क़लम की रूह बन ,कोरे पन्नों पर खेलती।
ह्रदय के भावों को लपक शब्दों सी डोलती।
स्याही ,लाल हो या नीली ह्रदयंगम टटोलती।
बड़ी ही चतुराई से ,एक -एक गांठ खोलती।
रोके न रुक सकी ,बहती रही, श्वेत पन्नो पर।
लिखती रही ,न जाने कब तक भावों का शोर ?
उनींदे से चलती रही ,जब तक हो न गयी भोर !
पकड़ क़लम हाथ में ,चलता स्याही का ज़ोर।
हौले से, चुपके -चुपके भावों का बवाल उठा।
देख अनाचार,संसार में मन चीत्कार कर उठा।
उठा ,उठा भावों का खट्टा -मीठा सैलाब उठा।
स्याही डूबती भावनाएँ बोलीं -'अब क़लम उठा।'
अंतर्मन में बिखरे भावों को समेट हुआ विभोर।
स्याही का ,पन्नों के सिवा, और नहीं कोई ठौर।
डूब क़लम में मदमस्त हुई,मन में उठी हिलोर।
लेख़क उसके अधीन है,स्याही बनी' चित्तचोर।'
मन में उठी हिलोर ,तब' प्रेम ग्रंथ' रच डाला।
कभी खुद को ही नहीं ,ग़ैरों को भी रंग डाला।
कभी भावों संग बह' उपन्यास' लिख डाला।
भावों के हर रंग में डूब, जीवन लिख डाला।
