Kiski dulhan [part 6]

जब मोहिनी ने, भानू से पूछा -क्या आप इस विवाह के लिए तैयार हैं ?

तब भानू ने बिना देर किये कहा -'नहीं ' मुझे किसी की मजबूरी नहीं चाहिए। 

भानू के मुख से, यह सुनकर मोहिनी पहली बार उलझन में पड़ गई,अब तक उसने भानु को सिर्फ़ गुस्सैल और कठोर समझा था लेकिन उसके  इस जवाब ने उसकी सोच को बदल दिया। उसने अपने मन में भानू की जो छवि बनाई हुई थी। उस छवि में पहली दरार डाल दी।


उसी समय ऊपर की मंज़िल से किसी भारी चीज़ के गिरने की तेज़ आवाज़ आई -धड़ाम !

उस आवाज से पूरा गलियारा गूँज उठा ,दोनों ने एक साथ ऊपर देखा ,और फिर बिना कुछ कहे सीढ़ियों की ओर दौड़ पड़े। तीसरी मंज़िल...वही मंज़िल...जहाँ पिछली रात मोहिनी ने खिड़की में एक रहस्यमयी साये को  देखा था।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भानू ने धीमे स्वर में कहा -इस मंज़िल पर तो कोई नहीं रहता। "

मोहिनी ने पूछा, तो फिर ये आवाज़ कैसी थी ?"

भानु का जवाब सुनकर उसके कदम एक पल को रुक गए ,यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ..."तीसरी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते दोनों की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। ऊपर पहुँचकर मोहिनी ने पहली बार उस हिस्से को ध्यान से देखा। नीचे की मंज़िलों की जैसी चमक-दमक यहाँ बिल्कुल नहीं थी।दीवारों पर लगी सुनहरी पॉलिश उखड़ चुकी थी। पुरानी लकड़ी की छत से धूल के महीन कण हवा में तैर रहे थे।

लंबे गलियारे में लगी, पीतल की लाइटें बंद थीं। सिर्फ़ खिड़की से आती धूप की हल्की किरणें फर्श पर पड़ रही थीं।पूरा वातावरण ऐसा लग रहा था, जैसे इस हिस्से में वर्षों से कोई आया ही न हो।

 मोहिनी ने धीमे स्वर में आश्चर्य से पूछा,"...क्या सच में,यहाँ  कोई नहीं रहता ?"

भानु ने हाँ में सिर हिलाया -दादीसा के अलावा किसी को इस मंज़िल पर आने की अनुमति नहीं है।"

"क्यों?"

"क्योंकि पिताजी कहते हैं -' कि यह हिस्सा असुरक्षित है।

"मोहिनी ने चारों ओर अपनी नज़रें दौड़ाईं ,ऐसा लग रहा था ,जैसे वो वहां कुछ ढूंढ़ रही है। 

किन्तु उसे वहाँ कहीं कोई टूटी हुई दीवार या ख़तरा दिखलाई नहीं दिया ,लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हुआ कि यहाँ की हवा नीचे से कुछ अलग थी ,बहुत भारी ! जैसे दीवारों ने वर्षों से अनगिनत रहस्य अपने भीतर कैद कर रखे हों।

आवाज़ जिस कमरे से आई थी, उसका दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। भानु  ने धीरे से उसे धक्का दिया।दरवाज़ा चरमराहट के साथ वह दरवाज़ा खुल गया । कमरे में पुराने फर्नीचर सफ़ेद चादरों से ढके हुए थे।एक कोने में टूटा हुआ फूलदान ज़मीन पर पड़ा था। शायद वही गिरने की आवाज़ थी। लेकिन...कमरे में किसी के होने का कोई निशान नहीं था। 

मोहिनी  धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाए और मन ही मन सोच रही थी -"क्या ये हवा से गिरा होगा?

भानु ने टूटे हुए फूलदान को देखा, और बोला -"यह फूलदान उस अलमारी के ऊपर रखा था।" उसने ऊपर की ओर इशारा किया।

मोहिनी के मन में फिर से वही बेचैनी लौट आई ,तब उसने उस जगह को ध्यान से देखा और अंदाज़ा लगाया और बोली - हवा इसे वहाँ से नीचे नहीं गिरा सकती।

तभी उसकी नज़र फर्श पर पड़ी।धूल की मोटी परत पर कुछ ताज़ा निशान बने हुए थे।जूते के निशान !वह झुककर उन्हें देखने लगी।

"भानु  जी..."यहाँ आइये !जैसे ही भानु उसके कहने पर वहां गया ,तब जूतों के वो निशान दिखाते हुए बोली -यह देखिए।"

भानु भी नीचे बैठ गया ,उसने उन्हें ध्यान से देखा ,निशान कमरे के दरवाज़े से शुरू होकर खिड़की तक जा रहे थे ,लेकिन अजीब बात यह थी...वापस आने के निशान नहीं थे।जैसे कोई व्यक्ति खिड़की तक गया हो...और फिर हवा में गायब हो गया हो।ऐसा कैसे हो सकता है ?दोनों ने एक साथ खिड़की की ओर देखा।नीचे से लगभग तीस फीट की ऊँचाई थी।बिना किसी सहारे वहाँ से उतरना लगभग असंभव था।

