मोहिनी जैसे ही ,उस कमरे में आकर गिर जाती है ,वहां उसकी मुलाकात एक अधेड़ उम्र महिला से होती है। मोहिनी उससे उसका परिचय जानना चाहती है ,तब वो महिला कह देती है ,अभी मेरा परिचय जानने में समय है। तब मोहिनी एक पुरानी तस्वीर देखती है ,तब मोहिनी की उँगलियाँ उस तस्वीर को हाथ में लेती है उसकी नजरें उस पुरानी तस्वीर पर जमी हुई थीं। तस्वीर में रुद्र...विक्रम...और वह रहस्यमयी महिला मुस्कुरा रहे थे ,लेकिन तस्वीर का चौथा कोना आधा फटा थोड़ा धुंधला सा था। ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ कभी कोई चौथा व्यक्ति भी खड़ा था...जिसे जानबूझकर तस्वीर से हटा दिया गया हो।
मोहिनी ने काँपती आवाज़ में उस महिला से पूछा-"यह तस्वीर कहाँ की है?"
महिला ने वो तस्वीर तुरंत वापस अपने हाथ में ले ली ,जैसे उसे कुछ बताते-बताते कुछ छुपाना भी चाहती थी उन्होंने उस फटे हुए हिस्से पर अपनी उँगली फेरी और धीमे से बोली -"कुछ तस्वीरें पूरी नहीं होतीं ...क्योंकि उनमें मौजूद लोग पूरी ज़िंदगी अधूरे रह जाते हैं।"
मोहिनी ,उसके शब्दों का आशय समझ नहीं पाई तब उसने कहा - आप मुझे सीधा - सीधा जवाब क्यों नहीं देतीं?बातों को क्यों उलझा रही हो "
महिला ने उसकी आँखों में देखा और बोली - अगर' मैं' अभी तुम्हारे सारे सवालों के जबाब दे दूँ...तो तुम आज की रात इस हवेली से ज़िंदा बाहर नहीं निकल पाओगी।"
यह सुनकर मोहिनी एकदम जैसे शांत हो गयी ,कुछ पल के लिए चुप ही हो गई।
किन्तु महिला की आवाज़ में डर नहीं था...बल्कि वर्षों का अनुभव था।ऐसा लग रहा था कि वह किसी ऐसी सच्चाई को जानती हैं...जिसे बोलना भी ख़तरनाक था।
उधर...'सभा कक्ष' में अफरा-तफरी मची हुई थी।
'भानु' हर गुप्त मार्ग में 'मोहिनी' को खोज रहा था -मोहिनी !मोहिनी ! उसकी आवाज़ बार-बार पत्थर की दीवारों से टकराकर लौट रही थी।
रत्न प्रताप ने उसका कंधा पकड़ लिया और बोले -"रुको!"अगर तुम बिना सोचे हर सुरंग में भागोगे...तो वे लोग तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे।"
भानु ने, झटककर उनका हाथ हटा दिया ,मुझे किसी की परवाह नहीं!"मोहिनी'न जाने कहाँ होगी ? वो अकेली है ,उसे मेरी ज़रूरत है।"
रत्न प्रताप, पहली बार' भानु' को ध्यान से देखने लगे।कुछ देर पहले तक यही लड़का' मोहिनी ' से दूरी बनाए हुए था ,आज...वह उसकी जान बचाने के लिए पूरे 'रक्षक मंडल' से भिड़ने को तैयार है।
रत्न प्रताप के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई ,उन्होंने मन ही मन कहा—"शायद यही वजह है .. कि किस्मत ने तुम्हें चुना, लेकिन उन्होंने यह बात ज़ोर से नहीं कही।
'विक्रम' अभी भी 'सभा कक्ष' के मध्य खड़े हुए थे।'रक्षक मंडल' का नेता उनके सामने आकर बोला - लड़की अगर उस कमरे तक पहुँच गई है......तो अब उसे कोई रोक नहीं सकता।"
विक्रम ने उसकी ओर तीखी नज़रों से देखा और बोले -"तुम भूल रहे हो ...वह अकेली नहीं है।"
नेता मुस्कुराया -यही तो देखना है....वह किसके साथ लौटती है ?"उसकी इस बात ने' विक्रम' को असहज कर दिया ,जैसे वह इस वाक्य का असली अर्थ समझते हों।
इधर...रहस्यमयी महिला धीरे-धीरे उस कमरे के एक कोने तक गईं ,वहाँ पत्थर की एक पुरानी दीवार थी ,दीवार पर उँगलियों से बनाई गई कई लकीरें थीं। पहली नज़र में वे सामान्य खरोंचे लग रहीं थीं ,लेकिन जब उन्होंने पास रखी' मशाल' उठाकर उन पर रोशनी डाली...तो वे लकीरें मिलकर एक नक्शा बन गईं।
मोहिनी ने आश्चर्य से पूछा -"क्या यह....हवेली का नक्शा है?"
