Purani ghadi

नीति ने देखा, उसके दादाजी हल और बैलों  की जोड़ी के साथ, घर की ओर आ रहे हैं, उन्हें देखते ही नीति प्रसन्न हो गई और खुश होते हुए, उनकी तरफ दौड़ लगा दी - दादाजी! दादाजी ! नीति शहर में अपने माता-पिता के साथ रहती है, छुट्टियों में कभी-कभी गांव में आ जाती है, उसकी मम्मी को गांव में रहना पसंद नहीं है किंतु नीति को, गांव में अपने लोगों से मिलकर अच्छा लगता है इसीलिए वो  गांव में आ जाती है। 

दादी और बुआ उसकी देखभाल करती है। अबकी बार तो नीति को भेजना उनकी मजबूरी हो गई थी क्योंकि' कुछ दिनों के लिए उसकी मम्मी अपनी बहन से मिलने के लिए गयी हैं ,उसका छोटा भाई जो आने वाला है ', ऐसा उसकी मम्मी ने कहा था।  इसलिए उन्होंने कुछ दिनों के लिए नीति को गांव भेज दिया। नीति आठवीं कक्षा में पढ़ती है, इतनी भी छोटी नहीं है किंतु उसे अपनी दादी और बुआ से बहुत लगाव है।

 उसे देखते ही उसके दादाजी खुश हो गए और बोले -तू, कब आई थी ?


 दादाजी !अब तो मैं यहां कुछ दिनों के रहने के लिए आई हूं।

 अच्छी बात है, कहते हुए, वे अपने कार्यों में व्यस्त हो गए। नहा- धोकर जब भोजन करने बैठे, तब नीति  उन्हें खाना पकडाने लगी। 

दादाजी ने पूछा -क्या तेरा यहां मन लग जाता है ?

हां, क्यों नहीं ? मेरा शहर में इतना मन नहीं लगता। 

 बुआ ने डांटते हुए कहा- वहां इसे पढ़ना जो पड़ता है। 

दादाजी मुस्कुराए और बोले -क्या ऐसी बात है ?

नहीं, दादाजी ऐसी कोई बात नहीं है, वहां मुझे, मेरे इतने लोग नहीं दिखाई देते, सभी वहां पर अपने कमरों में बंद रहते हैं, अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। मम्मी- पापा को भी मेरे लिए समय नहीं मिलता इसलिए मेरा यहां मन लगता है। 

दादा जी की नजर, नीति की प्यारी सी छोटी घड़ी पर गई और बोले -आज तो घड़ी पहनी हुई है, किसने दिलवाई ?

पापा ने दिलवाई है, पापा ने कहा था अगर क्लास में फर्स्ट आएगी तो तुझे घड़ी दिलवाऊंगा, यह मेरा इनाम है। तब बोली- दादाजी !आपने तो मुझे कोई इनाम नहीं दिया। 

हंसते हुए दादाजी बोले -तेरे दादा पर कोई ऐसा सामान नहीं है जो तुझे उपहार में दूँ ,हँसते हुए बोले - मैंने तो कोई शर्त भी नहीं रखी।   

दादाजी !आपने भी तो कभी घड़ी पहनी होगी ?

 मैं तो यहां खेती करता हूं , दादाजी ने हंसते हुए उसे थाली पकड़ाई और बोले -मैं अब कुछ देर आराम करूंगा ।

 तभी बुआ ने उसे बुला लिया और बोली -तेरे दादा किसान हैं ? वो घड़ी पहनकर क्या करेंगे ?

