सावन का महीना आ गया ,बेटियों में इन दिनों में कितना उत्साह रहता है ? प्रसन्न होती हैं ,मायके से भाई सिंधारा लेकर आएगा। माँ कुछ सामान के रूप में अपनी बिटिया रानी के लिए ,अपना सम्पूर्ण प्यार उड़ेल देगी। उसके जीवन की खुशहाली की तमन्ना में ,उसके लिए शृंगार का सामान भेज ,अपनी बेटी को ताउम्र सुहागन रहने की दुआएं भेजती है। इससे उसका मनोबल बढ़ता है। इन अनजान लोगों के मध्य [ ससुराल में ]मैं अकेली नहीं हूँ ,मेरे अपने, मेरे पास नहीं तो क्या हुआ ? मेरे साथ तो हैं। बड़ी आशाएं लिए ,'रक्षा बंधन ''पर भाई की प्रतीक्षा करती हैं । हर दिन कलेंडर देख ,सोचती हैं ,अभी दस दिन बाक़ी हैं ,अभी आठ दिन बाक़ी हैं। एक -एक पल इंतजार का रहता ,किन्तु किसी से कुछ नहीं कहती। इस बीच वो 'राखी ''की तैयारी करती है।
जगह-जगह दुकानों पर घूम -घूमकर अपने भाई की कलाई के लिए एक विशेष 'राखी 'चाहती है ,जो वो अपने भाई को बांधकर खुश हो। दुकानों पर रंग -बिरंगी ढेर सारी राखियां होती हैं किन्तु उन राखियों में भी कुछ अलग से ढूँढना चाहती है। नीति भी तो अपने पिता की ऐसी ही लाड़ली बिटिया है किन्तु जैसे ही सावन आता है ,उसके मन में हिलौर उठने की बजाय, अजीब सी बेचैनी और घबराहट होती है। मेरा भाई आएगा या नहीं ,मेरा सिंधारा लाएगा या नहीं।
जब उसका विवाह हुआ था ,कुछ ही दिनों पश्चात ,उसे अपने ससुराल वालों का व्यवहार मालूम चलने लगा। सास के ताने ,ननद की चुगलियां ,जेठानी की अकड़ ,सभी बर्दाश्त किया। काम करने के पश्चात भी उसे सुकून नहीं मिलता था। तब भी कुछ न कुछ सुनने को मिल जाता। तेरी माँ को अक़्ल नहीं ,बेटियों को कैसे लिया दिया जाता है ? तेरा बाप तो खूब बात बनावे था। बस ये दिया और तू ''मुँह उठाकर चली आई। ''
नीति उनकी बातें सुनती और सोचती -मेरे पापा ऐसे तो नहीं हैं ,उन्हें अपनी बेटी की परवाह है। अभी थोड़ा परेशानी में है। कभी -कभी फोन करके कहती -पापा ! यहां मेरा मन नहीं लग रहा ,मुझे बुला लो !
बेटा !ससुराल में थोड़ा सहन करना पड़ता है ,अब वो ही तुम्हारा घर है ,वहीं निबाह करना होगा। वो जानती थी ,ये सब मेरे माता -पिता के बहाने हैं ,मुझे न बुलाने के ,क्योंकि जब यहां वापस आउंगी तो उन्हें कुछ न कुछ तो देना पड़ेगा।
एक बार तो मेरी सास ने मेरे भाइयों पर ही इल्ज़ाम लगा दिया था। जब वो ''रक्षा बंधन ''पर राखी बंधवाने आये थे। पचास रूपये देखकर उनका माथा ठनक गया। मेरी थाली में से पैसे ननद ने हटा लिए और जब भाई चले गए तो सास बोली -पचास रूपये दिए ,वे भी वापस ले गए।
नहीं, मम्मी जी !मैंने उन्हें कोई पैसे नहीं दिए ,घबराकर नीति बोली।
तब तो वे उन्हें चुराकर ले गए ,उन पचास रुपयों को दिखाकर हम पर एहसान करने आये थे ,इससे ज्यादा का तो खा गए।
उन दिन नीति ने सास से कहा -मेरे घरवाले चोर नहीं।
उल्टी जबान चला रही है ,कहते हुए सास ने थप्पड़ लगाए।
उस दिन सारा दिन रोते, परेशानी में बीता ,उस दिन सोचा -काश !मेरे पिता के पास पैसा होता ,फिर मन को समझाया -'कोई बात नहीं ,जब मेरे भाई क़ाबिल हो जायेंगे। तब मैं भी इनसे कह सकूंगी ,मेरे भाई चोर नहीं ,जब मेरे हाथ में पैसे थमाएंगे ,मेरे नेग लेकर आएंगे।'' तब इन्हें दिखला दूंगी। मेरे घरवाले कितने अच्छे हैं।
भाई का विवाह होते ही ,जैसे अब तो मैं और भी पराई हो गयी ,सोचा -भाभी तो ,मेरी विपदा समझेगी। ऐसा न हुआ। आज भी जब सावन आता है ,नजरें किसी उम्मीद में एकाएक कलेंडर पर चली ही जाती हैं। राखी कब है ? तीज कब है ? मन पुकार उठता था -पापा !अब तो मुझे बुला लो !न...
अब उन्हें लगता है ,क्यों आना है ,तेरी भाभी अपने घर जाएगी। हमारे घर में काम है ,यहाँ आकर क्या करेगी ?
अब नीति को लगता है -क्यों झूठी उम्मीदें लगानी ?उसके लिए वो घर तो, उसी दिन पराया हो गया था ,जब वो देहली त्याग दी थी। तब भी ,अब जब सावन आता है ,उसकी आंखें नम हो जाती हैं ,बच्चे बड़े हो गए ,ह्रदय चीत्कार कर उठता -पापा ! मुझे बुला लो !न....
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