"कोई मज़ाक कर रहा है ,जब भानु को कुछ समझ न आया, तब बोला -शायद कोई मज़ाक कर रहा है।  लेकिन उसे  अपने ही शब्दों पर पूर्ण विश्वास नहीं था।

मोहिनी, धीरे-धीरे खिड़की के और समीप पहुँची।खिड़की के बाहर एक पत्थर की दीवार थी ,उसने नीचे झाँका। तभी उसकी नज़र एक बहुत पतली लोहे की सीढ़ी पर गई । वह सीढ़ी दीवार से इतनी सफ़ाई से चिपकी हुई थी, कि नीचे से दिखाई ही नहीं देती थी ,तब मोहिनी उत्साहित होते हुए बोली - यह देखिए।"

भानु तुरंत उसके पास आया ,उसने पहली बार उस छिपी हुई सीढ़ी को देखा आश्चर्य से उसका मुँह खुला का खुला रह गया और उसके मुँह से निकला -"असंभव...!

"मैं इस हवेली में बचपन से हूँ...".और मुझे कभी इसके बारे में पता ही नहीं चला।"उसने नीचे झांकते हुए देखा।

सीढ़ी सीधे हवेली के पीछे वाले हिस्से की ओर जा रही थी।वहीं...जहाँ पिछली रात उसे रहस्यमय जूतों के निशान मिले थे।

उसी समय पीछे से किसी ने खाँसा ,दोनों तुरंत मुड़े।

 दरवाज़े पर गोमती काकी खड़ी थीं।उनके चेहरे पर घबराहट स्पष्ट  दिखलाई दे रही थी ,"छोटे साहब!"उन्होंने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।"आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं ?"

भानु ने सीधे पूछा,-"काकी... यह सीढ़ी कहाँ जाती है ?"गोमती काकी का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया।उन्होंने बिना खिड़की की ओर देखे कहा,"मुझे नहीं पता।"

"झूठ !"भानु का स्वर कठोर हो गया ,वो जान गया था ,काकी बहुत कुछ जानती है ,"आप इस घर में चालीस साल से हैं ,आपको सब पता है।"

भय से गोमती काकी की आँखों में आँसू भर आए , तब लड़खड़ाते शब्दों में बोली - कुछ बातें...न जानना ही बेहतर नहीं होता है ,"इतना कहकर वह तेज़ी से वहाँ से चली गईं।

मोहिनी ने, महसूस किया कि जाते-जाते काकी ने एक पल के लिए उसके दुपट्टे की ओर देखा था। ठीक वहीं...जहाँ चाबी बँधी हुई थी।

दोपहर तक हवेली में फिर बैठक शुरू हो गई। इस बार मोहिनी  को भी बुलाया गया। कमरे में परिवार के सभी सदस्य मौजूद थे।

विक्रम सिंह ने भारी स्वर में कहा,"हमने पूरी रात सोचने के बाद एक निर्णय लिया है।"

मोहिनी ,अपलक उनकी ओर देख रही थी ,न जाने उनका क्या निर्णय होगा ?

तब वो बोले -हम इस शादी को पूरी तरह रद्द नहीं करेंगे। लेकिन..."उन्होंने कुछ पल रुककर कहा,"अभी कोई नई शादी भी नहीं होगी। उनके इस निर्णय से सबने राहत की साँस ली।

रणवीर सिंह ने आगे कहा,"जब तक अदालत रिकॉर्ड की जाँच पूरी नहीं कर लेती है ,तब तक दोनों परिवारों में  सगाई का यह संबंध बना  रहेगा ,अंतिम निर्णय उसके बाद लिया जाएगा।"

मोहिनी ने पहली बार राहत महसूस की ,कम से कम उसे ज़बरन किसी ऐसे रिश्ते में नहीं धकेला जा रहा था जिसे वह स्वीकार नहीं कर सकती थी।

लेकिन भानु  का चेहरा बिल्कुल शांत था ,जैसे उसे पहले से इस फैसले का अंदाज़ा हो।

बैठक समाप्त होने के पश्चात मेहमान धीरे-धीरे विदा होने लगे ,हवेली लगभग खाली हो चुकी थी।

शाम ढलने लगी। मोहिनी अपने कमरे में वापस लौटी।वह दिन भर की घटनाओं से थक चुकी थी। उसने अपना दुपट्टा उतारा और लेटने ही वाली थी ,तभी...टन...की आवाज के साथ ,चाँदी की चाबी ज़मीन पर गिर गई। वह झुककर उसे उठाने लगी ,लेकिन इस बार उसकी नज़र एक ऐसी चीज़ पर पड़ी, जो पहले उसने देखी ही नहीं थी।

उस चाँदी की चाबी का क्या रहस्य है ? ऐसा उसमें मोहिनी ने क्या देख लिया ? चलिए !आगे बढ़ते हैं। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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