अपनी परेशानियों से दूर ,नंदिनी अपनी नानी के घर चली जाती है किन्तु वहां जाकर भी उसको शांति नहीं मिली। घर में बैठी ,अपने बेटे के विषय में सोचती रहती ,ऐसे में वो भूल ही गयी थी कि यहाँ आकर उसकी मुलाक़ात दीपक से भी हुई थी। अपनी परेशानियों में ऐसी उलझी सबकुछ भूल गयी।
एक दिन बगीचे में ,अचानक उसे दीपक मिल गया ,तब दीपक से मिलकर उसे प्रसन्नता हुई और सोचने लगी -कम से कम ये तो मेरी भावनाओं को समझेगा। तब दीपक ने नंदिनी से पूछा -आखिर ये बहादुर लड़की उदास क्यों है ?
किस बात की बहादुरी ? मैं कोई बहादुर नहीं हूं , इस जिंदगी से संघर्ष करते-करते, 'मैं' थक गई हूं , कहते हुए उसने दीपक को, रोहन की सारी बातें बता दी, किस तरह से उसने, उसे ही नहीं ,अपने परिवार को भी 'धोखा' दिया ?
उसकी बातें सुनकर दीपक थोड़ा गंभीर हो गया। फिर बोला -न जाने, कैसे-कैसे लोग इस दुनिया में है ? किस पर विश्वास किया जाए और किस पर नहीं ? वैसे अब तुम क्या चाहती हो ?
मुझे उन लोगों से अपना बेटा वापस लेना है, मैं चाहती हूं कि मुझे मेरा बेटा वापस मिल जाए। एक पल के लिए भी नितिन को उस घर में रहने देना नहीं चाहती।
तब उनसे अपना बेटा वापस मांग लो ! इसमें क्या गलत है ? तुम्हारा बेटा है ,वह तुम्हें अवश्य वापस करेंगे।दीपक ने सहजता से कहा।
कहना बहुत आसान है। मैंने, उनसे अपना बेटा माँगा था किन्तु वापस ही तो नहीं कर रहे हैं। उसकी आंखें नम हो आईं , उन्होंने मुझे अपने घर से धक्के देकर बाहर कर दिया। मुझे ,मेरे बच्चे से मिलने तक भी नहीं दिया।
मैं समझ सकता हूं, वो, उनके बेटे की 'आखिरी निशानी' है ,उनका पोता है।
उनके पक्ष में दीपक को बोलते देखकर बोली - वो उनका पोता है ,और मेरा क्या ? मैं तो उसकी माँ हूँ। तुम्हें पता है ,वो लोग, उल्टे मुझ पर ही इल्जाम लगा रहे हैं, कि मैंने उनका घर बर्बाद कर दिया।
ऐसी परिस्थितियों मे ऐसे ही नकारात्मक विचार आते ही हैं। एक तरह से देखा जाए तो... उन्होंने भी तो कष्ट उठाए हैं और अभी भी ,उठा रहे हैं। अब इस उम्र में उनके दो बेटों का जीवन तो समाप्त ही समझो ! एक तो इस दुनिया में नहीं रहा और दूसरा जेल चला गया, न जाने उसकी कितने साल की सजा हो ? अफ़सोस जतलाते हुए दीपक बोला। अपने स्वार्थ से बढ़कर भी कुछ ऊंचा सोचो ! मैं समझ सकता हूं कि वह तुम्हारा बेटा है, किंतु वो उनके बेटे की निशानी भी तो है ,उनके ख़ानदान का 'आख़िरी चिराग़ ''
तुम्हें ,उनसे बड़ी सहानुभूति हो रही है, चिढ़ते हुए नंदिनी बोली - यही बातें तो पापा कह रहे थे, मुझे समझ नहीं आता, आप लोग मुझे, क्यों नहीं समझ पा रहे हैं ?मेरा दर्द क्यों नहीं दिखलाई देता ? छोटे बच्चे को पालना कितना कठिन होता है ?
