चाबी के किनारे पर बहुत छोटे अक्षरों में कुछ खुदा हुआ था ,मोहिनी ने उसे खिड़की की रोशनी में ध्यान से देखा। उस पर लिखा था—"रात २ बजे ! मोहिनी की साँस जैसे अटक गई ,उसने चाबी को पलटकर देखा।दूसरी तरफ़ लिखा था—"अकेले आना।"
यह सब पढ़कर उसके हाथ काँपने लगे।"यह...सब तो पहले नहीं लिखा था ,ऐसा कैसे हो सकता है ? अपने आपको समझाने का प्रयास कर रही थी। जब से ये चाबी मेरे हाथ में आई है ,तब से ही मेरे पास है या फिर मैंने पहले इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था ? क्या सचमुच...यह लिखावट अब ही कैसे दिखाई दी ?
उसी समय बाहर हवेली की बड़ी घड़ी ने शाम के छह घंटे बजाए। दूर कहीं कौवे काँव-काँव करने लगे ,कौवों का इस तरह काँव -काँव करना उसे अज़ीब लगा। तभी उसके कमरे के बाहर किसी के कदमों की आहट उसे सुनाई दी।
मोहिनी ने जल्दी से चाबी छिपा ली ,दरवाज़ा खोला। बाहर उसके सामने भानु खड़ा था ,उसके हाथ में वही पुराना पीतल का बटन था, जो उसे बगीचे में मिला था।
उसने बिना कोई भूमिका बाँधे, कहा -"मुझे लगता है....तुम्हारे पास भी कोई ऐसी चीज़ है, जो इस हवेली के रहस्य से जुड़ी है।"मोहिनी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा ,इसे कैसे मालूम ?
वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही ,भानु ने आगे कहा,"आज रात...मैं दो बजे तक जागूँगा"क्योंकि मुझे पूर्ण विश्वास है..."..आज कोई न कोई इस हवेली से फिर गायब होने वाला है।
भानु की बातें सुनकर मोहिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि आज रात सिर्फ़ एक रहस्य नहीं खुलेगा...बल्कि उसके और भानु के मध्य विश्वास की पहली परीक्षा भी शुरू होगी।
रात धीरे-धीरे हवेली पर उतर आई थी। दिनभर मेहमानों की आवाजाही के पश्चात अब पूरा महल असामान्य रूप से शांत था। विशाल गलियारों में जलते पीले झूमर, दीवारों पर लंबी परछाइयाँ बना रहे थे। बाहर बस इतनी ही हवा थी ,वो हवा पुराने बरगद के पत्तों को हिला रही थी, जिनकी सरसराहट सुनसान हवेली को और भी रहस्यमयी बना रही थी।
मोहिनी अपने कमरे में अकेली बैठी हुई थी। उसके सामने मेज़ पर वही चाँदी की चाबी रखी थी।उसने उसे न जाने कितनी बार पलट-पलटकर देखा था ,एक तरफ़ अंक "२"। दूसरी तरफ़ बेहद महीन अक्षरों में—"रात २ बजे ! अकेले आना।"उसका मन बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा था -अगर यह किसी इंसान ने लिखा है...तो कब ?
और अगर यह पहले से ही लिखा गया था...तो उसे पहले क्यों नहीं दिखाई दिया? उसने एक गहरी साँस ली। नहीं... इसका कोई तर्क अवश्य होगा ,हालाँकि वह अंधविश्वास में विश्वास करने वालों में से नहीं थी।लेकिन पिछले दो दिनों में जो कुछ हुआ था, उसने उसके हर तर्क को चुनौती दे दी थी।
उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई ,मोहिनी ने गर्दन घुमाकर वहीं बैठे -बैठे पूछा -कौन ?
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ?यह रूद्र की आवाज़ थी ,उस आवाज ने उसके विचारों को छिन्न -भिन्न कर दिया।
मोहिनी, कुछ पल के लिए चुप रह गई ,आज मुझसे मिलने के लिए रूद्र ये केेसा व्यवहार कर रहा है ?जैसे मैं अज़नबी हूँ , फिर बोली -"हाँ..."दरवाज़ा खुला है, तुम आ सकते हो।
रूद्र कमरे में आया, उसे देखकर मोहिनी उठ खड़ी हुई ,वो उसके गले से लिपट जाना चाहती थी ,अपनी सभी परेशानियों को उससे बाँट लेना चाहती थी किन्तु अपने आपको नियंत्रित कर खड़ी रही। रूद्र के चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बता रहे थे, कि वह भी पूरी रात नहीं सोया था ,दोनों कुछ क्षण बिना कुछ बोले खड़े रहे।
कई बार शब्दों से ज़्यादा खामोशी बोलती है।आज भी वैसा ही था ,दोनों महीनों से एक -दूसरे को जानते हैं ,एक -दूसरे से प्यार करने लगे ,दो दिनों पहले तो उनकी शादी ही होने जा रही थी किन्तु अचानक ,उनके जीवन में ये कैसा भूचाल आया ? कहने को शायद शब्द ही नहीं रह गये थे। न ही मिलने की कोई ख़ुशी, न ही ग़म !सब कुछ जैसे ठहर सा गया।
आख़िरकार रूद्र ने पूछा -"तुम ठीक हो?"
