Rasiya [part 139]

आज सुबह ही प्रवीण और शिल्पा में हल्की झड़प हो गयी थी। प्रवीण नहीं चाहता था कि शिल्पा घर से बाहर जाकर कमाए !घर में ही इतने काम हैं किन्तु शिल्पा पर तो जैसे पैसे कमाने का भूत सवार हो गया है। जबकि उसे इस काम के पांच हज़ार रूपये ही मिलेंगे ,इससे ज़्यादा तो वो अपनी साड़ियों और साज -सज्जा के सामानों में व्यय कर देती है। पता नहीं ,चतुर ने उसे क्या पट्टी पढ़ाई है ? वो उसके स्कूल में पढ़ाने के लिए जाने लगी और प्रवीण से भी झूठ बोला -उसे आठ हज़ार रूपये मिलेंगे, आगे और बढ़ जायेंगे। ये सब करके शिल्पा ने अपनी ज़िंदगी में कहीं ज़हर तो नहीं बो दिया।


उस झड़प का असर ये हुआ , उसे प्रवीण में न जाने कितनी बुराइयां नजर आ रहीं हैं ? दिनभर की थकी सोचती है - कभी प्रवीण ने ,मुझसे से पूछा ही नहीं, उसे किसी बात को लेकर कोई परेशानी तो नहीं। अधिकतर पुरुषों को तो यही लगता है - एक स्त्री को क्या चाहिए ? खाना, कपड़ा और मकान जब उसकी सभी ज़रूरतें पूरी हो गईं तो और क्या चाहती है ? उसने कभी मुझे समझने का प्रयास ही नहीं किया।

 कोई भी पुरुष, यह नहीं सोचता - जब पति -पत्नी में परस्पर प्रेम हो , तो महिलाएं साथ में रहकर परेशानियों को भी झेल जाती हैं , बस उन्हें एहसास तो होना चाहिए कि कोई हमारा अपना है। हमारा कितना ख्याल रखता है ? हम पर विश्वास करता है ,हमारे लिए सोचता है ,किंतु अधिकतर पुरुष  विवाह हो जाने के पश्चात , जैसे अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं। अपने परिवार को छोड़कर सारी परेशानियां उनके पास होती है। पत्नी पर ध्यान नहीं दे पाता है, वो तो घर में ही है ,अब कहाँ जाएगी ? बात-बात पर झल्लाता है। जिसका परिणाम यह होता है। वह उसके साथ तो होती है, किंतु उसके समीप नहीं।

जब शिल्पा की आँखें खुलीं ,तब तक बच्चे ट्यूशन से आ चुके थे। उनके आने की आहट से ही, उसकी आंखें खुलीं ,उन्हें देखकर बोली - अरे  तुम लोग आ गए ,मुझे उठा देते, कहकर उसने घड़ी में समय देखा। छह बजने वाले हैं। वे भी आते ही होंगे यह सोचकर रसोई की तरफ कदम बढ़ा दिए और वहीं से आवाज लगाकर पूछा -बच्चों !खाना तैयार है ,खा लो !

बच्चों ने समय देखकर कहा -आज अभी इतनी जल्दी !!और दिन आप आठ बजे से पहले नहीं बनातीं। 

उसे लगा, बच्चे उस पर व्यंग्य कर रहे हैं ,तब नाराज़ होते हुए बोली -अब बन गया है, तो खा लो !

नहीं ,मम्मी !आज हमने पापा के साथ बाहर खाना खाया था ,अभी भूख नहीं है। 

क्या ? तुम्हारे पापा तुम्हें कब मिले ? क्या वो यहाँ आये थे ?

नहीं ,जब हम छुट्टी में घर आ रहे थे ,तो पापा अचानक मिल गए और बोले -बच्चों भूख लगी होगी ,आओ !खाना खाते हैं। मम्मी !क्या आज पापा ने भी खाना नहीं खाया था ? बेटी ने माँ की तरफ देखते हुए पूछा।

शिल्पा ने, आज बच्चों को तो जैम लगाकर डबल रोटी  दे दी थी।उनके जाने के पश्चात दोनों में झगड़ा हो गया। जल्दबाज़ी में उसने प्रवीण के लिए भी डबलरोटी और जैम मेज पर रख दिया ,जबकि वो  जानती है, प्रवीण 'डबल रोटी' खाना पसंद नहीं करते ,न ही उनकी भूख मिटती है। प्रवीण को नाश्ते में दलिया ,ओट्स इत्यादि पसंद है और काम पर जाते समय भोजन करके जाता है या फिर लेकर जाता है। बेटी का प्रश्न सुनकर शिल्पा चुप हो गयी और बोली - बेटा ! आज थोड़ी गड़बड़ हो गयी ,मुझे आज जल्दी निकलना था इसीलिए खाना नहीं बना पाई।

 अब बेटी को क्या बताती ?लड़ाई में समय निकल गया ,प्रवीण भी तो रसोई में ,थोड़ा सा भी हाथ नहीं बंटाते ,बैठे समाचार -पत्र पढ़ते रहते हैं।आज गलती तो हुई है किन्तु अपने आपको ही समझा रही थी। 

जब पापा आएंगे ,तब हम भी, साथ में ही खाना खा लेंगे कहकर दोनों बच्चे बाहर खेलने चले गए। शिल्पा को  एहसास तो हो रहा था ,अब सब कुछ बिखरता जा रहा है किन्तु अब तो वो स्कूल की प्रधानाध्यापक का कार्यभार संभाले हुए है। कहने में कितना अच्छा लगता है ? वो एक स्कूल में 'प्रिंसिपल' है ,अब तक गृहस्थी में व्यस्त थी ,अब नौकरी भी करके अपने को साबित कर देना चाहती है ,मैंने भी जीवन में कुछ किया है। वो इस 'प्रलोभन' में फंस चुकी थी। 