वही तो मैं तुम्हें समझा रहा हूँ ,छोटे बच्चे को पालना कितना कठिन है ? अभी सम्पूर्ण घर की ज़िम्मेदारी का बोझ तुम्हारे पापा ही तो उठा रहे हैं। इस उम्र में वो लोग भी साहस कर रहे हैं।
उनका कैसा साहस ?उनके पास तो पैसा है।
अपने सभी सवालों के जबाब तो तुम्हारे ही पास हैं ,उनके पास पैसा है ,तब वो उस पैसे से जो सुविधाएँ तुम्हारे बेटे को दे सकते हैं ,क्या तुम्हारे पापा दे पाएंगे ? क्या उन पर और भार बढ़ाना उचित है।
दीपक की बातें सुनकर ,नंदिनी सोचने लगी ,तब दीपक आगे बोला - मैं, तुम्हें समझ रहा हूं, और मैं जानता हूं कि तुम अपने बेटे के लिए बेचैन हो। अब तुम ही सोचो ! अभी तुम कितनी परेशानियों से बाहर निकली हो। यह तुमने कितना बड़ा साहस का कार्य किया है ? जो प्रतीक के कातिल को ढूंढ निकाला ?
अभी तुम ,थोड़ा अपने आप को भी तो समय दो ! और उन लोगों को भी समझने दो ! जो कुछ भी हुआ है अच्छे के लिए ही हुआ है। हो सकता है, उनके विश्वास को और बड़ा 'धोखा' मिलता लेकिन अभी उन्हें यह बात पचाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही... और यह भी हो सकता है, वो लोग , इतने छोटे बच्चे को, इस उम्र में न संभाल पाएं और तुम्हारा बच्चा तुम्हें स्वतः ही वापस कर दें ! किंतु उन्हें थोड़ा समझने का मौका तो दो ! इतना तो वो लोग भी जानते हैं कि तुम उसकी मां हो, नितिन का पिता अब जिन्दा नहीं है।
तुम्हारे माता-पिता भी, तो यही चाहते हैं, कि उस बच्चे को, उसका परिवार मिल जाए क्योंकि एक कुंवारी लड़की कब तक,' बिन ब्याही मां 'बनी घूमती रहेगी ? यदि तुम उस बच्चे को ले भी आईं और लोग पूछेंगे ,-'ये किसका बच्चा है ? तब क्या जबाब दोगी ? अभिभावक अपनी इज्ज़त और सम्मान बचाने के लिए क्या कुछ नहीं करते ? तब तुम ही सोचो ! तुम ,उन्हें कितनी दुविधा में डाल दोगी ? वे किससे क्या कहेंगे ? यदि कुछ ऐसा -वैसा कह भी दिया -और वो तुम्हें वो सही नहीं लगा ,तब सोचा है ,क्या होगा ?
कई बार हम अपनी ही परेशानियों में इतना उलझ जाते हैं , सही और गलत को हम समझ नहीं पाते हैं और कई बार हमें ऐसी जिद होती है कि हम दूसरे को भी समझना नहीं चाहते, न ही उसे समझने देना चाहते हैं इसीलिए मैं कहता हूँ ,इन रिश्तों को थोड़ा सा समय दो ! और अपने आपको भी शांत करो ! जो भी होगा, सही होगा।
दीपक की बातें नंदिनी को धीरे-धीरे अंदर से शांत कर रही थीं । वह मन ही मन सोचने लगी - दीपक ,सही तो कह रहा है। सोचते हुए बोली -शायद ,तुम सही कह रहे हो ,मेरे इस तरह बेचैन या परेशान रहने से ,मेरा बच्चा मुझे नहीं मिलेगा।
बात को आगे न बढ़ाते हुए दीपक ने नंदिनी से पूछा - अब तुमने क्या सोचा है ?
किस विषय में ? मैं कुछ समझी नहीं।
अभी तुम शांत रहकर अपने लिए तो कुछ सोचोगी या नहीं ,आगे पढ़ाई जारी रखनी है या फिर नौकरी करनी है।
अब नंदिनी का मन शांत था ,तब मुस्कुराते हुए बोली -अब ये सलाह भी तुम्हीं दे दो ! मुझे अब क्या करना चाहिए ?
एक गहरी लम्बी साँस छोड़ते हुए मुस्कुराया और बोला - मेरा विचार तो यही है ,तुम एक कोर्स करो, जिससे आगे चलकर तुम्हें एक अच्छी नौकरी मिल सकती है।
और वो कोर्स कौन सा करना है ? ये भी बता दीजिये !
इसमें बताना क्या है ?आजकल तो बहुत कुछ 'ए.आई.'का बोलबाला है ,कल मैं सब देखकर बताता हूँ ,तुम्हारे लिए कौन -कौन से कोर्स उचित रहेंगे ?और कैसे और कब से आरम्भ करना है ?
धन्यवाद !आपका
-नहीं नहीं, धन्यवाद की कोई आवश्यकता नहीं।