मोहिनी हल्का-सा मुस्कुराई ,और शिकायत भरे लहज़े में पूछा -क्या सच में तुम्हें लगता है, कि मैं ठीक हो सकती हूँ?"
रूद्र के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था ,वह अपने को किसी भी परिस्थिति के लिए विवश पा रहा था। वह खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।बाहर अँधेरे में हवेली का पिछला हिस्सा उसे दिखलाई दे रहा था। ये वही हिस्सा था ,जहाँ भानु को रहस्यमय पैरों के निशान मिले थे।
"मोहिनी ..."उसने बिना उसकी ओर देखे कहा,"अगर परिवार तुम्हें किसी फैसले के लिए मजबूर करे....तो तुम मना कर देना।"
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और पूछा -तुम क्या करोगे ?
मैं अपना संभाल लूँगा ,जैसे कह रहा हो ,तुम मेरी फ़िक्र न करो।
"कैसे?"
रूद्र सिर्फ मुस्कुरा दिया लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी हुई थी ,हर लड़ाई जीतना ज़रूरी नहीं होता।'' कभी-कभी सिर्फ़ सही रहना ज़रूरी होता है।"
मोहिनी की आँखें भर आईं ,इसकी यही बातें उसे पहली बार रूद्र की ओर खींचकर लाई थीं ,उसका शांत स्वभाव।उसका दूसरों के लिए खुद को भूल जाना ,लेकिन आज...उसी स्वभाव की वजह से वह उसे खो रही थी।
तभी बाहर से किसी ने रूद्र को आवाज़ दी-"बड़े साहब...! वकील साहब आए हैं।"
रूद्र ने एक बार मोहिनी की ओर देखा ,विश्वास से बोला -तुम आराम करना ,किसी बात की फ़िक्र मत करना ,वह वापस मुड़ा और चला गया।
दरवाज़ा बंद होते ही मोहिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।उसका दिल कह रहा था कि सब कुछ छोड़कर रूद्र के साथ कहीं दूर चली जाए लेकिन दिमाग़ बार-बार उस चाबी की ओर जा रहा था। जैसे किसी अनजानी शक्ति ने उसे उस रहस्य से बाँध दिया हो।
उधर हवेली के दूसरे हिस्से में...भानु अपने कमरे में अकेला बैठा था ,उसके सामने मेज़ पर वही पीतल का बटन रखा था, जिस पर खुदा था—"तहखाना–2"
तभी उसने अपना लैपटॉप खोला ,'भानुशिला ' हवेली का पुराना नक्शा स्क्रीन पर था। उसने एक-एक हिस्से को ध्यान से देखा। मुख्य भवन !अतिथि गृह ! अस्तबल ! पुराना मंदिर ! तहखाना !लेकिन..."ये तहखाना–2" नाम का कोई हिस्सा नक्शे में नहीं था। वो अपने स्थान से उठा सिगार सुलगाते हुए ,उसने एक लम्बा गहरा कश लिया। धुएं के छल्लों में जैसे वो उस नक्शे को खोजने का प्रयास कर रहा था, कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। तहखाना २ कहाँ हो सकता है ? वह फिर से लैपटॉप की स्क्रीन पर नजर डालता है ,तब उसने सोचा ,या तो नक्शा अधूरा है...या फिर किसी ने जानबूझकर इसे छिपाया है।"
वह कुर्सी से उठा,उसने अपनी अलमारी खोली, जिसके अंदर एक छोटा-सा लोहे का डिब्बा रखा था।उसमें उसके बचपन की कुछ चीज़ें थीं—एक लकड़ी की सीटी ,एक पुरानी घड़ी और एक तस्वीर !तस्वीर में लगभग दस साल का भानु अपने बड़े भाई रूद्र के साथ मुस्कुरा रहा था। उसने तस्वीर हाथ में ली,धीरे से बोला -"भैया..."अगर यह सब सच है.."...तो हम दोनों में से सबसे बड़ा झूठ किसने बोला?"
