Syahi se ghuli bhavnayen

 क़लम की रूह बन ,कोरे पन्नों पर खेलती। 

ह्रदय के भावों को लपक शब्दों सी डोलती। 

स्याही ,लाल हो या नीली ह्रदयंगम टटोलती। 

बड़ी ही चतुराई से ,एक -एक गांठ खोलती।

 


रोके न रुक सकी ,बहती रही, श्वेत पन्नो पर। 

लिखती रही ,न जाने कब तक भावों का शोर ?

उनींदे से चलती रही ,जब तक हो न गयी भोर !

पकड़ क़लम हाथ में ,चलता स्याही का ज़ोर। 


हौले से, चुपके -चुपके भावों का बवाल उठा। 

देख अनाचार,संसार में मन चीत्कार कर उठा। 

उठा ,उठा भावों का खट्टा -मीठा सैलाब उठा। 

स्याही डूबती भावनाएँ बोलीं -'अब क़लम उठा।'


अंतर्मन में बिखरे भावों को समेट हुआ विभोर। 

स्याही का ,पन्नों के सिवा, और नहीं कोई ठौर। 

डूब क़लम में मदमस्त हुई,मन में उठी हिलोर। 

लेख़क उसके अधीन है,स्याही बनी' चित्तचोर।'


मन में उठी हिलोर ,तब' प्रेम ग्रंथ' रच डाला। 

कभी खुद को ही नहीं ,ग़ैरों को भी रंग डाला।

कभी भावों संग बह' उपन्यास' लिख डाला।  

भावों के हर रंग में डूब, जीवन लिख डाला।  


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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