बादलों की गड़गड़ाहट और बदलते मौसम को देख, सबको विश्वास हो गया, आज बरसात होगी। सभी के चेहरों पर खुशियां नजर आ रही थीं। हुआ भी यही, कुछ देर पश्चात टप- टप करके मोटी- मोटी बूंदें धरा को भिगोने लगीं। मिट्टी की सौंधी महक सम्पूर्ण गांव में फैल गयी। झम -झम करके बारिश होने लगी। केतकी जो बहुत देर से बारिश की प्रतीक्षा में थी। वो घर से बाहर निकल पड़ी ,अपनी सहेलियों को पुकारा -आओ ! कितनी ठंडी बूंदें हैं ,कहकर झूमने लगीं। चौपाल पर सभी लड़कियां एकत्र होकर बरसात के पानी से नहाने लगीं।
कुछ लड़के भी, गलियों में छलांगे लगाते हुए इधर से उधर दौड़ रहे थे। अब बरसात और तेज हो गयी। तन की गर्मी अब थोड़ी शांत हुई। खूब देर तक केतकी, अपनी सहेलियों के संग बरसात में नहाती रही। बरसात हुई भी तो इतनी कि उनकी गली में पानी भर गया। वह तो खुशी के कारण उछल पड़ी। तभी मां ने उसे पुकारा -प्रेम ! घर के अंदर आ जा ! पानी बहुत भर गया है। हो सकता है , ज़्यादा भिगेगी तो तबियत बिगड़ जाएगी।
अभी आई ,कहकर वो अपनी सहेलियों से बोली -अब पानी बढ़ता जा रहा है ,अब हमें चलना चाहिए। नहीं गयी, तो अब तो मम्मी, प्यार से बुला रही है फिर डंडे से बुलाएगी।
उसकी बात सुनकर वे हंसी और बोली -हाँ ,हमारे घरवाले भी सोच रहे होंगे ,कहाँ चलीं गयीं ?
कोई नहीं ,मस्ती ही तो करनी है ,अपने घर की छत क्या कम है ? किसी ने कुछ नहीं कहा तो छत पर मिलेंगे,यह कहकर केतकी अपने घर के अंदर तो आ गई किंतु सहेलियों से कही बात भूलकर, पानी के बहाव को देखकर जल्दी-जल्दी कॉपी से, कुछ पन्ने फाड़ने लगी और उसने कई सारी नाव बना डालीं।
तब चिल्लाते हुए ,सामने वाले घर की लड़की सुनीता से बोली -सुनीता ! मैं अपने घर से नाव डाल रही हूं तू भी भेजना ! देखते हैं, किसकी नाव दूर तक जाएगी ?
इस तरह एक नाव को देखकर ,अन्य बच्चों ने भी उसे देखा तो अन्य बच्चों ने भी अपनी -अपनी नाव डालनी शुरू कर दी और जिन बच्चों को नाव बनानी नहीं आती थी ,वे अपने बड़ों के पास कुछ पन्ने लेकर नाव बनवाने के लिए दौड़ पड़े। अपनी नाव को दूर तक जाते हुए देखकर खुशी से उछल रहे थे।
खुशी के कारण,केतकी अपनी नाव को सबसे आगे देखना चाहती थी ,उल्लास में घर से बाहर आ गई। इतने परिश्रम से बनाई अपनी नाव को सबसे आगे देखना चाहती थी। इसके लिए उसने घर के मोटे- मोटे और चिकने कागजों से भी नाव बनाई। इस चक्कर में वह यह भी भूल गई कि उसने उसने इसी साल का नया कैलेंडर भी फाड़ डाला। पानी में खूब देर तक खेलती रही।
तब उसकी मां ने उसे फिर से पुकारा -आजा !अब बहुत देर हो गई है , इतना भीगेगी तो बुखार चढ़ जाएगा, किंतु केतकी इस तरह खेलकर प्रसन्न थी। तब घर के अंदर आकर बोली - आज तो बहुत दिनों बाद बरसात हुई है , मम्मी मेरी नाव सबसे आगे गई थी। खूब मजा किया।
इस तरह के खेलों में तो तुझे बड़ा आनंद आता है , पढ़ाई में आनंद नहीं आता। मां के इतना कहते ही उसका मुंह कसैला हो गया। तेरे भाई तो नहीं भीग रहे।
वे मौसम का आनन्द नहीं ले रहे तो... मैं क्या करूं ?केतकी लापरवाही से बोली -बारिश क्या रोज़ -रोज़ होती है ? माँ चाय के साथ गरमा-गरम पकोड़े हो जाए तो मजा आ जाए !