महिला ने सिर हिलाया और बोली -हवेली का तो नहीं......उसके नीचे की दुनिया का है।"
मोहिनी ने ध्यान से देखा- उस नक्शे में कई सुरंगें बनी हुई थीं ,कुछ पर लाल निशान थे ,कुछ पर काले और एक जगह...एक छोटा-सा चाँदी का गोला बना हुआ था। महिला ने उसी गोले पर उँगली रखी "याद रखना.."अगर कभी तुम्हें अपनी जान बचानी पड़े...तो इस रास्ते से कभी मत जाना।
"क्यों?"
"क्योंकि जो वहाँ जाता है...वह या तो अपना नाम भूल जाता है..."...या फिर अपना अतीत।"
मोहिनी के चेहरे पर उलझन बढ़ती जा रही थी तब वो बोली -आप ये सब पहेलियाँ क्यों बुझा रहीं हैं? सीधे-सीधे क्यों नहीं बतातीं ?
वह महिला कुछ क्षण चुप रहीं ,फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—"क्योंकि ''दीवारों के भी कान होते हैं।"जैसे ही उन्होंने यह कहा...
कमरे की छत से हल्की-सी आवाज़ आई -'टक'...महिला के चेहरे पर अचानक बदलाव आ गया ,उन्होंने फुर्ती से,वहां जलती मशाल बुझा दी ,पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया ,तब उन्होंने फुसफुसाकर कहा—"वे लोग आ गए।"
"कौन? मोहिनी ने घबराकर पूछा।
महिला ने उसका हाथ पकड़ लिया और चेतावनी देते हुए बोली - एक शब्द भी मत बोलना ! दोनों दीवार से सटकर खड़ी हो गईं।कुछ ही सेकंड हुए होंगे ,ऊपर बने पत्थर के झरोखे से दो लोगों की आवाज़ सुनाई दी-"लगता है ,कमरा खाली है?"
"नहीं..."मुझे किसी के चलने की आवाज़ आई थी।"
मोहिनी की साँस तेज़ हो गई ,महिला ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया, उन्होंने अपनी हथेली से दीवार के एक छोटे-से पत्थर को दबाया -'घर्र'...दीवार का एक हिस्सा अंदर की ओर खुल गया।उसके पीछे मुश्किल से एक व्यक्ति छिप सकता था।
महिला ने मोहिनी को भीतर धकेलकर जैसे आदेश दिया -"अंदर जाओ।"
"लेकिन आप?
मैं यहीं रहूँगी।"
"नहीं, हम साथ—"
इससे पहले कि मोहिनी अपनी बात पूरी करती ,महिला ने पहली बार कठोर स्वर में कहा—
"अगर तुम सच जानना चाहती हो...तो मेरी बात मानो ! "
मोहिनी मजबूर होकर उस संकरी जगह में छिप गई ,दीवार फिर से बंद हो गई।अब मोहिनी एक छोटी-सी दरार से बाहर का दृश्य देख सकती थी।
ऊपर से दो नकाबपोश नीचे उतरे ,उन्होंने पूरे कमरे की तलाशी लेनी शुरू कर दी।एक आदमी ने तो पालने को ही उलट दिया।दूसरे ने तस्वीरें उठाकर फेंक दीं ,फिर उसकी नज़र उस महिला पर पड़ते ही बोला - तुम फिर से यहाँ आ गई?
महिला पहले शांत खड़ी रही ,उसके दुबारा पूछने पर बोली -मैं हमेशा से ही यहीं रहती आई हूँ।
वो लड़की कहाँ है?"
महिला मुस्कुराईं,अनजान बनते हुए पूछा - "कौन-सी लड़की?"
नकाबपोश ने बिना कुछ कहे, उनकी ओर कदम बढ़ाए ,उसने उनकी कलाई कसकर पकड़ ली और क्रोधित होते हुए बोला -"हमारे साथ खेल मत खेलो !वरना अंजाम बुरा होगा। "आज अगर वह लड़की हाथ से निकल गई..."...तो तुम्हें भी, हमसे कोई नहीं बचा पाएगा।
महिला ने भी गुस्से से उसे देखा , तब वो धीरे से बोली -जिस दिन तुम लोगों ने, उस मासूम को मारने की कोशिश की थी..."...उसी दिन तुम्हारी हार तय हो गई थी।"दोनों नकाबपोश एक पल के लिए ठिठक गए।
पहले आदमी ने तुरंत पूछा—तुम्हें किसने बताया ?कि वह अभी भी ज़िंदा है?"
महिला हल्का-सा मुस्कुराईं - मैंने अभी उसका नाम भी नहीं लिया , तुम्हारे ड़र ने अपने आप स्वीकार कर लिया।"दोनों नकाबपोश एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
मोहिनी, जो दीवार के पीछे छिपी थी, वह अब पहले से भी ज़्यादा उलझ चुकी थी।