यही तो हम घर -गृहस्थी वाली महिलाओं की 'त्रासदी' है। हम अपना सौ प्रतिशत जीवन, उस परिवार में खपा दें किन्तु उसका कोई मूल्य नहीं है। जब हमारे परिश्रम का किसी को कोई महत्व नज़र नहीं आता, तब हम भी भूल जाती हैं कि हमने , इस परिवार के लिए कितना कुछ किया है। अरे !हम महिलाएं तो  परिवार की नींव हैं फिर भी हमें क्या मिलता है ? अवहेलना,मानसिक दबाब जिसको झेलते -झेलते अपने काम की कीमत को न समझ 'कुंठित 'अवस्था में आ जाती हैं।

 जिम्मेदारियां सभी हमीं पर ज़बरन ही ओट दी जाती हैं। किन्तु कोई ये नहीं समझता कि ये भी इंसान हैं ,इनका भी घूमने का ,अपने लिए जीने का मन करता होगा। इतना ही नहीं यदि काम में कोई गलती हो गयी तो सारा परिवार ऐसे घूरता है, जैसे कितनी बड़ी गलती नहीं ,गुनाह कर दिया हो। जब कभी खाना अच्छा बनता है या फिर कोई कार्य अच्छा होता है तो किसी के भी मुख प्रशंसा के दो शब्द नहीं निकलेंगे।

शिल्पा सोचती जा रही थी और कपड़ों पर स्त्री करती जा रही थी। तभी उसे किसी के आने की आहट सुनाई दी उसने तुरंत घड़ी में समय देखा 6:30 बज चुके थे ,शायद प्रवीण आए होंगे। यही सोचकर वह वहां से सामान समेटने लगी। सुबह के भूखे होंगे, फिर सोचा बच्चों के साथ तो दोपहर में खा लिया था फिर भी भूख तो लगी होगी। यह सोचकर सामान समेटकर बाहर आ गई, कि  भोजन बना देती  हूं। उसे भी तो बड़े जोरों की भूख लगी है।

 जब वो बाहर आई , उसने प्रवीण के हाथ में, एक बड़ा सा थैला देखा। अभी वह  सोच ही रही थी कि इसमें क्या लेकर आए हैं ?

 तभी प्रवीण ने बच्चों को आवाज़ लगाई -बच्चों कहां हो ? आओ खाना खा लो ! 

प्रवीण बच्चों के लिए और अपने लिए शायद बाहर से ही कुछ लेकर आए थे , कुछ ही देर में, बच्चे दौड़ते हुए आ गए और और प्रवीण भी कपड़े बदलकर बाहर आ गए। 

पापा !क्या हमारे खाने के लिए कुछ लेकर आए हैं ? बेटे ने पूछा। 

पेट तो भरना ही है, इसलिए तुम्हारे लिए' इडली सांभर' लेकर आया हूं, तुम्हें बहुत पसंद है न.... उसने एक बार भी शिल्पा की तरफ नहीं देखा।

 तभी उसकी बेटी को स्मरण हुआ कि मम्मी तो खाना बनाने के लिए कह रही थीं , तब बोली- पापा ! मम्मी ने तो खाना बनाया हुआ है। 

प्रवीण ने कोई जवाब नहीं दिया, और बच्चों से कहा -बर्तन लेकर आ जाओ ! प्रवीण का यह व्यवहार शिल्पा को बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा था। वह तो सोच रही थी- कि जब प्रवीण आएंगे, गरमा -गरम खाना परोस दूंगी जो सुबह की झड़प हुई थी, उसके लिए उसे नजरअंदाज करके हम आगे बढ़ जाएंगे। किंतु प्रवीण ने इस बात का उसे मौका ही नहीं दिया। वह क्या चाहती है ? तब भी शिल्पा ने, बच्चों से कहा -इडली सांभर में क्या पेट भरता है ?मैंने खाना भी बना दिया है अभी मैं रोटी बना कर दे देती हूँ।' इडली सांभर' भी खा लेना !

नहीं, मम्मी मुझे तो यही खाना है , बेटे ने ज़िद की। 

बच्चे अपने बर्तन और सामान लेकर अपने पिता के पास डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। 

निराश होकर शिल्पा अपने लिए, रोटी बनाने लगी। उसकी आंखें नम हो आई थीं। आज खाना नहीं बनाया, आज ही देखो ! कैसे अपने ही घर में मैं, अजनबी सी हो गई हूं। सोचते हुए रोटी बनाती रही, तभी बेटे की बाहर से आवाज आई -मम्मी ! आप भी आ जाइए !

नहीं, तुम लोग खाओ ! मुझे ज्यादा भूख नहीं है ,मैंने अपने लिए खाना बना लिया है , कह कर अपने लिए दो रोटी बनाई। खाने का मन तो नहीं था किंतु वह उन्हें दिखलाना चाहती थी, कि वह भी उनके लिए भूखी नहीं रहेगी। जब ये लोग, मेरे बिना रह सकते हैं तो मैं भी उनके बिना रह सकती हूं। प्रवीण ने अपना खाना खत्म किया और सोने के लिए अंदर कमरे में चले गए।

शिल्पा ने एक कौर रोटी का तोड़ा और एक आंसू उसकी आंख से टपका और धीरे-धीरे न जाने कब उसकी  आंखों में आंसुओं की झड़ी लग गई।अपने को अपमानित महसूस कर रही थी ,नौकरी ही तो कर रही हूँ ,मैंने ऐसे कौन सा गुनाह कर दिया ? बच्चे भी जा चुके थे, वह अकेली ही उन रोटियां के टुकड़ों को निग़ल रही थी।  

  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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