 बुआ की बात से नीति संतुष्ट नहीं हुई और वह दादी के पास चली गई और उसने दादी से पूछा -दादी ! क्या दादा जी  ने कभी घड़ी या शहरी कपड़े नहीं पहने हैं । यहां तो वही धोती- कुर्ता पहनते हैं। 

नहीं,ऐसी बात नहीं है, तेरे दादा, पेंट कमीज भी पहनते थे और बड़े स्टाइल में रहते थे, दादी मुस्कुराते हुए बोली। 

ओहो ! दादी !'अंग्रेजी 'स्टाइल 'दादी  मुस्कुराते हुए बोली -''जब बच्चे पढ़ -लिख जाते हैं ,तो समझो !माता -पिता भी पढ़ जाते हैं।'' तेरे पापा जब किसी से बात करते थे ,तब मैं भी सुनकर सीख़ गयी।तुम्हारे दादा अनपढ़ नहीं हैं ,उन्होंने खेती- बाड़ी में स्नातक किया है ,पर उन्हें नौकरी नहीं मिली तब यहीं रहकर खेती करने लगे और ये सभी शौक़ छोड़ दिए।  

पर दादी ! दादाजी ने यह सब क्यों छोड़ दिया ? क्या दादाजी ने कभी घड़ी भी पहनी है ?

हाँ ,उनकी एक बात सुंदर और महंगी घड़ी है जो मैंने संभाल कर रखी हुई है।

 मैं भी तो उस घड़ी को देखूं , दादा जी, की घड़ी कैसी होगी ? दादी !मुझे वह घड़ी दिखाइए !न... 

 अभी मैं काम कर रही हूं उसके बाद तुम्हें वह घड़ी दिखाऊंगी, पर तू उसे देखकर क्या करेगी ?वह तो बहुत पुरानी घड़ी है, अब तो शायद चलती भी नहीं। 

तो क्या हुआ ? आपको पता है, बहुत से लोग पुरानी चीजों को इकट्ठा करके रखते हैं, मैं भी अपने दादाजी की घड़ी को संभाल कर रखूंगी, जैसे आपने रखी है। 

वह तो पुरानी घड़ी है, उसका ज्यादा मूल्य भी नहीं होगा। 

कोई बात नहीं, आप मुझे, उसे दिखा दीजिए !नीति ने ज़िद की । 

कुछ देर के पश्चात दादी ने अपना पिटारा खोला ,उसमें से उन्होंने दादाजी की पैंट- शर्ट ,उनका चश्मा, उनकी सोने की अंगूठी, उनकी टाई और उनकी घड़ी निकाली ,साथ ही उनकी एक पुरानी तस्वीर,  उस सामान और तस्वीर को देखकर नीति भाव- विभोर हो उठी और पूछा -क्या दादाजी ऐसे रहते थे। 

हां, इनके बड़े ठाठ थे, किंतु समय के साथ-साथ जिम्मेदारियों ने, उनसे सब छुड़वा दिया , सोचते हुए दादी की आंखें नम हो गई।

 तब नीति ने कहा -दादी ! यह घड़ी तो बंद पड़ी है। 

वही तो मैं तुझसे कह रही थी-अब इसका कोई मूल्य नहीं है ,शायद बेकार हो गयी है। 

 कोई बात नहीं, मैं इसे अपने पास रख लूं। 

तेरे हाथ तो इतने छोटे-छोटे हैं, और ये मर्दों की घड़ी है, तेरे हाथों में अच्छी भी नहीं लगेगी। 

कोई बात नहीं, यह घड़ी मेरे दादाजी की निशानी बनकर मेरे साथ रहेगी। 

तू, इसका क्या करेगी ?

 इसे पहले ठीक करवाऊंगी और फिर अपने पास रखूंगी ,ये मुझे स्मरण कराती रहेगी ,इस घड़ी से मेरे दादाजी की यादें जुड़ी हैं ,उनके शौक !उनके बीते हुए पल इसमें कैद हैं और जब भी इसे देखूंगी ,मुझे मेरे दादा की याद दिलाएगी। उनका यही उपहार मुझे बेहद पसंद आया ,कहते हुए नीति ने वो तस्वीर और उनकी 'पुरानी घड़ी' ले ली।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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