पूरी चटोरी है ,काम करने का और पढ़ने का मन ही नहीं करता ,खाने को अच्छे से अच्छा चाहिए। माँ बुदबुदाई और पकौड़ों के लिए आलू -प्याज छीलने बैठ गयीं ।
तब तक केतकी अपने कपड़े बदलकर आ गयी थी और बोली -आज तो बरसात में भीगकर मज़ा आ गया और अब पकौड़े आज तो दिन बन गया।
तेरे भाई अंदर बैठे पढ़ रहे हैं, और तुझे बरसात में खेलने और पकोेड़े की खाने की लगी है।अब खा -पीकर उनके पास बैठकर पढ़ लेना।
उनके पास क्यों ?मुझे घुटन होती है ,वे बोर हैं ,कहकर उसने तिरछा मुँह बनाया। वे पढ़ रहे हैं, तो मैं क्या करूं ? क्या मैं बरसात का आनंद भी न लूं ? बरसात क्या रोज-रोज होती है ? पढ़ भी रहें हैं ,तो अपने लिए ,अपना वेतन मुझे लाकर नहीं देंगे।
बेटी के मुँह से ऐसी बात सुनकर वे हतप्रभ रह गयीं।
केतकी बोलती रही -'जब देखो, सारा दिन ताने मारती रहतीं हैं। इससे तो वे दोनों बहनें ही अच्छी थीं , कम से कम उन पर पढ़ाई का बोझ तो नहीं था। अपने मजे से अपनी जिंदगी जी रहीं थीं, कहकर वहीं अंदर कमरे की खिड़की के समीप बैठ गई। यहां से उसे गली का नजारा अच्छे से दिखाई दे रहा था। कुछ बच्चे तो अभी भी पानी में खेल रहे थे , उन्हें देखकर उसने मुंह बनाया और बुदबुदाई , उनके माता-पिता तो कुछ नहीं कहते। उसके दिल ने कहा -थोड़ी देर किताब उठा ले और पढ़ ले ! मां खुश हो जाएगी, उनका मान रह जायेगा किंतु वो टस से मस नहीं हुई। उसे दूसरों की ख़ुशी नहीं चाहिए।
चिंता जी को, बेटी की बहुत चिंता थी किन्तु उसकी बातें सुनकर सोच में पड़ गयीं ,ये कैसी लड़की है ?इसका नाम भले ही हमने 'प्रेम' रक्खा है किन्तु प्रेम तो जैसे इसके मन में किसी के लिए भी नहीं है। अपने मन का करती है ,आज तो अपने भाइयों के लिए भी ऐसे बोल, बोल रही है। हालाँकि उसके शब्दों में सच्चाई थी, 'किन्तु ऐसे' शब्द 'कभी -कभी रिश्तों को भी छलनी कर देते हैं।' मन ही मन उन्होंने निर्णय लिया ,शायद हम इसके विषय में कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं। हमने इसकी बड़ी बहनों के साथ भी कोई जबरदस्ती नहीं की ,ये पढ़ना चाहती है तो ठीक वरना एक -दो साल बाद इसका भी विवाह करवा देंगे।
थोड़ी देर बाद मां की आवाज आई - प्रेम ! आजा! पकौड़ी बन गयी ,पकौड़ी खा ले ! वह खुश हो गई तभी माँ की आवाज फिर से आई -'अपने भाइयों को भी ऊपर से बुला लाना, वे भी आकर खा लेंगे।''
उन्हें भूख लगेगी ,इच्छा होगी तो..... तभी बारिश में भीगे हुए ,केशवदास जी ने घर के अंदर प्रवेश किया चूल्हे पर कढ़ाई रक्खी देखकर ,प्रसन्न होते हुए बोले -अरे, वाह !पकौड़ियाँ बन रहीं हैं ,बढ़िया !गोमती की माँ ,साथ में अदरक की बढ़िया सी चाय भी हो जाये।
पिता को आया देखकर केतकी चुपचाप अपने भाइयों को बुलाने के लिए ऊपर चली गयी। भइया ! बाहर कितनी अच्छी बारिश हो रही है ? कुछ देर आ जाते, केतकी अपने बड़े भाई से बोली। वो अपने बड़े भाई से प्यार और सम्मान से बात करती है।
मनीष भी उससे सहजता से,बड़े प्यार से बात करता है,समझाता है। किसी भी बात के लिए उस पर दबाब नहीं बनाता। वो कभी भी उसे पढ़ने के लिए बाध्य भी नहीं करता,शायद इसी कारण बड़े भाई को देखकर प्रसन्न रहती है।
