिर्फ़ एक उकेरा हुआ प्रतीक...एक आँख...जिसके चारों ओर आठ वृत्त बने थे।

मोहिनी ने पूछा—"हमें किस रास्ते जाना है?"

अजनबी बिना रुके तीसरे रास्ते की ओर बढ़ गया,"यह रास्ता सही रहेगा। 

किन्तु  इस मार्ग पर  तो कोई नाम ही नहीं लिखा ?"

वह कुछ क्षण चुप रहा ,फिर बोला—"क्योंकि..जिस रास्ते का नाम हर किसी को पता हो..वह कभी गुप्त नहीं रह सकता।"

जैसे ही दोनों तीसरे रास्ते में दाखिल हुए...सुरंग का वातावरण एकदम बदल गया ,यहाँ की हवा और ठंडी थी।दीवारों पर पुराने दीपक लगे थे, लेकिन उनमें प्रकाश  नहीं था ,फिर भी पूरा रास्ता हल्की नीली रोशनी से जगमगा रहा था।

मोहिनी  ने गौर किया कि यह रोशनी दीवारों में जड़े छोटे-छोटे नीले खनिजों से निकल रही थी।चलते-चलते उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी।धूल पर सिर्फ़ दो तरह के पदचिह्न दिखलाई दे रहे थे।एक...उसी अजनबी के ,दूसरे...किसी अन्य महिला के ,लेकिन उन पदचिह्नों के ऊपर कहीं भी नकाबपोशों के चिह्न नहीं थे।उसने अंदाजा लगाया ,इसका मतलब...यह रास्ता उनसे छिपा हुआ था।

कुछ देर बाद सुरंग एक विशाल गोल कक्ष में खुली मोहिनी वहाँ पहुँचते ही, ठिठक गई।कमरे की छत गुंबदनुमा थी ,बीच में पत्थर का गोल चबूतरा बना था।उस पर एक पुराना पीतल का दीपक रखा था, जो बिना तेल के जल रहा था ,चबूतरे के चारों ओर आठ पत्थर के स्तंभ खड़े थे ,हर स्तंभ पर एक नाम उकेरा गया था।

लेकिन समय की मार से वे सातों नाम लगभग मिट चुके थे।सिर्फ़ एक नाम अब भी साफ़ पढ़ा जा सकता था—"आर्यव्रत"

मोहिनी  ने धीरे से वह नाम दोहराया—"आर्यव्रत.."यह कौन है?"

अजनबी का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया ,उसने उत्तर देने के बजाय चबूतरे पर रखा दीपक बुझा दिया।पूरा कक्ष अंधेरे में डूब गया।अगले ही पल...दीवारों पर दर्जनों छोटे-छोटे सितारों जैसी रोशनियाँ चमक उठीं।और उन रोशनियों ने मिलकर...हवेली के नीचे बनी सभी गुप्त सुरंगों का एक विशाल नक्शा बना दिया।

मोहिनी आश्चर्य से उस मानचित्र को देखती रह गई ,लेकिन उसी क्षण...उस नक्शे में एक लाल बिंदु अचानक चमकने लगा।अजनबी ने उसे देखते ही धीरे से कहा—"वे आ गए..."

मोहिनी  ने घबराकर पूछा—"कौन?"

अजनबी ने पहली बार उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—भानु..और उसके पीछे पूरी'' रक्षक मंडली।"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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